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भारत छोड़ो आंदोलन: इतिहास, महत्व और क्यों असफल हुआ ?

भारत छोड़ो आंदोलन, द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 8 अगस्त, 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा शुरू किया गया एक स्वाधीनता आंदोलन था, जिसमें भारत में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन को भारत से समाप्त करने की मांग की गई थी। भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत महात्मा गांधी ने की थी, जिन्होंने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर करने के लिए बड़े पैमाने पर सविनय अवज्ञा आंदोलन का आह्वान किया था। आंदोलन को छात्रों, किसानों और श्रमिकों सहित समाज के सभी वर्गों से व्यापक समर्थन मिला।

भारत छोड़ो आंदोलन

अंग्रेजों ने आंदोलन का कड़ा जवाब दिया और कई भारतीय नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, जिनमें महात्मा गांधी भी शामिल थे, जिन्हें दो साल के लिए जेल में डाल दिया गया था। अंग्रेजों ने भी आंदोलन को दबाने के लिए हिंसा का सहारा लिया, जिसके परिणामस्वरूप व्यापक विरोध और भारतीय प्रदर्शनकारियों और ब्रिटिश अधिकारियों के बीच झड़पें हुईं।

अंग्रेजों की भारी-भरकम प्रतिक्रिया के बावजूद, भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता के लिए भारत के संघर्ष में एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया। इसने नेताओं और कार्यकर्ताओं की एक नई पीढ़ी को प्रेरित किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनमत बनाने में मदद की। अंत में, लगभग 200 वर्षों के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के बाद, भारत ने 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त की।

असहयोग आंदोलन वह आंदोलन था जिसका भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि यही वह आंदोलन था जब अहिंसा  पुजारी महात्मा गाँधी भी हिंसा के लिए तैयार हो गए, जब गाँधी जी ने नारा दिया ‘करो या मरो’ ( do or die ),  यदयपि यह प्रश्न अक्सर उठता है कि भारत छोड़ो आंदोलन क्यों असफल हुआ’। इस लेख मैं आपको भारत छोड़ो आंदोलन से जुड़े सभी प्रश्नों से परिचित कराऊंगा। यह लेख पूर्णतया  शोध करके तैयार किया गया है ताकि पाठकों के सम्मुख विश्वसनीय और शोधपरक जानकारी प्रस्तुत की जा सके।

भारत छोड़ो आंदोलन क्यों शुरू किया गया 

मानव इतिहास में सदा ही जालिम और विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा किये गए दमन तथा अत्याचार का विरोध होता रहा है।  जब-जब मानव का विरोध सफल हुआ, उसे स्वतंत्रता मिली। 1942 में होने वाला ‘भारत छोडो आंदोलन’ भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में एक ऐसी ही महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना है। समस्त देश में फैलने वाले इस आंदोलन ने अंग्रेजों को भारतीय राष्ट्रवाद की शक्ति का परिचय दिया। इस आंदोलन के पीछे निम्नलिखित कारण थे —

1- क्रिप्स मिशन की विफलता से यह स्पष्ट हो गया था कि ब्रिटिश सरकार द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीयों की अनिच्छुक साझेदारी तो रखना चाहती थ, लेकिन किसी सम्मानजनक समझौते के लिए तैयार नहीं थी। नेहरू और गाँधी भी जो इस फ़ासिस्ट-विरोधी युद्ध को किसी तरह कमजोर करना नहीं चाहते थे, इस निष्कर्ष पर पहुंच गए थे कि और अधिक चुप रहना यह स्वीकार कर लेना होगा कि ब्रिटिश सरकार को भारतीय जनता की इच्छा जाने बिना भारत का भाग्य तय करने का अधिकार है। अतः कांग्रेस ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने को कहा। 

2- भारत छोडो आंदोलन के पीछे एक और महत्वपूर्ण कारण यह था कि विश्व युद्ध के कारण जरुरी सामान की कीमते बहुत बढ़ गयी थीं और आवश्यक वस्तुओं की बाजार में भारी कमी हो गई थी।बंगाल और उड़ीसा में सरकार ने नावों को इस संदेह में जब्त कर लिया कि कहीं इनका प्रयोग जापानियों द्वारा न किया जाये।सिंचाई की नहरों को सूखा दिया गया जिससे फसलें सूखने लगीं। सिंगापुर और रंगून पर जापानियों के कब्जे के बाद कलकत्ता पर बम बरसाए गए जिससे हजारों लोग शहर छोड़कर फ़ाग गए। 

3- मलाया और वर्मा को ब्रिटिश सरकार ने जिस तरह खाली किया, यानि सिर्फ गोरे लोगों को सुरक्षित निकला गया और स्थानीय जनता को उसके भाग्य पर छोड़ दिया गया।भारतीय जनता भी अब यही सोचकर परेशान थी कि यदि जापानियों का भारत पर हमला हुआ तो अंग्रेज यहाँ भी ऐसा ही करेंगे। अतः राष्ट्रिय आंदोलन के नेताओं ने जनता में विश्वास पैदा करने के लिए संघर्ष छेड़ने का निश्चय किया। 

4- विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सरकार की स्थिति देखकर जनता का विश्वास घट गया था लोग बैंकों और डाकघरों से जमा पैसा निकलने लगे थे और उस पैसे को सोने चांदी में निवेश करने लगे थे।अनाज की जमाखोरी अचानक बहुत बढ़ गयी थी। 

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5- गाँधी जी को लगने लगा था कि अब देर करना सही नहीं होगा।  उन्होंने कांग्रेस को चुनौती दे डाली थी कि अगर उसने संघर्ष का उनका प्रस्ताव अस्वीकार किया तो “मैं देश की बालू से ही कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर दूंगा”। इसका असर यह हुआ कि कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा की अपनी बैठक ( 14 जुलाई 1942 ) में संघर्ष के निर्णय को अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। 

गाँधी जी ने ‘हरिजन’ पत्रिका में अंग्रेजों को भारत छोड़ने की मांग करते हुए कहा “भारत को भगवान के भरोसे छोड़ दो और यदि वह असम्भव हो तो उसे अराजकता के भँवर में छोड़ दो” । 

गाँधी जी ने 5 जुलाई 1942 को ‘हरिजन’ में लिखा अंग्रेजों भारत को जपनके लिए मत छोड़ो बल्कि भारत को भारतीयों के लिए व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ”

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1857 की क्रन्ति, स्वरुप, कारण और परिणाम ? 1857 ki kranti in hindi

1857 KI KRANTI

1857 की क्रांति जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है। इस क्रांति से सम्बंधित अनेक प्रश्न हैं जो हमारे सामने अक्सर आते हैं , क्या यह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था? क्या यह सैनिक क्रांति थी ? क्रांति कहाँ से शुरू हुई ? क्रांति के प्रमुख नायक, क्रांति क्यों असफल हुई ? क्रांति का स्वरुप क्या था? आदि इन सभी प्रश्नों का उत्तर इस लेख के माध्यम से दिया जायेगा। ये सभी प्रश्न आपको किसी एक लेख में नहीं मिलेंगे, लेकिन हम यह लेख इसीलिए लाये हैं ताकि आपको सम्पूर्ण और सही जानकारी एक ही लेख में मिल जाये।  

1857 ki kranti
1857 की क्रान्ति

 

1857 की क्रन्ति, स्वरुप, कारण और परिणाम 1857 ki kranti in hindi

भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी ने व्यापारक गतिविधियों के साथ प्रवेश किया और साम्राज्यवाद की प्रवृत्ति के कारण भारत की कमजोर राजनीतिक स्थिति का लाभ भी उठाया। ब्रिटिश लोगों की धनलोलुपता की कोई सीमा नहीं थी।

1857 की क्रांति कोई अचानक हुई क्रांति नहीं थी इसके बीज अंग्रेजों की 100 वर्ष की ( 1757-1857 ) नीतियों में छिपा था। इन सौ वर्षों में अंग्रेजों ने भारत के सभी वर्गों – रियासतों के राजाओं, जमींदारों, सैनकों, किसानों, मौलवियों , ब्राह्मणों , व्यापारियों को भयभीत  कर दिया।

      ऐसा भी नहीं है कि 1857 से पूर्व अंग्रेजों का कोई विरोध नहीं हुआ। समय-समय पर अनेक विद्रोह हुए जिन्हें कुचल दिया गया — वैल्लोर में 1806 में , बैरकपुर में 1824, फिरोजपुर में फरवरी 1842 में 34वीं रेजिमेंट का विद्रोह, 1849 में सातवीं बंगाल कैवेलरी और 64वीं रेजिमेंट और 22वीं रेजिमेंट N.I. का विद्रोह, 1850 में 66वीं N.I. का विद्रोह और1852 में 38वीं N.I. का विद्रोह आदि।

इसी प्रकार 1816 बरेली में उपद्रव हुए, 1831-33 का कोल विद्रोह, 1848 कांगड़ा, जसवार और दातारपुर के राजाओं का विद्रोह, 1855-56 में संथालों का विद्रोह। ये सभी विद्रोह ईस्ट इंडिया कम्पनी की आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक नीतियों के कारण हुए। यही अग्नि धीरे-धीरे सुलगते हुए 1857 में विकराल रूप से धधक उठी और ईस्ट इंडिया कम्पनी के भारतीय साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया।

1857 की क्रांति का स्वरूप 

       इतिहासकारों ने 1857 की क्रांति के स्वरूप के विषय में भिन्न-भिन्न मत प्रकट किये हैं 

यह एक सैनिक विद्रोह था – 

 इस विचार के प्रतिपादक सर जॉन लारेन्स और जान सीले हैं।  सर जान सीले के अनुसार 1857 का विद्रोह “एक पूर्णतया देशभक्ति रहित और स्वार्थी सैनिक विद्रोह था जिसमें न कोई स्थानीय नेतृत्व ही था और न ही सर्वसाधारण का समर्थन हासिल था।” उसके अनुसार “यह एक संस्थापित  

सरकार के विरुद्ध भारतीय सेना  विद्रोह था

 यह सही है कि यह विद्रोह एक सैनिक विद्रोह के रूप में आरम्भ हुआ लेकिन सभी स्थानों पर यह सेना तक सीमित नहीं था। सभी सैनिक भी विद्रोह में सम्मिलित नहीं हुए, बल्कि अधिकांश सैनिक सरकार के साथ थे। विद्रोही जनता के प्रत्येक  वर्ग से आये थे। अवध में इसे जनता का समर्थन प्राप्त था और इसी प्रकार बिहार के कुछ जिलों में ऐसा हुआ। 1858-59 के अभियोगों में सहस्रों असैनिक, सैनिकों के साथ-साथ विद्रोह के दोषी पाए गए तथा उन्हें दण्ड दिया गया। 

यह धर्मांधों का ईसाइयों के विरुद्ध युद्ध था 

 यह मत एल. ई. आर. रीज का है उनका यह कहना कि “यह धर्मांधों का ईसाइयों के विरुद्ध युद्ध था” से सहमत होना अत्यंत कठीन है।  विद्रोह की गर्मी में भिन्न-भिन्न धर्मों के नैतिक नियमों का लड़ने वालों पर कोई नियंत्रण नहीं था।दोनों दलों ने अपनी-अपनी ज्यादतियों को छिपाने के लिए अपने-अपने धर्म ग्रंथों का सहारा लिया।

अंततः ईसाई जीत गए ईसाई धर्म नहीं। हिन्दू और मुसलमान पराजित हो गए परन्तु हिन्दू और मुसलिम धर्म पराजित नहीं हुए। ईसाई धर्म प्रचारकों ने ईसाई धर्म के प्रचार के लिए अथक प्रयास किये पर ज्यादा सफलता नहीं मिली। यह न तो धर्मों का युद्ध था और न ही जातियों का युद्ध था। बल्कि यह एक देश के नागरिकों का विद्रोह था जो उन्होंने विदेशी शक्ति  विरुद्ध लड़ा। 

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ऋग्वैदिककालीन राजा सुदास और दाशराज्ञ युद्ध

ऋग्वैद में दस राजाओं के एक संघ और राजा सुदास के बीच युद्ध का वर्णन आया है, जिसमें राजा सुदास ने दस राजाओं के इस संघ को पराजित कर भारत में एक चक्रवर्ती राज्य की स्थापना की। ‘ऋग्वैदिककालीन राजा सुदास और दाशराज्ञ युद्ध’ के विषय में विस्तृत जानकारी के लिए इस लेख को लिखा गया है ताकि हम अपने सबसे प्राचीन राजा के विषय में विस्तार से जान सकें। अपने प्राचीन सांस्कृतिक गौरव की तथ्यपरक जानकारी होना प्रत्येक नागरिक के लिए अपेक्षित है।

ऋग्वेद का काल

ऋग्वेद का काल बहुत पुराना है और उसकी गणना में बहुत से विद्वान भिन्न-भिन्न राय रखते हैं। कुछ विद्वानों के अनुसार, ऋग्वेद का समय 1500 ईसा पूर्व से लेकर 1200 ईसा पूर्व तक था। यह वह समय है जब भारत की धर्म और संस्कृति का निर्माण हो रहा था और इस समय ऋग्वेद के मन्त्र लिखे गए थे। इस समय को ऋग्वैदिक काल के रूप में जाना जाता है।

कौन था राजा सुदास

इतिहास में ऐसे विरले ही उदाहरण प्राप्त होते हैं जब एक महाप्रतापी राजा के बाद उसका पुत्र उससे भी अधिक प्रतापी हो। ऋग्वैदिककालीन राजा सुदास अपवाद रूप से ऐसा ही प्रतापी पुत्र था, जिसने अपने पिता दिवोदास की सफलताओं को बहुत आगे बढ़ाया। दिवोदास जिसने पहाड़ के दस्युओं के संकट को नष्ट करके सप्तसिंधु को आर्यों के लिए सुरक्षित ही नहीं कर दिया, बल्कि हिमालय की समृद्ध चरागाहों और उपत्यकाओं, उसकी खानों का रास्ता भी खोल दिया, और सिंधु से सरस्वती तक के आर्य-जनों में एकता स्थापित करके उसे एक राज्य का रूप दे दिया। लेकिन सारे आर्यजन इसके लिए तैयार नहीं थे, इसलिए दिवोदास के मरते ही उन्होंने हर जगह विद्रोह कर दिया। इसके लिए राजा सुदास को अपने पिता से भी अधिक संघर्ष करना पड़ा।

सुदास और दासराज्ञ युद्ध के सम्बन्ध की बहुत-सी ऐतिहासिक सामग्री ऋग्वेद में मिलती है। वशिष्ठ ऋषि का एक पूरा सूक्त ( 7|18 ) इसी के वर्णन में है। त्रित्सु जन भी पहले विरुद्ध था। त्रित्सु-भरत के वैभव के लिए ही उसने संघर्ष किया था। पृथु और पर्शु जन भी उसके सहायक थे। पृथु और पर्शु नाम के जन ईरानियों में भी मिलते हैं। इससे यह नहीं समझना चाहिए, कि वैदिक पृथु-पर्शु पीछे ईरान में देखे जाने वाले पर्सियन  और पार्थियन जन हैं। ईरानी और सप्तसिंधु के आर्य एक ही वंश की दो शाखाएं थीं। दोनों के एक जगह रहने के समय प्राचीन पृथु-पर्शु जन के ही कुछ लोग ईरान गए गए, और कुछ सप्तसिंधु में आए यह असंभव नहीं है। 

सुदास के सहायकों में भरतों के पुराने पुरोहित दीर्घतमा की संताने भी थीं। भारद्वाज की संतानों को यद्यपि सुदास के समय पुरोहित (मंत्री) पद से वंचित किया गया,  किंतु उन्होंने सुदास के शत्रुओं  का साथ दिया हो, ऐसा कोई वृतांत नहीं मिलता। वशिष्ठ तो युद्ध के मुख्य सूत्रधार थे, और शायद उनके संबंधी जमदग्नि भी उनके साथ रहे। विश्वामित्र ने पीछे वशिष्ठ का स्थान ग्रहण किया, दासराज्ञ युद्ध में वह और उनका जन कुशिक सुदास का सहायक था।

दस राजाओं का संघ

दस राजा शत्रु थे, लेकिन उसका यह अर्थ नहीं, कि शत्रुओं की संख्या केवल दस ही थी। मुख्य शत्रु दस थे । लेकिन इनकी संख्या ऋग्वेद में नहीं दी गई है। विद्वानों का भी इसमें मतभेद है। तो भी दस प्रमुख शत्रुओं में 

1- तुर्वश, 2- यदु, 3- अनु, 4- द्रुह्यु 5-पुरु ( प्रमुख शत्रु), 6- शिम्यु, 7- कवष ( कुरुश्रमण का पुरोहित ), 8-भेद , 9-10, दो वैकर्ण रहे होंगे। 

तुर्वश और यदु के पुरोहित कण्व थे, एवं द्रुह्यु के भृगु ( गृत्समद ), पुरु के अत्रि। इनके भी अपने यजमानों के साथ होने की अधिक सम्भावना है। इसमें भी कोई अचरज नहीं कवष के कारण उनका यजमान कुरुश्रमण भी सुदास के विरोध में सम्मिलित हो गया हो। तुर्वश-यदु ने एक बार मत्स्यों पर आक्रमण किया था, लेकिन मत्स्य अब अपने शत्रुओं के साथ मिलकर सुदास के विरोध में थे। इस प्रकार (11 ) मत्स्य दस की सूची से बाहर के शत्रु थे।  12- पक्थ ( पख्तून ), 13- भलानस,  14- अलिन, 15- विषाणी, 16- अज, 17- शिव, 18- शिग्रु, 19- यक्षु , ये सभी किसी न किसी समय शत्रु थे। 

युध्यामधि, चायमान कवि, सतुक, उचथ, श्रुत, वृद्ध, मन्यु के नाम भी आते हैं, जो भी सुदास के विरुद्ध इस संघर्ष में शामिल हुए थे। 

वसिष्ठ पुरोहित 

भरद्वाज दिवोदास के समय बहुत प्रभावशाली थे, लेकिन सुदास के समय दाशराज्ञयुद्ध-विजय के समय वसिष्ठ उनसे भी अधिक प्रभाव रखते थे। वसिष्ठ स्वयं को भरतों ( सुदास जन ) का विधाता मानते थे।  वह कहते हैं ( 7 | 33 | 6 )– “गौ की तरह भरत पहले दंड से भयभीत अ-जन, ( अनाथ ) बच्चे से थे, इसमें पहले ( जब ) कि वसिष्ठ उनके पुरोहित हुए।  फिर त्रित्सुओं ( भरतों ) की प्रजा खूब बढ़ी।”  दुर्मित्र ( त्रित्सु ) सुदास के अपने जन युद्ध में भागने के लिए मजबूर हुए, और उन्होंने सारा धन ( भोजन )  सुदास को प्रदान किया ( 7 | 18 | 14 ) ।”  सारे  भोजन के देने की बात का उल्लेख फिर (17 ) वसिष्ठ करते हैं।

भरद्वाज के कुल वालों ने शरीर से भी दिवोदास की सहायता की थी। उस वक़्त अभी श्रुवा और असि का बँटवारा नहीं हुआ था, और न असि उठाने का काम किसी एक वर्ग के हाथ में दे दिया गया था।वसिष्ठ के लोग सुदास के लिए खुलकर लड़े थे, जिसके लिए ऋषि ने स्वयं उन्हें प्रेरित किया था ( 7 | 33 | 1-3 ) — “मेरे गोरे, दक्षिण ओर चूड़ा बांधने वाले प्रसन्न हो, मैं उठकर कहता हूँ, कि तुम मुझसे दूर न रहो” फिर सुदास की सफलता में अपने कुल वालों की सहायता का उल्लेख करते हैं (3 )–“कौन इस प्रकार नदी पार हुआ है, किसने इस प्रकार भेद को मारा, किसने इस प्रकार दाशराज्ञ में सुदास की रक्षा की ? वसिष्ठ को, तुम्हारी वाणी से इंद्र ने रक्षा की।” 

सिर पर सारे केश को रखना प्राचीनकाल से मुसलामानों के आने के समय तक हमारे यहां ( भारत में ) प्रचलित था। उसे बहुत सजाकर जूड़े की की शक्ल में बाँधा जाता था। चूड़ा ( जूड़ा ), अलग-अलग जनों की अलग -अलग ढंग से बाँधी जाती थी। वसिष्ठ कुल के लोग लोग सिर के दाहिनी ओर बांधते थे, इसीलिए उन्हें “दक्षिणतः कपर्दा” ( दाहिने जूड़ा वाले ) कहा गया है।

ईस्वी सन के आरम्भ होने के करीब तक स्त्रियां भी पगड़ी बांधती थीं। वैदिक नारियां भी उसे बांधती होंगी।  ऐसा होने पर वसिष्ठ के कुल की स्त्रियां भी दक्षिणतः : कपर्दा रही होंगी। कुमारियाँ चार-चार कपर्द बांधती थीं।   ( 10 | 114 | 3 ) उन्हें चतुष्कपर्दा कहते थे। यहाँ कपर्द से जूड़ा नहीं, बल्कि चोटी अभिप्रेत हो सकती है — शायद दो कपर्द कानों के पास से सामने लटकते थे, और दो पीछे की ओर।

सुदास  का कोई भाई प्रतर्दन भी था। यद्यपि ऋचाओं में इसके लिए कोई प्रमाण नहीं मिलता। कुछ वेद विशेषज्ञों का मानना है कि प्रतर्दन बड़ा लड़का था, जिसे भरद्वाज ने पिता की गद्दी पर बैठाया। पर, मनस्वी सुदास इसे बर्दास्त नहीं कर पाया, अथवा वह योग्य पिता का योग्य पुत्र नहीं था।, और दिवोदास की सफलताओं को अक्षुण्ण नहीं रख सकता था।

असंतुष्ट लोगों ने सुदास का पक्ष लिया, जिमें वसिष्ठ मुख्य थे।  वसिष्ठ ने सुदास का अभिषेक करके उसे भरतों का राजा घोषित किया। दोनों भाइयों में लड़ाई हुई, सम्भवतः इस लड़ाई में प्रतर्दन मारा गया, और जिस तरह समुद्रगुप्त की गद्दी बैठ अपने बड़े भाई रामगुप्त को मारकर चन्द्रगुप्त विक्रमाद्तीय बन बैठा, वैसे ही सुदास भरतों का अधिराज हुआ। ऐसा मानने पर त्रित्सुओं के साथ आरम्भ सुदास के संघर्ष की व्याख्या हो जाती है। 

सुदास 

वसिष्ठ सुदास ने दान दिये, जिनका उल्लेख वसिष्ठ ने स्वयं किया है ( 7 | 18 | 22-23 ) – “देवता के नाती सुदास ने वधुओं के साथ दो रथ और दो सौ गायें मुझे दीं। हे अर्हन ( पूजनीय ) अग्नि, पैजवन ( सुदास ) के  दान को पा होता की तरह मैं स्तुतिगान करता घर जा रहा हूँ।” “पैजवन ( सुदास ) ने  सोने के आभूषण वाले चार घोड़े मेरे लिये दान दिये ( 23 )।” 

दिवोदास का पुत्र सुदास था, इस पर कुछ विद्वान संदेह प्रकट करते हैं, जिसकी वसिष्ठ के इस वचन ( 7 | 18 | 24 ) से गुंजाइश नहीं रहती — “हे मरूतो, पिता दिवोदास की तरह सुदास की सहायता करो ( दिवोदास न पितरं ) । और पैजवन के घर की रक्षा करो।” वशिष्ठ सुदास के ही श्रद्धाभाजन नहीं थे, बल्कि पौरूकत्सि त्रसदस्यु भी उनकी कृपा का पात्र था, इसीलिए वह इंद्र की महिमा गाते कहते हैं ( 7 | 19 | 3 )– “तुमने सुदास की साड़ी रक्षाओं से रक्षा की, युद्ध में पौरूकत्सि त्रसदस्यु की रक्षा की।” इससे यह संदेह हो सकता है, कि त्रसदस्यु सुदास से नहीं लड़ा, पर यह भिन्न समय की बात हो सकती है।वसिष्ठ कहते हैं —

   “इंद्र, हवि-दाता दानी सुदास के लिये वह भोजन अन्न-धन सदा है ( 7 | 19 | 6 )।”

    “इंद्र ने सुदास के लिये लोक बनाया, धन दिया ( 7 | 20 | 2 )।”

   “इंद्र, तुम्हारी सैकड़ों रक्षाएं और सहस्रों प्रशंसायें सुदास के लिए हो( 7 | 25 | 3 ) ।” 

   “सुदास के रथ को न कोई हटा सकता, न रोक सकता है, जिसका कि रक्षक इंद्र है। वह गौओं-वाले व्रज में जाता है ( 7 | 32 | 10 ) ।” 

   “हे इंद्र-वरुण, दास और आर्य शत्रुओं को मारो, सुदास की रक्षा करो।”

वशिष्ठ के कथन से ( 7 | 83 | 1 ) पता लगता है, कि इन्द्र-वरुण की कृपा प्राप्त पृथु और पर्शु गायों के ( लूटने के ) लिये पूर्व दिशा में गये। “तुमने दासों और वृत्रों को मारा, आर्य शत्रु को मारा और सुदास की रक्षा की।”  पहले जिन शत्रुओं के विरुद्ध ऋषि अपने देवताओं से प्रार्थना करते थे, वह दस्यु थे, किन्तु अब आर्य और दस्यु दोनों के नाश के लिये उन्हें प्रार्थना करनी पड़ी। सुदास के शत्रु तो मुख्यतः आर्य ही थे। 

दाशराज्ञ युद्ध 

1-शत्रु- 

शम्बर युद्ध की तरह दाशराज्ञ युद्ध भी कोई एकाध साल का संघर्ष नहीं था। इसमें सुदास का लम्बा समय लगा था। वसिष्ठ कहते हैं ( 7 | 83 | 6-7 )—“इंद्र-वरुण ने दस राजाओं से बाधित सुदास की त्रित्सुओं के साथ रक्षा की।” इसका अर्थ यह है कि त्रित्सुओं के साथ जो गृह-कलह हुआ था, अब शांत हो गया था, एवं दस राजाओं ने सुदास और उसके त्रित्सुजन  को पराजित करने का प्रयास किया था। अगली ऋचाओं में वसिष्ठ कटे हैं, कि अ-यज्ञकर्ता, अ-भक्त दस राजाओं ने इकठ्ठा हो ( समिता ) सुदास से युद्ध किया।”समिता” का अर्थ एकत्रित होना है, या समितौ ( युद्धक्षेत्र ) में  लड़ने की बात यहाँ की गई है।

सुदास के शत्रुओं में तुर्वश और यदु मुख्य थे। वसिष्ठ के कहने से ( 7 | 18 | 6-8 ) पता लगता है कि “तुर्वश, मत्स्य, भृगु और द्रह्यु ने मिलकर एक-दूसरे का सहायक बन आक्रमण किया।” अगली दो ऋचाओं ( 7,8 ) से मालूम होता है कि पक्थों, भलानसों, अलिनों, विषाणियों, शिवों ने भी आक्रमण  किया था, जिसमें आर्य की गायें त्रित्सुओं को मिलीं। दुर्दांत, बुरी नियत वाले शत्रुओं ने परुष्णी को लिया, पर अंत में चयमान का पुत्र कवि पृथ्वी पर गिर पड़ा।

परुष्णी में शत्रुओं को मुंह की खानी पड़ी, और सुदास ने उनको छिन्न-भिन्न कर दिया , एक अन्य दूसरे स्थान पर इसी युद्ध के विषय में वसिष्ठ कहते हैं ( 7 | 83 | 8 ) –“दाशराज्ञ में सब तरफ से घिरे सुदास को इंद्र-वरुण ने सहायता की।युद्ध में कपर्द वाले सफ़ेद त्रित्सु प्रार्थना करते थे।”

विश्वामित्र ने व्यास और सतलुज को अगाध से गाध बनने के लिए ऐसी सुन्दर प्रार्थना की है, जिसे ऋग्वेद की सर्वोत्कृष्ट कविता कह सकते हैं। परन्तु, नदियों को गाध बनाने का दवा वसिष्ठ भी करते हैं। नदियां ऋषि की प्रार्थना से गाध न हुईं हों। संयोग से वैसा हो जाना असम्भव नहीं। शत्रुओं का पीछा करते सुदास के घुड़सवारों ने कहीं पर नदी में काम पानी पाया होगा। यह घटना दाशराज्ञ युद्ध के समय हुयी थी, अतः वसिष्ठ को ही इसका श्रेय देना पड़ेगा।

वसिष्ठ इसके विषय में कहते हैं ( 7 | 18 | 5 )–“इंद्र ने सुदास के लिए नदियों को गाध और सुपारा कर दिया।” इसके बाद ही तुर्वश, मत्स्य, भृगु, द्रुह्यु आदि के ऊपर प्रहार और चायमान कवि के मारे जाने का उल्लेख है। इससे यही जान पड़ता है, कि जिस नदी को पार करके सुदास ने शत्रुओं पर आक्रमण किया था, शत्रुदि और विपाश नहीं, बल्कि परुष्णी ( रावी ) थी। दोनों वैकर्णों के 21 लोगों को राजा ( सुदास ) ने काटा, वैसे ही जैसे ऋत्विज यज्ञ में कुश को काटता है। ( 7 | 18 | 11-14 ) यही नहीं बल्कि वहीँ (12 ) उल्लेख हैं, कि  वज्रबाहु ( इंद्र ) ने श्रुत कवष, वृद्ध और द्रुह्यु को पानी में डूबा दिया।

जान पड़ता है, परुष्णी ( रावी ) को पर कर शत्रुओं ने एक बार भरतों की भूमि ( रावी और सतलुज के बीच का द्वाव ) में आने में सफलता प्राप्त की थी। सुदास ने उनके ऊपर जो भीषण आक्रमण किया, उससे भागते शत्रुओं के कितने ही लोग नदी में डूबकर मर गए। सुदास ने किसी जगह नदी को सुपार पा उसे पार कर शत्रुओं का पीछा किया। वसिष्ठ के आगे के वचन (13 ) से यह पता चलता है, कि सुदास ने अपने शत्रुओं के सात-दुर्गों को ध्वस्त किया।  उनकी बहुत सी सम्पत्ति त्रित्सुओं को मिली।  इस युद्ध में भारी नर-संहार हुआ था—“आक्रमणकारी अनु और द्रुह्यु के साठ सौ, छः हज़ार, छियासठ वीर मर क्र सो गए। “

सुदास का सबसे बड़ा युद्ध यही दाशराज्ञ युद्ध था, जिसमें उसने अपने शत्रुओं को बुरी तरह से हरा कर परुष्णी ( रावी ) के पश्चिम भगाते उनके देश पर आक्रमण किया। 

वसिष्ठ सुदास के शत्रु भेद का भी  उल्लेख ( 7 | 18 | 18 ) करते सुदास की सफलता का श्रेय इंद्र को देते हुए कहते हैं–“इंद्र, तुम्हारे बहुत से शत्रु पराजित हो गये। अब अश्रद्धालु भेद को बस में करो। जो ( कोई ) तुम्हारी स्तुति करता है उसको यह हानि पहुंचता है। उसे वज्र से मारो।” भेद नाम आर्य जैसा मालूम नहीं होता, हो सकता है, दाशराज्ञ युद्ध  को फंसा और निर्बल देख कर इस नाम के किसी राजा या जन के किसी राजा या जन के हाथ-पैर फ़ैलाने  की कोशिश की हो। 

इन सफलताओं के बाद सुदास की कीर्ति का बढ़ना स्वाभविक था।  वसिष्ठ ने भी  कहा है ( 7 | 18 | 24-25 ) — “जिस ( सुदास ) की कीर्ति पृथ्वी-आकाश के भीतर विस्तृत है, जिसने खूब दान बांटा है, लोग जिसकी स्तुति इंद्र तरह करते हैं, जिसने युद्ध में युधयामधि को नष्ट किया मरुत इस सुदास को पिता दिवोदास की तरह मानें।  पैजवन निकेत की रक्षा करें, सुदास का  बल अविनाशी अजर तथा अशिथिल हो।”

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प्रथम मुस्लिम आक्रमणकारी जिसने भारत की धरती पर कदम रखा-मुहम्मद-बिन-कासिम

सर वुल्जले हेग ने ठीक कहा है कि इस्लाम का उदय इतिहास के चमत्कारों में से एक है। सन 622 ईस्वी में एक पैगम्बर ने मक्का छोड़ कर मदीना की शरण ली। एक शताब्दी बाद उस शरणागत के उत्तराधिकारी और अनुयायी एक ऐसे साम्राज्य पर शासन करने लगे जिसका विस्तार प्रशांत महासागर से सिंधु तक और कैस्पियन से नील तक था। भारत पर मुसलमानों के आक्रमण से पूर्व भारत की दशा कैसी थी ? अरबों द्वारा सिंध विजय पर विचार करने से पूर्व आठवीं शताब्दी के आरम्भ में भारत की दशा पर संक्षिप्त प्रकाश डालना आवश्यक है। 

 

प्रथम मुस्लिम आक्रमणकारी

आठवीं शताब्दी में भारत की राजनीतिक दशा 

 राजनीतिक रूप से भारत में कोई केंद्रीय शक्ति नहीं थी। चन्द्रगुप्त मौर्य के समय से अफगानिस्तान भारत का अंग था। हृवेनसांग के अनुसार काबुल की घाटी में एक क्षत्रिय राजा का शासन था और उसके उत्तराधिकारी नवीं शताब्दी तक शासन करते रहे। इसके पश्चात् लालीय की अधीनता में एक ब्राह्मण वंश की स्थापना हुयी।मुस्लमान लेखकों ने इस वंश को हिन्दुशाही साम्राज्य अथवा काबुल या जाबुल का साम्राज्य कहा है। अरबों के आक्रमण के समय अफगानिस्तान के शासकों के नाम अनभिज्ञ हैं। 

सातवीं शतब्दी में कश्मीर में दुर्लभवर्मन ने हिदुवंश की स्थापना की। हृवेनसांग ने उसके शासनकाल में कश्मीर की यात्रा की। उसके उत्तराधिकारीप्रतापदित्य ने प्रतापपुर की नींव रखी।ललितादित्य मुक्तापीड़ जो 724 ईस्वी में सिंहासन पर बैठा, पंजाब, कन्नौज, दर्दिस्तान और काबुल का विजेता सिद्ध हुआ। वह अपने वंश का सबसे शक्तिशाली शासक था।उसके समय में सूर्य देवता  के लिए मार्तण्ड मंदिर बनवाया गया। 740 ईस्वी के लगभग उसने कन्नौज के राजा यशोवर्मन को परजित किया। 

 सातवीं शताब्दी में नेपाल, जिसके पूर्व में तिब्बत व् दक्षिण में कन्नौज का राज्य था, हर्ष के साम्राज्य में मध्यवर्ती राज्य था।  अंशुवर्मन ने ठाकुरी वंश की नींव रखी।  उसने तिब्बत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बनाये। आ उसने अपनी कन्या का विवाह तिब्बत के शासक के साथ किया।  हर्ष की मृत्यु के बाद तिब्बत व नेपाल की सेना ने चीन के राजदूत वांग ह्युन्सी ( wang-hieun -tse ) को कन्नौज के सिंहासन का अपहरण करने वाले अर्जुन के विरुद्ध सहायता प्रदान की। 730 ईस्वी  में नेपाल स्वतंत्र हो गया। 

हर्ष के समय असम में भास्करवर्मन का शासन था। हर्ष की मृत्यु के पश्चात् उसने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। परन्तु वह एड्ज अधिक समय तक स्वतंत्र न रह सका और शिलास्तंभ ( एक म्लेच्छ ) ने भास्करवर्मन को पराजित किया और लगभग 300 वर्षों तक असम म्लेच्छों की अधीनता में रहा। 

हर्ष की मृत्यु के पश्चात् अर्जुन ने कन्नौज पर अधिकार कर लिया। उसने चीन के राजदूत वान ह्यूंगसे  का विरोध किया जो हर्ष की मृत्यु के उपरंत वहां पहुंचा था। उसके कुछ साथियों को कारावास में डाल दिया गया अथवा कुछ की हत्या कर दी गई और उनकी संपत्ति भी लूट ली गयी। वान ह्यूंगसे किसी प्रकार बचकर नेपाल पहुँच गया और असम, तिब्बत व नेपाल की सहायता लेकर लौटा।अर्जुन पराजित हुआ और चीन ले जाया गया। आठवीं शताब्दी के आरम्भ में कन्नौज के सिंहासन पर यशोवर्मन बैठा। उसने कन्नौज का पुराना गौरव लौटाया। वह सिंध के राजा दाहिर का समकालीन था। 

सिंध में शूद्र वंश का राज्य था। सिंध पर हर्ष ने विजय प्राप्त की थी परन्तु हर्ष की मृत्यु के उपरंत सिंध स्वतंत्र हो गया। शूद्र वंश का अंतिम शासक साहसी था। उसकी मृत्यु के उपरांत उसके ब्राह्मण मंत्री छाछ ने उसके राज्य पर अधिकार कर  नए वंश की नींव रखी। छाछ के पश्चात् चंद्र व चंद्र के पश्चात् दाहिर गद्दी सी  पर बैठा। इसी दाहिर ने सिंध में अरबों का सामना किया। 

बंगाल में शशांक हर्ष का समकालीन था। इसकी मृत्यु के पश्चात् बंगाल में अराजकता फ़ैल गई।  750 ईस्वी में प्रजा ने गोपाल को अपना शासक चुना। गोपाल ने 750-770 ईस्वी तक शासन किया। गोपाल द्वारा स्थापित किये गए वंश ने 12 वीं शताब्दी तक शासन किया। धर्मपाल, देवपाल व महिपाल इस वंश के प्रसिद्ध शासक हुए। 

केंद्रीय राजपुताना में मंडोर के स्थान पर प्रतिहारों का सबसे पुराना व प्रसिद्ध राज्य था।  हरिश्चंद्र के परिवार ने यहाँ शासन किया।  उनकी एक शाखा दक्षिण में कन्नौज की ओर स्थापित हो गई।  राष्ट्रकूट राजा दन्तिदुर्ग ने गुर्जर नेता को पराजित किया।  यह बताया जाता है कि कन्नौज की विजय से पूर्व प्रतिहार अवन्ति के स्वामी थे।  

यह भी बताया जाता है कि नागभट्ट प्रथम ने म्लेच्छ राजा की विशाल सेनाओं को नष्ट कर किया। उसने अरबों से पश्चिमी भारत की रक्षा की।

नागभट्ट व दन्ति दुर्ग दोनों ने अरबों के आक्रमणों  उत्पन्न अशांति में लाभ उठाने का प्रयास किया। यद्यपि आरम्भ में दन्तिदुर्ग को कुछ लाभ हुआ किन्तु वह लाभ स्थायी न रहा। आरम्भ में असफलता होने पर भी नागभट्ट ने मृत्यु समय एक शक्तिशाली साम्राज्य छोड़ा जिसमें मालवा, राजपुताना, व गुजरात के कुछ भाग सम्मिलित थे। 

           चालुक्य वंश का सबसेप्रतापी राजा पुलकेशिन द्वतीय हर्ष का समकालीन था। 665 ईस्वी से 681 ईस्वी तक विक्रमादित्य ने राज्य किया।उसके पुत्र विनयादित्य ने 681 ईस्वी से 689 ईस्वी तक शासन किया। उसका उत्तराधिकारी विजयादित्य हुआ जिसने 689 से 733 ईस्वी तक शासन किया। उसने कांची पर  प्राप्त करके पल्लव राजाओं से कर प्राप्त किया। वह अरबों के  आक्रमण के समय राज्य कर रहा था। 

          अरबों के आक्रमण के समय पल्लवों का शासक नरसिंहवर्मन द्वितीय था। उसने 695 से 722 ईस्वी तक राज्य किया। उसने ‘राजसिंह’ ( राजाओं में सिंह ), ‘आगमप्रिय’ ( शास्त्रों का प्रेमी ) और ‘शंकरभक्त’ ( शिव का उपासक ) की उपाधियाँ धारण कीं। उसने कांची में कैलाशनाथ का मंदिर बनवाया। 

         उपरोक्त अध्य्यन से यह स्पष्ट हो जाता है कि सिंध पर अरबों के  समय ऐसा एक भी शक्तिशाली राज्य नहीं था जो सफलतापूर्वक मुसलमानों के आक्रमण को रोक पाता। भारतीय शासक संकट के समय भी एक न हो सके।  देशभक्ति  पूर्णतया अभाव था। भारतीय शासक व्यक्तिगत विजयों के लिए ही लड़ते थे। 

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शासन-प्रबन्ध – उस समय राजतन्त्र था।  ज्येष्ठाधिकार का पालन होता था। कभी-कभी शासकों का चुनाव भी होता था।  गोपाल जिसने पालवंश स्थापना की थी, प्रसिद्ध राजनीतिक दलों द्वारा चुना  गया था। राजा कार्यपालिका का प्रधान, सेना का मुख्य सेनापति और न्याय का स्रोत होता था। कुछ शासक निरंकुश भी होते थे परन्तु उनसे धर्मानुसार शासन की आशा की जाती थी। 

    राजा की सहायता के लिए एक मंत्रिपरिषद होती थी। जिसमें – संधिविग्रहिक, सुमंत, महादण्डनायक, महाबलाधिकृत, अमात्य, अक्षपटाधिकृत आदि मंत्री होते थे। इसके अतिरिक्त एक पुरोहित भी होता था जो धर्म विभाग का अधिकारी होता था। मंत्रिपद पैतृक होते थे। 

       उत्तर भारत के राज्य कई प्रांतों ( भुक्ति ) में बंटे थे दक्षिण में इन्हें मंडल कहा जाता था। इनके लिए कहीं-कहीं राष्ट्र अथवा देश शब्द का किया गया है। प्रत्येक राज्य उपरिक के अधीन था। प्रत्येक प्रान्त कई जिलों में विभक्त था जिन्हें ‘विषय’ कहा जाता था। इनका अधिकारी विषयपति होता था। जिलों में कई गांव के समूह थे और शासन-प्रबंध की इकाई था।

प्रत्येक गांव में एक मुखिया और गांव के वृद्ध व्यक्तियों की एक पंचायत होती थी। प्रत्येक पंचायत में विभिन्न छोटी-छोटी समितियां होती थीं जो गांवों की आवश्यकताओं की देखभाल करती थीं। गांव का अध्यक्ष ( अधिकारी ) ‘अधिकारिन’ कहलाता था। नगर का प्रबंध नगरपति के अधीन था  जिसकी सहायता के लिए कई नगरों में नागरिकों द्वारा चुनी हुई सभा थी।

राज्य की आय का मुख्य साधन राजकीय भूमिकर, अधीनस्थ राजाओं से भेंट, चुंगी कर, सिंचाई कर, सड़कों व नावों व खानों आदि पर कर थे।  इसे ‘भाग’ कहते थे। 

धार्मिक दशा ( Religious Condition ) इस समय बौद्ध धर्म अवनति पर था, किन्तु फिर भी बिहार में पाल व बंगाल में सेन राजाओं के समय तक इस धर्म के अनुयायी मिलते थे।  धर्मपाल ने, जिसने 780 ईस्वी से 810 ईस्वी तक शासन किया, एक विशाल बौद्ध विश्विद्यालय विक्रमशिला ( जिसमें 107 मंदिर व 6 विद्यालय थे ) की स्थापना की।  जैन धर्म अधिक समय तक चलता रहा और विशेषकर दक्षिण के लगभग सभी राज्यों में जैन धर्म का थोड़ा बहुत प्रभाव शेष था।

राष्ट्रकूट, चालुक्य, गंग और होयसल राज्यों में वैष्णव और शैव धर्म की स्थापना के पहले जैन धर्म चरम पर रह चुका था।  कुमारिल भट्ट, शंकराचार्य, रामानुज और माधवाचार्य जैसे प्रसिद्ध धार्मिक उपदेशकों ने हिन्दू समाज की धार्मिक मनोवृत्ति में परिवर्तन किया।  सुधरा हुआ हिन्दू धर्म एक शक्तिशाली धर्म बन गया।  अधिकांश शासक हिन्दू धर्म के अनुयायी थे, किन्तु वे अन्य धर्मों के प्रति भी सहनशील थे। उस समय किसी प्रकार के धार्मिक अत्याचार नहीं किये जाते थे। 

सामाजिक दशा ( social condition ) जाति प्रथा पहले से अधिक कठोर हो चुकी थी। इस समय ब्राह्मणों के सैनिक और क्षत्रियों के व्यापरी बनने के उदाहरण भी मिलते हैं लेकिन शूद्रों के लिए व्यवसाय बदलना असम्भव था। यद्यपि वैश्यों और शूद्रों ने शक्तिशाली राज्यों का शासन भी संभाला। 

        अंतर्जातीय विवाह निषिद्ध थे और अधिकांश लोग अपनी ही जाति में विवाह करते थे। अधिकांश सवर्ण लोग शाकाहारी थे और वे प्याज व लहसुन तक का प्रयोग नहीं करते थे। अस्पृश्यता चार्म पर थी। हिन्दू समाज में बहुविवाह की प्रथा थी प्रचलित थी, परन्तु स्त्रियों के लिए पुनर्विवाह वर्जित था। सती प्रथा भी प्रचलित थी। शिक्षा सिर्फ उच्च वर्ग में प्रचलित थी। हर तरफ अन्धविश्वास का बोलवाला था। सम्पूर्ण हिंदू समाज जातियों में बिखरा एक कमजोर समाज था जो मुसलमानों के आक्रमणों को रोकने में पूर्णतया असमर्थ था। 

 यह ठीक है कि वास्तव में सिंध को अरबों ने 722 ईस्वी में विजय किया परन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि उससे पूर्व कोई  कोशिश न हुई थी। खलीफा उमर के समय 636-637 ईस्वी में बम्बई के निकट थाना ( Thana ) की विजय के लिए एक मुस्लिम नाविक अभियान भेजा गया परन्तु वह असफल रहा।

दूसरा प्रयास 644 ईस्वी में स्थल मार्ग द्वारा मकरान के तट से पश्चिमी सिंध में किया गया।  यह अभियान अब्दुल्ला-बिन-अमर के नेतृत्व में खलीफा उस्मान ने भेजा था। वह सिस्तान की विजय करके मकरान की ओर अग्रसर हुआ। उसने मकरान और सिंध के शासकों को हराया। सिंध को विजय करके भी उसको राज्य में मिलाना उपयुक्त न समझा गया।

खलीफा को बतया गया कि सिंध में पानी और फलों की कमी है और वहां के डाकू बड़े साहसी हैं। यदि थोड़े सैनिकों को भेजा गया तो उनकी हत्या कर दी जाएगी और यदि भूतों को भेजा गया तो वे भूखे मर जायेंगे। ऐसा होते हुए भी अरब लोग सिंध के सीमावर्ती क्षेत्रों पर स्थल मार्ग से आक्रमण करते रहे।

अल-हरीस ने सन 659 ईस्वी में प्रारम्भ में कुछ सफलता प्राप्त की परन्तु अंत में वह हार गया और 662 ईस्वी में मारा गया। अल-मुहल्लब ने 664 ईस्वी में फिर हिम्मत की परन्तु वह हार गया। अब्दुल्ला इस काम को करता हुआ मारा गया। अंत में अरबों ने आठवीं शताब्दी के प्रारम्भ में मकरान विजय कर लिया।  इस प्रकार सिंध की विजय का मार्ग प्रशस्त हुआ। 

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क्या मुग़ल सम्राट हिन्दू धर्म विरोधी थे -Religious policy of Mughal emperors from Babar to Aurangzeb

वर्तमान में भारत की राजनीतिक स्थिति को दृष्टिगत रखते हुए इस लेख को लिखने का विचार मन में आया। हमें आज तमाम लोग यह कहते दिख जायेंगे कि मुगलों ने हिन्दुओं और हिन्दू धर्म को बहुत क्षति पहुंचाई। इनमें से अधिकांश लोग किसी राजनितिक दल विशेष के अंध समर्थक होंगे या फिर वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ। लेकिन हम यह भी नहीं मान सकते कि मुग़ल धार्मिक रूप से धर्मसहिष्णु थे। इस लेख में हम ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर मुगलों की धार्मिक नीति का निष्पक्ष विश्लेषण करेंगे और वास्तविक स्थिति को पाठकों के सामने प्रस्तुत करेंगे। 

क्या मुग़ल सम्राट हिन्दू धर्म विरोधी थे -Religious policy of Mughal emperors from Babar to Aurangzeb

 

मुग़ल कौन थे ?

भारत में मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर था जिसे बाबर के नाम से जाना जाता है। वंश क्रम में वह पिता की ओर से तैमूर से छठे तथा माता की ओर से चंगेज से पन्द्रहवें स्थान पर आता था। इस प्रकार वह तैमूर और चंगेज खां दोनों परिवारों से संबंधित था और उसमें मध्य एशिया के दो बड़े विजेताओं का रक्त मिला हुआ था। बारह वर्ष की आयु में बाबर के पिता सुल्तान उम्रशेख मिर्जा की मृत्यु हो गयी और बाबर फरगना ( उज्बेकिस्तान का मध्य प्रान्त ) का राजा बन गया। 

भारत पर मुगलों का अधिकार

पानीपत का युद्ध 1526- पूरी तैयारी करने के पश्चात् बाबर भारत को विजय करने निकल पड़ा। सबसे पहले उसे दौलत खान से युद्ध करना पड़ा, जिसने अलाउद्दीन को लाहौर से निकाल दिया था। उसको पराजित करने के पश्चात् बाबर सरहिन्द के रास्ते से दिल्ली की ओर बढ़ा। इब्राहिम लोदी बाबर से युद्ध करने के लिए दिल्ली से बाहर आ गया। विरोधी सेनाएं पानीपत के ऐतिहासिक मैदान में आमने-सामने आ गईं। बाबर के पास विशिष्ट सुविधाएं थीं। उसके तोपखाने ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।  इब्राहिम लोदी की पराजय हुई। फलस्वरूप दिल्ली और आगरे पर बाबर का अधिकार हो गया। 

डा. ईश्वरी प्रसाद के अनुसार “पानीपत के युद्ध ने दिल्ली के साम्राज्य को बाबर के हाथों में सौंप दिया। लोदी वंश की शक्ति चूर-चूर हो गई और भारत वर्ष की सत्ता चग़ुताई तुर्कों हाथों में चली गई।”

मुगलों का राज्य सोलहवीं सदी में प्रारम्भ हुआ। उस समय की भारत की अवस्था ने उनकी धार्मिक नीति पर प्रभाव डाला। मुगलों से पहले भारत में सुल्तानों का शासन था। उन सुल्तानों ने हिन्दुओं के प्रति उदारता का बर्ताव नहीं किया। हिन्दुओं को विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया गया शासन सत्ता में उनका कोई स्थान नहीं था। हिन्दुओं को जबरन मुसलमान  बनाया गया। परन्तु मुगलों ने सुल्तानों की धार्मिक नीति से सबक लेते हुए उस नीति को बदला और सत्लतनत के मुक़ाबले अधिक स्थायित्व के साथ साम्राज्य की नींव रखी। 

मुग़ल सम्राटों की धार्मिक नीति 

बाबर की धार्मिक नीति – यह भलीभांति ज्ञात है कि बाबर में चंगेज खां और तैमूर का रक्त था। उसमें धार्मिक कट्टरता लेशमात्र भी नहीं थी। तैमूर भी चंगेज का संबंधी था। उसमें भी धार्मिक कट्टरता नहीं थी। वह सुन्नी और सिया में कोई अंतर नहीं समझता था। वह कभी जिहाद करने वाला गाजी और कभी इस्लामेत्तर धर्मों का अनुयायी था। ऐसी ही परम्परा उसके वंशजों में थी। 

बाबर को खुदा में बहुत विश्वास था। बाबर का मानना था कि यदि सच्चे दिल से प्रार्थना की जाये तो वह अवश्य ही स्वीकार होती है और खुदा वैसा  ही करता है जैसा प्रार्थना करने वाला मांगता है। बाबर नमाज पढता था और रोजे भी रखता था।  अपनी अकांक्षाओं को पूरा करने के लिए वह शिया बन गया। वह धार्मिक आडंबरों को कोई महत्व नहीं देता था। उसने एक शिया महिला से विवाह किया और उसे सबसे अधिक प्यार किया। उसने शिया पत्नी के पुत्र हुमायूँ को अपना उत्तराधिकारी भी बनाया। इन सब बातों का यह प्रभाव था कि उसने किसी वर्ग पर भी अत्याचार नहीं किया।

यद्यपि वह कट्टर सुन्नी था।परन्तु गजनी के महमूद की तरह धर्मांध नहीं था। उसने हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा-भाव से लिखा है और उनके विरुद्ध जिहाद को वह एक पवित्र कर्तव्य मानता था।उसने फतेहपुर सीकरी और चंदेरी में हिन्दुओं की खोपड़ियों का एक बुर्ज निर्माण करने की आज्ञा दी थी।

हुमायूं की धार्मिक नीति- हुमायूँ की धार्मिक नीति भी बाबर के समान थी। उसे धार्मिक मामलों में बड़ी रुचि थी। अकबर की माता शिया थी। बैरम खां भी शिया था। शाह अबुल माली जो हुमायूँ का विशेष कृपापात्र था, वह भी शिया था। बहुत समझाने  और बुझाने पर हुमायूँ ने शिया धर्म स्वीकार किया। उसने सूफियाना ढंग से दरबार का गठन किया। उसने अपने-आपको सूर्य और अपने दरबारियों को ग्रह-नक्षत्र और तारे बताया। 

अकबर की धार्मिक नीति – अकबर की माता ( हमीदा बानू बेगम ) शिया थी जिसका संबंध एक सूफी परिवार से था। उसका जन्म एक राजपूत की छत्रछाया में अमरकोट के स्थान पर हुआ था।  उसके शिक्षक  शिया थे या सुलह-कुल की नीति में विश्वास रखने वाले थे। उसने अपना राज्य का कार्य पंजाब से शुरू किया जहां गुरु नानक ने हिन्दुओं और मुसलमानों में धार्मिक सहिष्णुता का उपदेश दिया था।  उस बातावरण ने भी अकबर पर प्रभाव डाला होगा। 

अकबर की धार्मिक नीति का स्वरूप तथा उद्देश्य 

इतिहासकारों ने अकबर की धार्मिक नीति और उद्देश्यों के विषय में परस्पर विपरीत मत प्रस्तुत किये हैं। विन्सेंट स्मिथ तथा के० ए० निजामी के मत में वह पैगम्बर-शासक का रूतवा (पद ) प्राप्त करने की चेष्टा कर रहा था। उन्होंने अकबर के इस कार्य की निंदा की है। दूसरी ओर अतहर अली आदि कुछ इतिहासकारों  के अनुसार अकबर  का उद्देश्य एक धर्म-निरपेक्ष राज्य की स्थापना करना था।

एक अन्य मत जिसके प्रतिपादक मुख्यतः आई. एच. कुरेशी हैं, अकबर परम्परावादी इस्लाम का उत्पीड़न कर रहा था, जबकि इक्तिदार आलम खां के अनुसार अकबर की धार्मिक नीति का उद्देश्य अभिजात प्रशासक वर्ग में, जिसका गठन विभिन्न जातियों, वर्गों, तथा धर्मों द्वारा किया गया था , संतुलन पैदा करना था।

अकबर के व्यक्तिगत धार्मिक विचार क्या थे और उन्होंने अकबर की धार्मिक नीति को किस हद तक प्रभावित किया, इस विषय पर भी भारी मतभेद हैं। अकबर की धार्मिक नीति की समीक्षा के लिए हमें उसका अध्ययन एक व्यापक परिप्रेक्ष में करना होगा। 

अकबर की धार्मिक विचारधारा के विभिन्न चरण हैं जिसके क्रमबद्ध अध्ययन से उसके उद्द्देश्य सुस्पष्ट हो जाते हैं —

प्रथम चरण – 1562-1574 

अकबर ने अपने शासन के प्रारंभिक चरण में ऐसी कई उदारवादी नीतियां अपनाईं जिन्हें मुग़ल साम्राज्य को एक नवीन सैद्धांतिक आधार प्रदान करने की दिशा में प्रथम आयाम माना जा सकता है। उसने युद्ध में  मारे गए या बंदी बनाये गए लोगों के परिवारों को दास बनाए जाने की प्रथा समाप्त कर दी। इस संबंध में अबुल फजल का कथन है : यदि पति धृष्टतापूर्ण व्यवहार करते हैं तो इसमें पत्नियों का क्या दोष? इसी प्रकार यदि पिता विरोध का मार्ग अपनाते हैं तो इसमें बच्चों का क्या दोष है? यही नहीं, ऐसे लोगों की पत्नियां तथा भोले-भाले बच्चे युद्ध की सामग्री का हिस्सा नहीं हैं। 

धार्मिक कर की समाप्ति

   1563 में अकबर ने धार्मिक यात्रा कर को समाप्त कर दिया। अबुल फजल बताता है कि इस कर से प्रतिवर्ष एक करोड़ की आय होती थी। अबुल फजल के अनुसार अकबर ने अपने कार्य को इस प्रकार उचित ठहराया : “यद्यपि किसी सम्प्रदाय-विशेष ( गैर मुसलमान ) में ज्ञानाभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है, किन्तु उस सम्प्रदाय-विशेष के अनुयायियों से जिन्हें यह एहसास ही नहीं कि वे गलत राह पर हैं, पैसा वसूल करना तथा इस प्रकार अद्वैत के अलौकिक प्रवेश द्वार के मार्ग में, जो उन्होंने अपनी समझ-बूझ के अनुसार अपनाया है तथा जिसे वे कर्ता की उपासना का माध्यम समझते हैं, रोड़ा अटकाने के कार्य को विवेकसम्मत बुद्धिजीवियों ने नापसंद किया है तथा इसको ईश्वर की इच्छा का पालन न करने का चिह्न समझा है।”

जजिया कर की समाप्ति 

अकबर द्वारा जजिया कर समाप्त करने की तिथि के विषय में कुछ मतभेद हैं। जजिया कर वह कर था जो मुस्लिम राज्य में रहने वाली गैर-मुस्लिम प्रजा से लिया जाने वाला व्यक्तिगत कर ( poll-tax ) था। अबुल फजल ने इसकी समाप्ति की तिथि मार्च 1564 बताई है। उसका कहना है कि पहले के शासक इस कर को अन्य धर्मों को शक्तिहीन बनाने तथा उसके प्रति अपनी घृणा प्रदर्शित करने का एक साधन समझते थे।

किन्तु अकबर धर्मों के मध्य भेदभाव नहीं करता था व उसे अतिरिक्त राजस्व की भी आवश्यकता नहीं थी। इसलिए उसने इस कर को समाप्त कर दिया। किन्तु बदायूंनी ने जजिया कर की समाप्ति का वर्ष 1579 ईस्वी बताया है। वह इस विषय में कोई विशेष विवरण नहीं देता। 

उद्देश्य: अकबर द्वारा किये गए उपर्युक्त उपायों के विषय में इक्तिदार आलम का मत है कि यह राजपूतों को वश में करने की नीति का एक हिस्सा था जो उसने उज्बेकों की शक्ति को प्रति-संतुलित करने की निति थी। वह राजपूतों की शक्ति का प्रयोग उज्बेकों के विरुद्ध करना चाहता था। यह भी सम्भव है कि ये कार्य अकबर के उदार तथा मानवतावादी दृष्टिकोण से प्रेरित हुए हों तथा मुग़ल साम्राज्य को नवीन सैद्धांतिक आधार प्रदान करने की दिशा में आरंभिक उपाय हों।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि शासन के आरम्भिक वर्षों में अकबर राज्य के परम्परावादी इस्लाम-प्रधान स्वरूप में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करना चाहता था। 1568 में चित्तौड़ की विजय के बाद जारी किए जाने वाले फतहनामा में चित्तौड़ की विजय को काफिरों के प्रति जिहाद कहा गया। विजय का उद्देश्य बहुदेववाद की समाप्ति  था।

1569 में इस्फ़हान के मिर्जा मुकीम तथा कश्मीर के मीर याकूब को उलमा की सम्मति से शिया-सुन्नी आधार पर मौत की सजा दी गई। अकबर ने बाद में स्वयं इस तथ्य को स्वीकार किया है कि पहले वह इस्लाम को न मानने वालों का उत्पीड़न करता था तथा इसी को इस्लाम समझता था। जैसे-जैसे मेरा ज्ञान बढ़ा मैं यह सोच-सोच कर शर्मिंदा हुआ। 

द्वतीय चरण – 1575-1579 

इबादतखाना का निर्माण – अकबर की धार्मिक नीति के विकास का दूसरा आयाम 1575 ईस्वी में इबादतखना की स्थापना से प्रारम्भ होता है जो धार्मिक विषयों पर वाद-विवाद के उद्देश्य से बनवाया गया था। पिछले दशक में मुग़ल साम्राज्य के प्रभुत्व की स्थापना में आश्चर्यजनक सफलता मिलने के कारण अकबर यह विश्वास करने लगा था कि उसे दैवी अनुकम्पा विशेष रूप से प्राप्त है जिसके कारण धार्मिक विषयों के प्रति उसकी स्वाभाविक जिज्ञासा जाग्रत होने लगी थी।

बदायूंनी का कथन है “पादशाह को कई वर्षों तक युद्धों में उल्लेखनीय व अपार सफलता प्राप्त होती रही थी।  साम्राज्य के स्वरूप में दिन-प्रतिदिन विस्तार हो रहा था……. ( पादशाह ) अब अपना समय “ईश्वर के वचन” व “पैगम्बर के वचनों” की चर्चा में व्यतीत करते थे। पादशाह सलामत की रुचि सूफी मत से संबंधित प्रश्नों,विद्वतापूर्ण चर्चा, दर्शन तथा फ़िक़्ह की गूढ़ताओं  के विषय में जिज्ञासा-समाधान आदि में अधिकाधिक बढ़ती जा रही थी। 

अकबर अपनी अतीतकालीन सफलताओं के लिए कृतज्ञता की भावना से द्रवित होकर वह सुबह के समय घंटों प्रार्थना व चिंतन में अपना समय व्यतीत करता था। अकबर वाद-विवाद के दौरान स्वयं वह उद्देश्य व्यक्त किया था “हे ज्ञानियों तथा मुल्लाओं मेरा एकमात्र उद्देश्य सत्य की जाँच करना तथा वास्तविकता का पता लगाना है, ( अतः ) आपको सत्य को छुपाना नहीं चाहिए और न ही अपनी मानवीय कमजोरियों के प्रभाववश ऐसी कोई बात करनी चाहिए जो सत्य के विपरीत हो। अगर आप ऐसा करेंगे तो आप अपनी कर्तव्य-शून्यता के परिणामों के लिए ईश्वर के सम्मुख स्वयं उत्तरदायी होंगे।”

उलेमाओं के प्रभाव को समाप्त करने उद्देश्य से अकबर ने 26 जून 1579 को फतेहपुर सिकरी की जामा मस्जिद में स्वयं खुतबा पढ़ने का साहस दिखाया। इसी दौरान उसने इस तथ्य भी बल दिया कि उसने अर्थात पादशाह ने अपनी सत्ता ईश्वर से प्राप्त की है। यद्यपि अकबर द्वारा किसी अन्य अवसर पर खुतबा पढ़े जाने का कोई संदर्भ नहीं मिलता किन्तु खुतबा पढ़ने की कार्यवाही का महत्व है क्योंकि इसके द्वारा अकबर ने उलमा को अपनी शक्ति के अधीन करने का दृढ़ संकल्प प्रस्तुत कर दिया था। 

अकबर द्वारा धार्मिक व भौतिक सत्ता को अपने हाथ में केंद्रित करने का विधिवत कार्य अगस्त-सितम्बर 1579 में महजर नामक दस्तावेज द्वारा हुआ। महजर जारी करने की प्रेरणा शेख-मुबारक तथा उसके पुत्र फैजी व अबुल फजल द्वारा दी गयी थी। उलमा ने इन दोनों पर महदवी व शिया होने का आरोप लगाकर उनका उत्पीड़न किया था। वे उलमा की शक्ति में कटौती का मौका पाकर खुश थे।

शेख मुबारक ने अकबर से कहा “पादशाह सलामत इस दौर के इमाम तथा मुज्तहिद ( जो शरअ की व्याख्या करने में सक्षम हो ) हैं.” आपको धर्मेत्तर विषयों में इन उलमा की सहायता की क्या आवश्यकता है?” महजर ने अकबर को यह अधिकार दिया कि उलमा में किसी विषय पर मतभेद होने की दशा में वह साम्राज्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए किस एक विचार को, जिसे वह सर्वोत्तम समझें, मान्यता दे सकता है। 

सैयद ए० ए० रिज़वी के मतानुसार “महजर का उद्देश्य उन सभी विषयों को, जो अकबर की हिन्दू-मुसलिम प्रजा से संबंधित थे, पादशाह के प्रत्यक्ष नियंत्रण में लाना था।” सम्भतः यह मत ही सबसे उपयुक्त लगता है। 

अंतिम चरण 1579-1605 

1579 के बाद के  काल में मुग़ल साम्राज्य के लिए अकबर ने उदार सैद्धांतिक आधार तैयार करने का कार्य संपन्न किया। इस कार्य में अबुल फजल ने प्रमुख भूमिका निभाई।  उसने अकबर की मुग़ल साम्राज्य की सैद्धांतिक आधार संबंधी अवधारणा को भली-भांति समझ लिया था तथा उसे एक विस्तृत व जटिल विचार पद्धति में ढाल दिया। आईने अकबरी तथा अकबरनामा इस विचार पद्धति की विवेचना की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे इस्लाम के विकल्प का प्रतिनिधित्व करते हैं। 

दीन-इलाही ( 1581 ) – 1581 ईस्वी में अकबर ने अपने धार्मिक विश्वासों के अनुकूल एक धर्म की स्थापना की जो इतिहास में दीन-इलाही के नाम से विख्यात है। अकबर का एकमात्र ध्येय धार्मिक समन्वय स्थापित करना था।  यह घोषणा उसने सभी धर्मों के विचारकों की एक सभा में की। उसमें सभी धर्मों के सिद्धांतों का सार मौजूद था। 

अबुल फजल ने दीन-ए-इलाही के विभिन्न रीति-रिवाजों की चर्चा की है। उस नए संप्रदाय/धर्म  का सदस्य बनने के लिए जिन-जिन नियमों का पालन आवश्यक था, उनकी व्याख्या भी अबुल फजल ने की है। दीन-ए-इलाही को स्वीकार करने के लिए अकबर से दीक्षा लेनी पड़ती थी और उसको गुरु मानना पड़ता था।

जो दीक्षा लेता था उससे आशा की जाती थी कि वह सम्राट के अनुकरण द्वारा अपना सुधार करे और आवश्यकता के अनुसार उससे मौखिक शिक्षा ग्रहण करे। जब दीन-ए-इलाही के दो सदस्य आपस में मिलते थे तो वह एक दूसरे का अल्लाह हू अकबर और जल्ला जलालहू द्वारा अभिवादन करते थे इत्यादि । 

यह बात ध्यान रखने योग्य है कि अकबर ने कभी भी दूसरे धर्म प्रचारकों की तरह जोर डालकर किसी को दीन ए इलाही का सदस्य ना बनाया। अपने धर्म को किसी पर थोपने का प्रयास नहीं किया।  उसके सारे दरबार में से केवल 18 व्यक्ति ऐसे थे जो दीन ए इलाही के अनुयाई बने। जिन लोगों ने नया धर्म स्वीकार किया उनके कुछ नाम थे शेख मुबारक, अबुल फजल, फैजी, मिर्जा जानी, अजीज कोका, राजा बीरबल आदि। बदायूंनी  जैसे कट्टर मुसलमानों ने इसकी कड़ी आलोचना की है।

वी० ए० स्मिथ ने लिखा है कि दीन ए इलाही अकबर की घोर मूर्खता का परिचायक था उसकी बुद्धिमत्ता का नहीं। निष्पक्ष इतिहासकारों ने अकबर की सूझबूझ की प्रशंसा की है। वान नोअरर इतिहासकार ने दीन-ए-इलाही के विभिन्न सिद्धांतों की व्याख्या की है और बदायूंनी की निंदा की है और स्पष्ट शब्दों में घोषणा की है कि मानवता के साधकों के बीच इतिहास में अकबर का ऊंचा रहेगा और आने वाली पीढ़ियां मानवता के पुजारी को श्रद्धांजलि अर्पित करेंगी और सम्मान से याद करेंगी।

यह कहा जाता है कि दीन-ए-इलाही का राजनीतिक महत्व धार्मिक महत्व से अधिक प्रभावशाली था। इससे सारे मुगल साम्राज्य में राजनीतिक एकता स्थापित हो सकी। जिस प्रकार अकबर ने एक नए विशाल साम्राज्य की स्थापना की थी, उसी प्रकार वह एक नए धर्म की स्थापना करना चाहता था। जिस प्रकार उसने धीरे-धीरे एक-एक प्रांत को जीतकर एक नए विशाल साम्राज्य को जन्म दिया था, उसी प्रकार वह सभी धर्मों के सिद्धांतों का सार निकाल कर एक स्थान पर इकट्ठा करना चाहता था।

परंतु अकबर अपने उत्साह में यह भूल गया कि साम्राज्य की स्थापना की भांति धर्म का निर्माण नहीं होता और विभिन्न तत्वों को भिन्न-भिन्न स्थानों से लाकर छोड़ा नहीं जा सकता। जिन लोगों ने धर्मों की स्थापना की, उन्होंने ऐसा करने की कभी चेष्टा न की। 

मानवता के प्रति प्रेम भावना से प्रेरित होकर उन्होंने सत्य, ईश्वर और जीवन के रहस्यों को अपने व्यक्तिगत अनुभव और साधना के आधार पर जनसमुदाय के बीच रक्खा, और उन पर  अपने ढंग से प्रकाश डाला और बाद में उनके अनुयायी विभिन्न दलों अथवा सम्प्रदायों में सिद्धांत के आधार पर बँट गये। इस प्रकार बिना उनके प्रयासों से नए-नए संप्रदायों का जन्म हुआ।

अकबर ने जो कुछ किया वह इसके विपरीत था। उसने मूलभूत सिद्धांतों की घोषणा पहले की और फिर अपने धर्म को सुनियोजित करने की व्यवस्था की। यही कारण है कि अकबर की मृत्यु के साथ दीन-ए-इलाही की मृत्यु हो गई। परंतु यह मानना पड़ेगा कि दीन-ए-इलाही का देश की राजनीति पर बड़ा प्रभाव पड़ा।

अपनी धार्मिक सहिष्णुता और उदारता की नीति द्वारा अकबर ने यह सिद्ध कर दिया कि इस्लाम और हिंदू धर्म में कोई मौलिक अंतर नहीं है। यदि अंतर है तो केवल कर्मकांड में। दीन-ए-इलाही द्वारा उसने ऐसे धर्म की व्यवस्था करनी चाही जिसमें सभी धर्मों के सत्य सम्मिलित हों। निश्चय ही यह एक साहसिक कदम था। साथ ही हिंदू-मुस्लिम सांस्कृतिक एकता की दिशा में क्रांतिकारी प्रयास भी हुआ। धार्मिक क्षेत्र में हिंदू और मुसलमानों के बीच एकता स्थापित करके अकबर राजनीतिक क्षेत्र में भी उन दोनों के बीच मैत्री का वातावरण तैयार करना चाहता था।

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HISTORY GK-important questions and answers for tgt,pgt history

इस ब्लोग्स में हम TGT और PGT परीक्षा में आने वाले संभावित प्रश्नों की एक हल प्रश्नोत्तरी लेकर आये हैं। हड़प्पा सभ्यता से सम्बंधित इम्पोर्टेन्ट प्रश्न जो अधिकांश प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं उन्हीं प्रश्नों को इस ब्लोग्स में हल किया गया है। 

 

 

HISTORY GK

हड़प्पा सभ्यता से संबंधित इम्पोर्टेन्ट प्रश्नोत्तरी 

(1)- वह प्रमुख हड़प्पाकालीन नगर जहाँ विशाल एवं भव्य  नगर-द्वार पाए गये। 

A-कालीबंगा 

B-धौलावीर 

C-सुरकोटड़ा 

D-उपर्युक्त (b) एवं (c) दोनों

 

(2) – हड़प्पा सभ्यता के सबसे अधिक संभावित प्रणेता कौन थे?

A-सुमेरियाई 

B-द्रविड़ अथवा भूमध्यसागरीय

C-आर्य 

D-ऑस्ट्रेलॉयड। 

 

(3) – हड़प्पाकालीन लोग वैदिक आर्यों से भिन्न और उनके पूर्ववर्ती थे, इस विचार के समर्थन में निम्नलिखित कौन-सा तर्क सही नहीं है :

A-आर्यों का नृवंशीय स्वरूप मोहनजोदड़ो के चार नृवंशीय ऑस्ट्रेलॉयड, भूमध्यसागरीय, मंगोलियन अल्पाइन समूहों से भिन्न था। 

B-आर्य पशुपालन और कृषि पर आधारित जीवन व्यतीत करते थे, जबकि हड़प्पाकालीन लोग अत्यधिक संगठित नगरीय जीवन बिताते थे। 

C-हड़प्पाकालीन लोगों का भोजन पूर्णतः शाकाहारी था, जबकि आर्य मांस और मछली भी खाते थे।

D-वैदिक आर्यों को सम्भवतः लोहे और सुरक्षात्मक कवच का ज्ञान था जबकि हड़प्पा सभ्यता में इसका पूर्णतः अभाव था। 

 

(4)- हड़प्पा सभ्यता के पतन के लिए सबसे संभावित कारण कौन-सा है?

 

A-सिंधु और रावी नदियों के  जल-मार्ग में विनाशकारी परिवर्तनों के कारण विध्वंसकारी बाढ़ें आई। 

B-विदेशी आक्रमण 

C-कृषि संबंधी उत्पादन में गिरावट 

D-उपर्युक्त किसी एक अथवा सभी कारणों से लोग अन्यत्र चले गए।

 

(5)- विभिन्न हड़प्पाकालीन स्थलों के उत्खनन से पता चलता है कि प्रत्येक समकालीन नगर के धार्मिक विश्वासों में कुछ-कुछ भिन्नता थी। लोथल और कालीबंगा के धार्मिक विश्वासों में क्या समानता थी?

A- मातृदेवी की पूजा 

B- अग्नि-पूजा

C- वृक्ष-पूजा 

D- पशु-पूजा 

 

(6) – ईरान की सीमा के समीप स्थित हड़प्पाकालीन स्थल का नाम :

A-सुरकोटड़ा 

B-सुक्तागेंडोर

C-कोटला निहंगखान 

D-आलमगीरपुर 

 

(7)- निम्नलिखित कारण से हड़प्पा सभ्यता विश्व की अन्य समकालीन सभ्यताओं से भिन्न है :

A-धार्मिक आस्थाएं और सामाजिक जीवन 

B-विज्ञान और प्रोद्योगिकी का विकास 

C-नगर-योजना, जल-निकासी और सफाई व्यवस्था

D-एक समान तौल एवं माप प्रणाली तथा वाणिज्य संबंध 

 

(8)- निम्नलिखित कौन-सी सभ्यता सिंधु अथवा हड़प्पा सभ्यता के समकालीन थी :

A-मिस्र 

B-मेसोपोटामिया 

C-सुमेर 

D-यूनानी

 

(9) – हड़प्पाकालीन लोगों के आभूषण किस धातु/वस्तु से निर्मित नहीं किए जाते थे?

A-स्वर्ण और चाँदी 

B-हाथी-दाँत और हड्डियां 

C-ताम्र और बहुमूल्य पत्थर 

D-स्वेत धातु और मिश्रित धातु

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