अकबर का सम्पूर्ण इतिहास 1542-1605 : प्रारम्भिक जीवन और कठिनाइयाँ, साम्राज्य विस्तार, सामाजिक और धार्मिक नीति, मृत्यु और विरासत

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मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना ने भारतीय समाज और संस्कृति में एक अलग छाप छोड़ी है। मुग़लों के शासन को वर्तमान में घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। भारत में एक ऐसा वर्ग है जो समझता है की मुग़लों का शासन की मुस्लिम साम्राज्य था और वे गुलाम वंश से लेकर लोदी वंश तक को मुग़लों के साथ ही जोड़ देते हैं। जबकि मुग़ल साम्राज्य 1526 से शुरू होकर ब्रिटिश शासन की स्थापना तक है। लगभग 350 साल तक मुग़लों का शासन रहा। आज इस लेख में हम मुग़ल साम्राज्य के तीसरे और सबसे प्रसिद्ध शासक अकबर महान के विषय में सम्पूर्ण इतिहास जानेंगे। लेख को अंत तक अवश्य पढ़े।

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अकबर का सम्पूर्ण इतिहास 1542-1605 : प्रारम्भिक जीवन और कठिनाइयाँ, साम्राज्य विस्तार, सामाजिक और धार्मिक नीति, मृत्यु और विरासत

अकबर का सम्पूर्ण इतिहास:


अकबर का संछिप्त परिचय

जन्म का दिनांक 15 अक्टूबर, 1542 ई० में
जन्म का स्थान अमरकोट (सिन्ध) में
पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर
पिता हुमायूं
माता हमीदा बानो बेगम
प्रथम विवाह हिन्दाल की पुत्री रुकैया बेगम से 1551
राज्याभिषेक 14 फरवरी 1556 ई० कालानौर (गुरुदासप
संतान तीन पुत्र व तीन पुत्रिया
तीन पुत्र सलीम, मुराद व दानियाल इसमें सलीम का जन्म अम्बर का राजा बिहारी मल की पुत्री जोधाबाई के गर्भ से हुआ था। मुराद व दानियाल का जन्म अकबर की दो भिन्न उपपत्नियों से हुआ था।
तीन पुत्रियाँ खानम सुल्तान शुकुन निशा बेगम व आराम बानो बेगम
उत्तराधिकारी सलीम (जहांगीर), जबकि दो पुत्रों में मुराद की मृत्यु 1599 ई० में तथा दानियाल की मृत्यु 1604 ई० में अतिशय मदिरापान के कारण हुई।
अकबर की मृत्यु 25-26 अक्टूबर, 1605 ई०

 

विषय सूची

अकबर का प्रारम्भिक जीवन-


अकबर जिसका पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर था। वह हुमायूँ और हमीदा बानो बेगम (मरियम मकानी) की संतान था। अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई० को अमरकोट (सिंध) में राणा बीरसाल नामक एक राजपूत सरदार के घर में हुआ था। उस समय हुमायूँ दिल्ली की सत्ता से बेदखल होने के बाद राणा बीरसाल के यहां शरण पाया था।

अकबर के जन्म के समय हुमायूँ अमरकोट से दूर शाह हुसैन अरगून के विरुद्ध थट्टा और भक्खर अभियान पर था। उसी समय तारदी बेग खान नामक उसके एक घुड़सवार ने उसे पुत्र जन्म का शुभ समाचार सुनाया। पुत्र के जन्म का समाचार सुनकर हुमायूँ ने ईश्वर को धन्यवाद दिया तथा अपने साथियों के बीच कस्तूरी बांट कर उत्सव मनाया। किन्तु दुर्भाग्यवश किसी बात पर मतभेद हो जाने के कारण राजपूत सैनिकों ने मुगलों का साथ छोड़ दिया। इसी बीच हुमायूँ व शाह हुसैन अरगून के मध्य संधि हो गयी जिसके अनुसार हुमायूँ ने सिंघ छोड़ने का वचन दिया बदले में शाह हुसैन अरगून ने हुमायूँ को कुछ आर्थिक सहायता प्रदान की।

11 जुलाई, 1543 ई० को हुमायूँ अपने नवजात शिशु अकबर, पत्नी हमीदा बानू और कुछ साथियों के साथ सिन्ध नदी पार कर कन्धार की ओर प्रस्थान किया। वह कंधार की सीमा पर स्थित मस्तंग पहुंचा जहां काबुल के शासक कामरान की तरफ से उसका छोटा भाई अस्करी शासन कर रहा था। कामरान ने अस्करी से हुमायूँ को बन्दी बनाने का आदेश दिया। अतः अस्करी हुमायूँ पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा।

हुमायूँ को इसकी सूचना मिल गयी किन्तु वह अपने भाइयों से युद्ध करना नहीं चाहता था। अतः मस्तंग में ही उसने अपने शिशु अकबर को ‘जीजी अनगा’ व ‘माहम अनगा’ नामक दो धायों के संरक्षण में छोड़ कर पत्नी हमीदा बानों व अन्य साथियों के साथ कन्धार से ईरान की ओर प्रस्थान किया। अस्करी ने बालक अकबर के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया तथा उसकी देख-रेख अपनी पत्नी सुल्तान बेगम को सौंपा।

1545 ई० में जब हुमायूँ ने कन्धार पर आक्रमण किया तब अस्करी ने अकबर को काबुल भेज दिया जहां बाबर की बहन खानजामा बेगम ने उसका पालन-पोषण किया। 1546 ई० में बालक अकबर अपने माता-पिता से मिला। यहीं पर उसका खतना संस्कार हुआ और उसका नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर रखा गया।

कुछ समय पश्चात् हुमायूँ बदक्शां पहुंचा और अस्वस्थ हो गया। कामरान ने अवसर का लाभ उठा कर काबुल पर अधिकार कर लिया तथा अकबर को अपने संरक्षण में ले लिया। जब हुमायूँ को यह पता चला तो उसने काबुल के दुर्ग का घेरा डाला। उसकी तोपें दुर्ग की दीवारों पर गोला बरसाने लगी। इसी समय कामरान ने बालक अकबर को दुर्ग की दीवार से लटका दिया था। शहजादे को पहचान कर हुमायूँ ने अपने तोपों की दिशा बदल दी जिससे अकबर बच गया शीघ्र ही हुमायूँ ने काबुल पर विजय प्राप्त कर लिया, तत्पश्चात् अकबर को अपने माता-पिता का संरक्षण प्राप्त हुआ।

अकबर की प्रारम्भिक शिक्षा


जब अकबर पांच वर्ष का था तो हुमायूँ ने उसकी शिक्षा-दीक्षा का उचित प्रबंध किया। उसके लिए दो शिक्षक पीर मोहम्मद तथा बैरम खां को नियुक्त किया गया। किन्तु अकबर को शिक्षा प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं थी। उसकी अभिरुचि शिकार, घुड़सवारी, तीरंदाजी व तलवार चलाने आदि में थी। यद्यपि उसकी बुद्धि अत्यन्त ही तीव्र थी। उसने स्वेच्छा से प्रसिद्ध सूफी कवि हाफिज एवं जलालुद्दीन रूमी की रहस्यवादी कविताओं को कंठस्थ कर लिया था।

जब अकबर ने पढ़ाई के तरफ कोई ध्यान नहीं दिया तो हुमायूँ ने आरम्भ से ही उसे राज-काज में लगाना आरम्भ किया। जब वह मात्र नौ वर्ष का था तो 1551 ई० गजनी के राज्यपाल के रूप में पहली बार उसे औपचारिक दायित्व सौंप गया। अकबर ने यहां अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। लगभग इसी समय उसके चाचा हिन्दाल की पुत्री रुकैया बेगम के साथ उसका विवाह हुआ।

उत्तराधिकार और बैरम खां का संरक्षण


22 जून, 1555 ईस्वी में सरहिन्द के युद्ध में भी अकबर ने हुमायूँ का साथ दिया तथा यहां भी अपनी सैन्य प्रतिभा का परिचय दिया। सरहिन्द के युद्ध में अकबर की बहादुरी से हुमायूँ प्रसन्न हुआ और उसे सरहिन्द विजय का श्रेय दिया। दिल्ली की गद्दी पुनः प्राप्त करने के बाद हुमायूँ ने अकबर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तथा पंजाब के सुबेदार का दायित्व सौंपा और बैरम खां को उसका संरक्षक नियुक्त किया ।

अकबर का राज्याभिषेक

24 जनवरी, 1556 ई० को एक आकस्मिक दुर्घटना (पुस्तकालय की सीढ़ियों से गिरकर) में हुमायूँ की मृत्यु हो गयी। उस समय अकबर अपने शिक्षक व अभिभावक बैरम खां की संरक्षता में पंजाब में सिकन्दर सूर के विरुद्ध युद्धरत था। किसी विद्रोह या अशांति फैलने की आशंका से हुमायूँ की मृत्यु की सूचना को 17 दिनों तक गुप्त रखा गया।

दिल्ली के सिंहासन पर अकबर की ताजपोशी की औपचारिक घोषणा किए जाने तक मुल्ला बेकसी नामक एक व्यक्ति को जिसकी शक्ल हुमायूँ से मिलती-जुलती थी शाही लिबास पहना कर महल की छत से जनता के दर्शन कराए गए।

कलानौर में अकबर का राज्याभिषेक

अकबर को अपने पिता हुमायूँ के मृत्यु का समाचार 14 फरवरी, 1556 ई० को गुरुदासपुर के कलानौर नामक स्थान पर प्राप्त हुवा। इसी स्थान पर बैरम खां ने अकबर का राज्याभिषेक किया। उस समय उसकी आयु मात्र 13 वर्ष 4 माह थी। दिल्ली में उसके नाम का खुतबा पढ़ा गया। इस अवसर पर अकबर ने शाहंशाह का शाही खिताब धारण किया तथा बैरम खां को खान-ए-खाना की उपाधि प्रदान कर अपना ‘वकील-ए-सल्तनत’ अथवा प्रधानमंत्री नियुक्त किया।

अकबर की आरम्भिक कठिनाईयां

जिस समय अकबर गद्दी पर आसीन हुआ उसके समक्ष अनेक राजनैतिक व आर्थिक कठिनाइयां थी। देश अनेक छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त था जिसमें राजनैतिक एकता का अभाव था। प्रशासन नष्ट हो चुका था तथा अकाल व महामारी ने चारों तरफ अव्यवस्था फैला रखी थी।

तत्कालीन राजनैतिक स्थिति

1556 ई० में जब अकबर दिल्ली की गद्दी पर बैठा, उस समय मुगल साम्राज्य की राजनैतिक स्थिति सुदृढ़ नहीं थी। मुगल सत्ता दिल्ली और आगरा तक ही सीमित थी। पंजाब में मुगलों की स्थिति संतोषप्रद नहीं थी। भारत के बाहर मुगल साम्राज्य के अन्तर्गत काबुल, बदक्शां और कंधार थे। काबुल पर अकबर के सौतेले भाई (हुमायूँ की पत्नी मानचूचक बेगम से उत्पन्न) मिर्जा मोहम्मद हकीम मुनीम खां के संरक्षण में शासन कर रहा था तथा बदक्शां पर मिर्जा सुलेमान का अधिकार था।

हुमायूँ की मृत्यु के बाद मिर्जा सुलेमान ने स्वयं को स्वतंत्र घोषित कर लिया था। कंधार पर ईरान के शाह की नजर थी। अतः मध्य एशिया से अकबर को सहायता की कोई आशा नहीं थी।

भारत के अन्दर कश्मीर, व सिन्ध के स्वतंत्र राज्य की स्थापना हो चुकी थी। बिहार तथा बंगाल अफगानों के आधिपत्य में था । मालवा तथा गुजरात के शासक भी स्वतंत्र रूप से शासन कर रहे थे।

राजस्थान में जोधपुर (मारवाड़) का शासक मालदेव अभी जीवित था जो सम्पूर्ण उत्तरी भारत पर अपना एकछत्र राज्य स्थापित करना चाहता था।

इसके अतिरिक्त मेवाड़, अम्बर, जैसलमेर आदि के शासकों ने अपनी शक्ति को पुनः एकत्रित कर लिया था। गोंडवाना व उडीसा भी स्वतंत्र थे। दक्षिण भारत में खानदेश, बरार, बीदर, अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा दिल्ली से पूर्णतः स्वतंत्र थे।

विजयनगर साम्राज्य शक्तिशाली शासकों के अधीन अपनी उन्नति की चरम सीमा पर था। इस समय विदेशी शक्तियों का भी भारत में प्रवेश हो चुका था। पुर्तगालियों ने अरब सागर तथा फारस की खाड़ी पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। उन्होंने गोआ तथा दीव सहित अनेक बन्दरगाहों पर अधिकार कर लिया था।

इसके अतिरिक्त मुगलों को सबसे अधिक खतरा अफगानों से था। अफगान अभी भी सिकन्दर सूर एवं मोहम्मद आदिलशाह के नेतृत्व में पुनः दिल्लों की सत्ता प्राप्त करना चाहते थे। सिकन्दर सूर पंजाब से सम्पूर्ण उत्तर भारत की ओर अपनी शक्ति का विस्तार करना चाहता था। मोहम्मद आदिलशाह बिहार से आगरा तक दिल्ली घर अधिकार स्थापित करना चाहता था, उसका सेनापति हेमू एक विशाल सेना के साथ चुनार से दिल्ली की ओर अग्रसर था।

हेमू, मोहम्मद अदिलशाह का सेनापति था। इस्लामशाह के काल में बाजार अधीक्षक के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया तथा आदिलशाह के समय में वह शीर्ष पर पहुँचा। आदिलशाह ने अपने शासन की समस्त शक्ति उसके हाथों में सौंप दी थी। हेमू ने 24 लड़ाईयां लड़ी थी जिसमें से 22 में उसे सफलता मिली आदिलशाह ने उसे विक्रमाजीत की उपाधि दे अपना वजीर बनाया था और मुगलों को बाहर निकालने का काम सौंपा था।

तत्कालीन आर्थिक स्थिति

अकबर के सिंहासनारूढ़ होने के समय मुगल राज्य की आर्थिक स्थिति अत्यन्त दयनीय थी। राज्य की सीमा संकुचित होने के समय आय का स्रोत बहुत सीमित था। राजकोष रिक्त था। लगभग इसी समय दिल्ली, आगरा और बयाना के आस-पास के क्षेत्र भीषण अकाल व प्लेग की चपेट में आ गया जिससे जनसाधारण की हालत और भी कष्टप्रद हो गई। फलस्वरूप प्रशासनिक तंत्र बुरी तरह ठप्प हो गया था।

दरबारी अमीरों का षड्यंत्र-

आरम्भ में अकबर को अपने सम्बन्धियों व अमीरों के षड्यंत्र का भी सामना करना पड़ा अकबर का सौतेला भाई मिर्जा मुहम्मद हाकिम जो काबुल का प्रशासक था, अपनी महत्वाकांक्षी माता चूचक बेगम और अभिभावक मुनीम खां के संरक्षण में अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर चूका था तथा कुछ असंतुष्ट मुगल अमीरों के सहयोग से दिल्ली की गद्दी पर अधिकार करना चाहता था।

इसके अतिरिक्त शाह अबुलमाली जो हुमायूँ का अत्यन्त ही विश्वासपात्र व्यक्ति था तथा हुमायूँ को फर्जन्द (पुत्र) कह कर पुकारता था, वह भी राजसत्ता की उम्मीद कर रहा था। उसने अकबर के राज्याभिषेक में सम्मिलित होने से इंकार कर दिया था।

बैरम खां की संरक्षता (1556-60 ई०)

1556 से 1560 ई० तक का काल बैरम खां की संरक्षता का काल था। इस अवधि में अकबर ने बैरम खां के संरक्षण में शासन किया, क्योंकि वह अल्पायु में गददी पर बैठा था। बैरम खां कराकुईलु तुर्क (फारसी) और शिया मत का अनुयायी था। उसका जन्म बदक्शा तथा शिक्षा-दीक्षा बल्ख में हुई थी। वह एक अप्रवासी के रूप में आजीविका की खोज में भारत आया तथा हुमायूँ के एक साधारण सिपाही के रूप में अपनी सेवा शुरू की।

अपनी कर्तव्य परायणता व स्वामिभक्ति के कारण वह शीघ्र ही हुमायूँ का विश्वासपात्र बन गया। युद्ध के मैदान से लेकर दुर्दिन तक वह ईमानदारी पूर्वक हुमायूँ के साथ रहा। उसकी सेवाओं से प्रभावित होकर हुमायूँ उसे ‘खानबाबा’ कहा करता था। सरहिन्द विजय (1545 ई०) के पश्चात् हुमायूँ ने अकबर को युवराज तथा बैरम खां को उसका संरक्षक नियुक्त किया।

बैरम खां ने अकबर को आरम्भिक समस्याओं से उबारने में सहायता की तथा मुगल साम्राज्य को विस्तृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। इसके अतिरिक्त उसने अकबर की चचेरी बहन सलीमा बेगम से विवाह कर राजवंश से पारिवारिक सम्बन्ध भी स्थापित कर लिया। अतः अकबर के संरक्षक एवं सर्वोच्च प्रशासक के रूप में बैरम खाँ की शक्ति अत्यधिक बढ़ गयी।

पानीपत का द्वितीय युद्ध

तिथि 5 नवम्बर 1556 ई० में।
पक्ष अकबर और हेमू (हेमचन्द्र ) ।
परिणाम अकबर विजयी ।

पानीपत के द्वितीय युद्ध के विषय में डॉ० आर.पी. त्रिपाठी ने कहा है कि. हेमू की पराजय एक दुर्घटना थी, जबकि अकबर की विजय एक दैवीय संयोग था। हुमायूँ की आकश्मिक मृत्यु का समाचार सुनकर हेमू ने दिल्ली पर अधिकार करने के उद्देश्य से एक विशाल सेना के साथ प्रस्थान किया। मार्ग में उसने सरलतापूर्वक आगरा पर अधिकार कर लिया। उस समय आगरा का मुगल, सुबेदार इस्कन्दर खां उजबेग था जो बिना युद्ध किए ही दिल्ली भाग गया।

आगरा पर अधिकार करने के पश्चात् हेमू दिल्ली को ओर बढ़ा। दिल्ली का मुगल सुबेदार उस समय तार्दी बेग था। उसने हेमू का मुकाबला किया किन्तु पराजित हुआ। पराजित होने के बाद तार्दबेग, इस्कन्दर खां के साथ पंजाब भाग गया। हेमू ने दिल्ली पर अधिकार कर लिया तथा विक्रमादित्य की उपाधि धारण की “इस प्रकार मध्यकालीन भारत में वह एक मात्र हिन्दू शासक हुआ, जिसने दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार कर लिया।”

दिल्ली पर हेमू के अधिकार की सूचना अकबर और बैरम को जालंधर में मिली। इस घटना से मुगल खेमे में चिंता व्याप्त हो गयी। उस समय मुगलों की स्थिति बहुत दुर्बल थी। अतः अनेक सरदारों ने अकबर को काबुल जाने की सलाह दी। किन्तु अकबर और बैरम खां ने इसे स्वीकार नहीं किया तथा साहस के साथ हेमू से दिल्ली छीनने का निश्चय किया। खिज्र खां को पंजाब में सिकन्दर सूर पर नियंत्रण रखने का दायित्व सौंप कर बैरम खां ने अकबर के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान किया।

सरहिन्द के निकट उसे तीनों भगोड़े सरदार तार्दी बेग, इस्कन्दर खां उजबेग और अली कुली मिले। इसी समय बैरम खां ने चुपके से तार्दी बेग की हत्या करवा दी। तार्दी बेग की हत्या के सम्बन्ध में विद्वानों ने अपना अलग-अलग मत दिया है। कुछ इतिहासकारों ने बैरम खां के इस कार्य को व्यक्तिगत स्पर्धा और ईर्ष्या का कारण बताया है।

जहांगीर के काल में 1612 में प्रकाशित गुलशन-ए-इब्राहिमी अथवा तारीख-ए-फरिश्ता नामक पुस्तक के लेखक फरिश्ता ने बैरम खां द्वारा तार्दी बेग के विरुद्ध की गई कार्यवाही को उचित ठहराया है। कुछ आधुनिक इतिहासकारों का कहना है कि इस अवसर पर तार्दी बेग की हत्या किया जाना भगोड़ों को सबक सिखाने, मुगल सेना में आत्मबल को बढ़ाने और उन सलाहकारों की आवाज को समाप्त करना आवश्यक था जो अकबर को काबुल जाने की सलाह दे रहे थे।

सरहिन्द से मुगल सेना पानीपत के प्रसिद्ध युद्ध स्थल में आ पहुंची। हेमू ने अपने तोपखाने को साधारण संरक्षण में आगे भेज दिया। किन्तु अलीकुली खां के नेतृत्व में मुगलों की अग्रगामी टुकड़ी ने इस पर अधिकार कर लिया। इससे हेमू की स्थिति अवश्य दुर्बल हुई फिर भी वह मुगल सेना को रोकने के लिए पानीपत के मैदान में आ डटा ।

5 नवम्बर, 1556 ई० को दोनों सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ। हेमू अत्यन्त वीरता पूर्वक लड़ा किन्तु दुर्भाग्य से उसके आँख में तीर लग गया और वह घायल होकर अपने हाथी के हौदे में गिर गया। हेमू के घायल होते ही उसकी सेना मैदान छोड़कर भागने लगी।

हेमू के महावत ने उसे किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाने का प्रयास किया किन्तु वह मुगल अधिकारियों द्वारा पकड़ा गया। उसे अकबर के समक्ष पेश किया गया जहां बैरम खां ने अपनी तलवार से उसके गर्दन को धड़ से अलग कर दिया। हेमू की मृत्यु के साथ ही मुगलों की भारत पर विजय सुनिश्चित हो गई तथा दिल्ली और आगरा पर पुनः मुगलों का अधिकार हो गया। इस प्रकार हेमू की पराजय ने अफगान सत्ता को सदैव के लिए समाप्त कर दिया। पानीपत के इस युद्ध में विजय का श्रेय बैरम खां को दिया जाता है।

हेमू- कौन था?

इसका मूल नाम हेमचन्द था। यह रेवाड़ी का निवासी था तथा जाति से वैश्य (बनिया) था। अपने जीवन के आरम्भिक दिनों में वह नमक बेचा करता था। सुल्तान इस्लामशाह के काल में उसने बाजार अधीक्षक के रूप में अपना जीवन आरम्भ किया तथा आदिल शाह के समय में शीर्ष पर पहुँचा। उसकी योग्यता से प्रभावित होकर आदिलशाह ने उसे अपना वजीर तथा सेनापति नियुक्त किया था।

अपने स्वामी आदिलशाह की ओर से उसने 24 युद्धों में भाग लिया जिसमें 22 में उसे सफलता मिली। मध्यकालीन भारत में वह एकमात्र शासक था जिसने दिल्ली सिंहासन पर अधिकार किया। दिल्ली पर अधिकार के बाद उसने विक्रमादित्य की उपाधि धारण की। विक्रमादित्य की उपाधि धारण करने वाला हेमूं 14वां और अन्तिम शासक था। वह दिल्ली गद्दी पर बैठने वाला अन्तिम हिन्दू साम्राट था।

सूरवंश का अंत

दिल्ली पर पर पुनः अधिकार स्थापित करने के पश्चात् अकबर एवं बैरम खां ने शूरवंश के उत्तराधिकारियों की ओर ध्यान केंद्रित किया। सिकन्दर सूर ने भाग कर मानकोट के दुर्ग में शरण ली तथा सहायता के लिए आदिलशाह की प्रतीक्षा करने लगा। मुगलों ने दुर्ग का घेरा डाल दिया। इसी बीच 1557 ई० में बंगाल के खिज्र खां ने आदिलशाह को पराजित कर मार डाला। विवश होकर सिकन्दर सूर ने आत्मसमर्पण कर दिया। अन्त में अकबर ने क्षमा कर उसे बिहार की जागीर प्रदान कर दी जहाँ 1559 ई० में उसकी मृत्यु हो गयी। इस प्रकार अकबर के सूर प्रतिद्वन्दियों का अन्त हो गया। पंजाब, अजमेर, ग्वालियर तथा जौनपुर को विजित कर मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।

बैरम खाँ का पतन- कारण और परिस्थितियां


1556 से 1560 ई० तक बैरम खां ने अकबर के संरक्षक के रूप में कार्य किया तथा वकील-ए-सलतनत (प्रधानमंत्री) की हैसियत से राज्य को सुदृढ़ करने में अपना अमूल्य योगदान दिया। उसने हुमायूँ और अकबर दोनों के दुर्दिन में पूरी ईमानदारी व निष्ठापूर्वक साथ दिया।

अकबर जब गद्दी पर बैठा तो उस समय उसकी स्थिति अत्यन्त दुर्बल थी। बैरम खां ने ही अपनी सैनिक प्रतिभा और सूझबूझ से उसकी स्थिति सुदृढ़ की तथा राज्य का विस्तार किया। किन्तु मात्र चार साल बाद अर्थात 1560 ई० आते-आते उसका पतन सुनिश्चित हो गया जिसके इतिहासकारों ने कई कारण बताएं है-

(1) उसका व्यक्तित्व- यद्यपि बैरम खां ईमानदार, कर्त्तव्यनिष्ठ और स्वामिभक्त था किन्तु इसके साथ-साथ वह क्रोधी, दंभी, क्रूर और शंकालु भी था। प्रशासन में सर्वोच्च पदों पर रहने के कारण वह स्वयं को अपरिहार्य समझने लगा था। छोटे से अपराध के लिए कठोरतम दण्ड देता था। कई अवसरों पर उसने बिना अकबर की सलाह के अपराधी को मृत्य दण्ड दे दिया था। जैसे तार्दी बेग को दिल्ली से भागने के अपराध में उसकी हत्या करवा दी। अतः बैरम खां के इन कार्यों से मुगल अमीरों का एक वर्ग धीरे-धीरे उसका शत्रु हो गया तथा उससे मुक्ति पाने का उपाय ढूढने लगा।

(2) पक्षपातपूर्ण नीति- बैरम खां ने नियुक्तियों तथा पदोन्नतियों के सम्बन्ध में पक्षपातपूर्ण नीति अपनाई जो उसके पतन के उत्तरदायी कारणों में से एक है। उसने दोषारोपण कर पीर मुहम्मद को उसके पद से वंचित कर दिया तथा उसके स्थान पर हाजी मुहम्मद इस्फहानी को नियुक्त किया। सुन्नियों द्वारा मान्यता प्राप्त शेख मुहम्मद गयास को हटा कर उसके स्थान पर शिया मतावलम्बी शेख गदाई को सन्द्रे सुदूर के पद पर नियुक्त किया। इस नियुक्ति से सुन्नी वर्ग असंतुष्ट हो गया। जहाँ एक ओर बैरम खां के कृपापात्रों की पदोन्नति हो रही थी वहीं दूसरी और अकबर के सेवकों की उपेक्षा की जा रही थी। अतः बैरम खां के इस पक्षपात पूर्ण नीति के कारण लोगों के अन्दर उसके प्रति असंतोष व्याप्त होने लगा।

(3) शिया सुन्नी मतभेद – बैरम खां शिया मत का था जबकि दरबार में अधिकांश संख्या सुन्नी वर्ग का था। अतः दोनों के मध्य मतभेद निश्चित था। बैरम खा को कुछ पक्षपातपूर्ण नियुक्तियों के कारण सुन्नी वर्ग को आशंका होने लगी कि बैरम खां सुन्नी मतावलम्बी के प्रभाव को समाप्त कर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इन लोगों ने अकबर का ध्यान भी इस ओर केन्द्रित किया कि बैरम खां उसे गददी से हटा कर कामरान के शिया पुत्र अबुल कासिम को गद्दी पर बैठाना चाहता था। अकबर बैरम खां से सशंकित हो उठा तथा उसे हटाने का निश्चय किया।

(4) अकबर की महात्वाकांक्षा- बैरम खां के पतन के सभी कारणों में सबसे प्रमुख कारण अकबर की महात्वाकांक्षा और उसका स्वयं का असंतोष था। अकबर अब वयस्क हो चुका था। वह बैरम खां के संरक्षण में नाममात्र का शासक नहीं रहना चाहता था बल्कि सत्ता की शक्ति अपने हाथों में केन्द्रित कर वास्तविक शासक बनना चाहता था। अकबर की इस भावना को हरम की महिलाओं ने और प्रज्वलित कर दिया। हरम की महिलाओं का नेतृत्व महम अनगा कर रही थी जो अकबर की प्रधान धाय थी।

बैरम खां के विरुद्ध षड्यंत्र और उसका अंत

अकबर के परामर्श से बैरम खां के विरुद्ध एक कुचक्र रचा गया जिसमें सबसे प्रमुख भाग ‘अतका खैल’ (अकबर की देखभाल करने वाली औरतों एवं उनके सम्बन्धियों का समूह) ने लिया। इस समूह में अकबर की माता हमीदा बानो बेगम, महम अनगा, आधम खां, जीजी अनगा व उसका पति शम्सुद्दीन खान प्रमुख थे।

अकबर शिकार खेलने के बहाने आगरा से निकला और साथ में उसने कामरान के पुत्र अबुल कासिम को भी ले लिया, क्योंकि उसे यह आशंका थी कि उसकी अनुपस्थिति में बैरम खां अबुल कासिम को सिंहासन पर बैठाने का प्रयास करेगा। किन्तु मार्ग में वह दिल्ली पहुंचा जहां उसकी माता हमीदा बानो बेगम बीमार थी। दिल्ली में माहम अनगा ने बैरम खाँ के विरूद्ध अकबर के कान भरे। अतः अकबर ने बैरम खां को पद से हटाकर सारी सत्ता अपने हाथ में लेने का निश्चय किया। उसने अपने शिक्षक यार लतीफ के द्वारा बैरम खां को पद से हटाने का आदेश दिया तथा मक्का जाने को कहा।

यह आदेश पाते ही बैरम खां आश्चर्यचकित हो गया तथा उसने अकबर से भेंट करने की इच्छा प्रकट की जिसे अस्वीकृत कर दिया गया। अतः बैरम ने आदेश का पालन करते हुए अप्रैल, 1560 ई० में नागौर की ओर प्रस्थान किया।

बैरम खां का विद्रोह

अकबर की आज्ञा का पालन करते हुए बैरम खां ने मक्का यात्रा के लिए प्रस्थान किया। बैरम खां के प्रतिद्वन्द्वियों को इससे भी संतोष नहीं हुआ। उन्होंने अकबर के ऊपर दबाव डाला कि वह बैरम खां को शीघ्र मक्का के लिए प्रस्थान कराए। इस उद्देश्य से अकबर ने पीर मुहम्मद के अधीन एक सैन्य टुकड़ी बैरम खां के विरुद्ध भेजी।

बैरम खां ने इसे अपना अपमान समझा क्योंकि पीर मुहम्मद उसके अधीन रह चुका था तथा उसके आदेश से निर्वासित भी किया जा चुका था। अतः बैरम खां ने विद्रोह कर दिया अपने परिवार तथा सम्पत्ति को सरहिन्द के किले में छोड़कर पंजाब की ओर प्रस्थान किया।

अकबर ने शम्सुद्दीन अतगा खां को बैरम खां के विरुद्ध नियुक्त किया। दोनों के मध्य अगस्त 1560 ई० में शिवालिक की तलहटी में व्यास नदी के किनारे दिलवाड़ा नामक स्थान पर युद्ध हुआ जिसमें बैरम खां पराजित हुआ और आत्मसमर्पण कर दिया। उसे अकबर के समक्ष पेश किया गया। बैरम खां अकबर के पैरों पर गिर गया और रो पड़ा।

अकबर ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ उसका स्वागत किया तथा उसे साम्राज्य के सरदारों के शीर्ष पर दाहिनी ओर बिठाया। अकबर ने उसे सम्मान सूचक वस्त्र भेंट किए और उसके भावी जीवन के लिए उसके समक्ष तीन विकल्प रखे-

  • प्रथम– कालपी और चन्देरी जिलों के सुबेदारी का पद,
  • द्वितीय– शाही दरबार में शाहंशाह के विश्वस्त सलाहकार का पद तथा
  • तीसरा– मक्का के लिए प्रस्थान ।

बैरम खां ने मक्का जाने और अपना शेष जीवन वहीं बिताने की इच्छा व्यक्त की। शाहंशाह ने उसे मक्का जाने की अनुमति प्रदान कर दी। बैरम खां ने अपनी मक्का यात्रा के लिए प्रस्थान किया किन्तु दुर्भाग्यवश मार्ग में गुजरात के पाटन नामक स्थान पर 31 जनवरी, 1561 ई० को मुबारक खान नामक एक अफगानी युवक ने उसकी हत्या कर दी क्योंकि बैरम खां ने उसके पिता को मच्छीवारा के युद्ध (1555 ई०) में कत्ल किया था।

बैरम खां की हत्या के बाद उसके शिविर को लूट लिया गया। उसकी विधवा सलीमा बेगम अपने चार वर्षीय पुत्र अब्दुर रहीम सहित बड़ी कठिनाई से दयनीय स्थिति में अहमदाबाद पहुंची। बैरम खां की हत्या का समाचार सुनकर अकबर अत्यन्त दुःखी हुआ। उसके परिवार को शाही मार्ग रक्षकों के अधीन दरबार में लाया गया। बाद में अकबर ने बैरम खां की विधवा सलीमा बेगम से विवाह कर लिया तथा उसके बच्चे अब्दुर्रहीम का पालन-पोषण अपने पुत्र की तरह किया।

आगे चल कर यही अब्दुर्रहीम विशिष्ट सेनापति तथा विद्वान बना जिसे अकबर ने उसके पिता का खिताब खान-ए-खाना देकर सम्मानित किया।

पर्दा शासन अथवा ‘पेटीकोट’ शासन (1560-1564 ई०)


बैरम खां के पतन के बाद अकबर हरम की स्त्रियों के प्रभाव में आ गया तथा उन्हें शासन में कुछ हस्तक्षेप करने का अधिकार प्रदान किया। इसी कारण कुछ इतिहासकारों ने इस काल ( 1560-1564 ई० ) को पर्दा शासन या पेटीकोट शासन की संज्ञा दी है।

पर्दा शासन के अन्तर्गत हरम दल के महत्वपूर्ण सदस्यों में राजमाता हमीदा बानों बेगम, माहम अनगा, आधम खान, शिहाबुद्दीन अतका, मुल्लापीर मुहम्मद तथा मुनीम खां शामिल थे। इसमें शिहाबुद्दीन अतका दिल्ली का सुबेदार तथा माहम अनगा का दामाद था। मुल्ला पीर मुहम्मद अकबर का एक अध्यापक था जहां मुनीम खां हुमायूँ का सर्वाधिक विश्वसनीय साथी था। वह काबुल का प्रशासक था। बैरम खां उसे अपना राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानता था।

इन सभी सदस्यों में माहम अनगा सर्वप्रमुख थी तथा अन्य सदस्यों पर उसका अत्यधिक प्रभाव था। बैरम खां के बाद शासन के सभी उच्च पदों और सैनिक कमानों का पुनः वितरण किया गया। अधिकांश शीर्ष पदों पर हरम दल के सदस्यों को नियुक्त किया गया।

कुछ समय के लिए शासनकाल में हरम के सदस्यों का अत्यधिक प्रभाव अवश्य रूप से बढ़ गया था किन्तु यह कहना गलत होगा कि युवा शाहंशाह अकबर पर उनका अत्यधिक प्रभाव हो गया था। यद्यपि शासन नीति तय करने में हरम दल के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की किन्तु अकबर ने किसी के दबाव में आकर कोई कार्य नहीं किया और न ही किसी को इतनी छूट दी कि वह अपनी सुविधाओं को अधिकार मान लें।

छः माह में चार प्रधानमंत्री

मुगल प्रशासन में वकील-उस-सल्तनत (वकील-ए-मुतलक) अथवा प्रधानमंत्री का पद सर्वोच्च था। अकबर के काल में सर्वप्रथम यह पद बैरम खां को प्राप्त था। इस पद पर रहते हुए उसने अत्यधिक शक्ति अर्जित कर ली थी तथा एक निरंकुश प्रशासक की भांति व्यवहार करने लगा था। उसके प्रभाव को समाप्त करने के लिए अकबर को कठिनाईयों का सामना करना पड़ा।

बैरम खां के बाद अकबर पुनः इस गलती की पुनरावृत्ति नहीं करना चाहता था। अतः उसने शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ली तथा प्रधानमंत्रियों पर नियंत्रण रखने लगा। किसी को स्वतंत्र कार्य पद्धति अपनाने की छूट नहीं दी। इस उद्देश्य से अकबर ने जल्दी जल्दी चार व्यक्तियों को इस पद पर नियुक्त किया।

बैरम खां, के बाद अकबर ने 27 मार्च 1560 ई० को दिल्ली के सुबेदार शिहाबुद्दीन को अपना पहला- प्रधानमंत्र नियुक्त किया। इसके तुरंत बाद उसने शिहाबुद्दीन के साथ माहम अनगा को नियुक्त किया। इस प्रकार अकबर ने दो-दो प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने व पद्धति स्थापित की। कुछ समय पश्चात् शिहाबुद्दीन को हटाकर उसके स्थान बहादुर खान उजबेक को प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया। किन्तु बहादुर खां सफलतापूर्वक प्रशासन चलाने में सक्षम नहीं था। इस कारण उसे बर्खास्त कर दि गया। बहादुर खां सक्रिय राजनीति से अलग होकर इटावा की जागीर प्राप्त कर शांतिपूर्वक जीवन गुजारने लगा।

उजबेगों व मिर्जा का विद्रोह-

मालवा में असफल विद्रोह के बाद अब्दुल्लाह खान उजबेग गुजरात भाग गया था। वहाँ से वह किसी प्रकार जौनपुर आया। उस समय जौनपुर का सुबेदार अली कुली खाँ (खाने जमाँ) था जो एक प्रसिद्ध उजबेग सरदार था। 1565 ई० में उसने अब्दुल्ला खान तथा अन्य उजबेग सरदारों से मिलकर जौनपुर में विद्रोह कर दिया। विद्रोही अकबर का तख्ता पलट कर सिहांसन पर उसके स्थान पर मिर्जा कामरान के पुत्र अबुल कासिम को स्थापित करना चाहते थे।

अकबर ने विद्रोहियों के दमन के लिए एक सेना भेजी किन्तु शाही सेना पराजित हुई। अतः अकबर ने स्वयं विद्रोहियों के दमन के लिए प्रस्थान किया। इसी समय अकबर के सौतेले भाई हकीम मिर्जा ने विद्रोह कर दिया। अकबर के लिए यह स्थिति बहुत कठिन थी क्योंकि उसे अब दो विद्रोहों का सामना करना था। अतः कुछ समय के लिए अकबर ने मुनीम के सहयोग से उजवेगों से समझौता कर लिया। तत्पश्चात उसने मिर्जा हकीम के विरूद्ध प्रस्थान किया।

अकबर के आगमन की सूचना पाकर मिर्जा मुहम्मद हकीम घबरा गया। उसने तत्काल लाहौर का घेरा उठा लिया और खैबर की तरफ भाग गया। मिर्जा हकीम के विद्रोह का लाभ उठा कर उजबेग विद्रोही खान जामाँ ने पुनः विद्रोह कर दिया तथा मिर्जा हकीम के नाम का खुतबा पढ़वाया। मिर्जा हकीम को काबुल से खदेड़ने के बाद अकबर ने उजबेगों का अन्तिम रूप से दमन करने के लिए आगरा की ओर प्रस्थान किया। उधर उजबेग विद्रोही भी गंगा नदी पार कर आगे बढ़ गए थे।

अकबर ने अपने सैनिकों के साथ गंगा नदी को पार किया तथा इलाहाबाद के निकट मनकुवाल में स्थित उजबेगों के शिविर पर अचानक हमला कर दिया। खान जामा रणभूमि में ही मारा गया। उसके भाई बहादुर को बन्दी बनाकर प्राणदण्ड दिया गया। विद्रोहियों के सहायकों एवं सहयोगियों को कठोर दण्ड दिया गया। इस प्रकार अकबर ने उजवेगों के विद्रोह का सफलतापूर्वक दमन कर दिया।

अफगान बलूचियों युसुफजाइयों का विद्रोह (1585 ई०)-

अकबर द्वारा काबुल विजय के बाद युसुफजाइयों अथवा अफगान बलूचियों ने विद्रोह कर दिया। इसी विद्रोह को दबाने में बीरबल की मृत्यु हो गयी। बाद में मानसिंह और टोडरमल द्वारा विद्रोह को दबाया गया।

शाहजादा सलीम का विद्रोह (1599 ई०)-

बादशाह अकबर सलीम को बहुत प्रेम करता था। लाड़ प्यार में पलने के कारण व विलासी और आरामपसंद था। 1577 ई० में उसे दस हजार का मनसब प्रदान किया गया। अकबर बहुत दिनों तक जीवित रहा, इस कारण सलीम गद्दी पर बैठने के लिए अधीर हो उठा। दक्षिण अभियान पर जाने से पूर्व अकबर ने सलीम को उत्तरी भारत की स्थिति पर नियंत्रण रखने तथा मेड़ पर आक्रमण करने का निर्देश दिया। किन्तु सलीम ने अपने पिता के आदेश का उल्लघन कर आगरा से इलाहाबाद चला गया और विद्रोह कर दिया।

वहाँ उसने एक स्वतंत्र शासक की भाँति व्यवहार शुरू कर दिया। इस समय अकबर असीरगढ़ के घेरे में व्यस्त था। अतः उसने सलीम के विद्रोह को शांत कर उसे क्षमा कर दिया।

1601 ई० में सलीम ने पुनः विद्रोह कर दिया। इस दौरान उसने बिहार के राजकोष से 30 लाख रुपए के राजस्व पर अधिकार कर लिया, अपने नाम के सिक्के ढलवाए और अपने अनुयायिओं को जागीरे प्रदान की।

इस विद्रोह की सूचना मिलते ही अकबर शीघ्र ही 1601 ई० में दक्षिण से आगरा लौट आया। आगरा में अकबर की उपस्थिति का समाचार पाकर सलीम ने अपने तीन हजार घुड़सवारों के साथ आगरा की ओर प्रस्थान किया किन्तु अकबर के समझाने पर उसने अपने विद्रोहों के लिए क्षमा मांगी और पुनः इलाहाबाद के लिए प्रस्थान किया।

इसी बीच अकबर ने एक फरमान जारी कर शहजादा सलीम को बंगाल व उड़ीसा का सुबेदार नियुक्त किया। किन्तु इस फरमान का सलीम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह इलाहाबाद का ही प्रशासन देखता रहा।

अन्त में पुत्र के व्यवहार से दुःखी होकर अकबर ने अपनी सहायता के लिए दक्षिण से अबुल फजल को बुलवाया। किन्तु मार्ग में सलीम के इशारे पर ओरछा के बुन्देला सरदार वीर सिंह देव ने अबुल फजल की 1602 ई० में हत्या कर दी। अबुल फजल की हत्या से अकबर बहुत दुःखी और क्रुद्ध हुआ । उसने सलीम को घोर दण्ड देने का निश्चय किया।

इस बीच सलीम की दादी सलीमा बेगम ने इलाहाबाद जा कर सलीम को समझाया। सलीम ने आगे आकर अपने पिता से माफी मांगी। अतः अकबर ने उसे माफ कर दिया। 1603 में अकबर ने सलीम को मेवाड़ विजय के लिए नियुक्त किया। किन्तु इस बार पुनः सलीम ने उदासीनता दिखाई और बहाना बना कर इलाहाबाद चला गया जहां शराब व नाच गाने में लीन हो गया।

अकबर ने पुनः सलीम को दण्डित करने निश्चय किया और इलाहाबाद की ओर प्रस्थान की योजना बनाई। किन्तु अपनी माता की मृत्यु के कारण वह आगरा से प्रस्थान नहीं कर सका। उधर सलीम भी अपनी दादी की मृत्यु पर आगरा आया। उसने पिता से क्षमा मांगी। अकबर ने एक बार पुनः उसे माफ कर दिया। उसके बाद सलीम अपने पिता के पास ही रहा।

अकबर द्वारा मुग़ल साम्राज्य विस्तार


आरम्भिक कठिनाइयों पर विजय प्राप्त करने के बाद अकबर ने साम्राज्य विस्तार की ओर ध्यान दिया। वह प्रथम मुगल शासक था जिसने सम्पूर्ण भारत में मुगल वंश का राज्य स्थापित करने का प्रयत्न किया। साम्राज्य विस्तार के उद्देश्य से उसने अपना विजय अभियान प्रारम्भ किया।

मालवा की विजय

साम्राज्य विस्तार के क्रम में अकबर का सबसे पहला आक्रमण 1561 ई० में मालवा के विरूद्ध था। अकबर के समय में मालवा का शासक बाजबहादुर था तथा उसकी राजधानी सारंगपुर थी। बाजबहादुर और उसकी पत्नी रूपमति दोनों संगीत प्रेमी थे।

मालवा विजय के कारण- अकबर द्वारा मालवा विजय के तीन प्रमुख कारण थे

1. बाजबहादुर अपना अधिकांश समय संगीत और पत्नी रूपमति में व्यतीत करता था। उसे राजकाज की ओर ध्यान देने का कम अवसर मिलता था।

2. अजमेर और ग्वालियर पर अधिकार के बाद अकबर की सीमा मालवा तक पहुंच गई थी, अतः इसे जीतना अकबर के लिए आवश्यक हो गया।

3. मालवा पर विजय प्राप्त करने के पश्चात् गुजरात और दक्षिण विजय का मार्ग आसान हो जाता।

उपरोक्त उद्देश्यों से अकबर ने मालवा के विरूद्ध अभियान प्रारम्भ किया। माहम अनगा के प्रभाव के चलते उसका पुत्र अधम खाँ मालवा अभियान में सेना के लिए चुना गया। 29 मार्च, 1961 ई० को अधम खाँ ने मालवा पर आक्रमण किया। राजधानी सारंगपुर के निकट बाजबहादुर ने उसका मुकाबला किया किन्तु वह पराजित हुआ और भाग गया। अधम खाँ ने मालवा पर अधिकार कर लिया।

बाजबहादुर की सम्पूर्ण सम्पत्ति और उसकी पत्नी रूपमति उसके हाथ लग गयी। अधम खाँ के दूषित इरादों से बचने के लिए रूपमति ने जहर खा कर आत्महत्या कर ली। अधम खाँ ने बाजबहादुर की लूटी हुई सम्पत्ति का अधिकांश भाग अपने पास रख लिया। जिससे अकबर नाराज हो गया। वह स्वयं सारंगपुर गया तथा लूट के माल पर अधिकार कर अधम खाँ को पदच्युत कर दिया।

पीर मुहम्मद को उसके स्थान पर नियुक्त किया किन्तु पीर मुहम्मद एक अयोग्य शासक सिद्ध हुआ। वह जनता पर अत्याचार करने लगा, जिससे उनके अन्दर विद्रोह की भावना जागृत होने लगी। स्थिति का लाभ उठाकर बाजबहादुर ने दक्षिण के राज्यों खानदेश और बरार की सहायता से पुनः मालवा प्राप्त करने का प्रयास किया।

पीर मुहम्मद को पराजित होकर भागना पड़ा। नर्मदा नदी पार करते समय घोड़े से गिरने के कारण पीर मुहम्मद की मृत्यु हो गयी। बाजबहादुर का मालवा पर पुनः अधिकार हो गया। किन्तु उसकी यह विजय अस्थाई रही। अकबर ने अब्दुल्ला उजबेग को पुनः मालवा पर अधिकार करने के लिए भेजा, जिसने बाजबहादुर को पराजित कर मालवा पर अधिकार कर लिया। बाजबहादुर पहले शरण की तलाश में इधर-उधर भटकता रहा। अन्त में उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली, फलतः अकबर ने उसे पहले एक हजारी और बाद में द्वि-हजारी मनसबदार बना दिया।

चुनार विजय

चुनार में अफगान सक्रिय थे। यहाँ का दुर्ग अत्यधिक महत्वपूर्ण था क्योंकि यह उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच सीमा रक्षक का कार्य करता था। 1561 ई० में अकबर ने आसफ खाँ को चुनार का दुर्ग जीतने के लिए भेजा, जिसने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। चुनार विजय के बाद अकबर को बिहार की तरफ बढ़ने एवं अफगानों का दमन करने का मार्ग सरल हो गया।

राजस्थान विजय

अकबर ने राजस्थान के निम्नलिखित रियासतों के विरूद्ध अभियान किया-

1-आमेर (जयपुर)-
● आमेर का राजा भारमल (बिहारी मल) पहला राजपूत राजा था जिसने स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार की।

● अकबर से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने वाला पहला राजपूत कछवाहा वंशीय भारमल ( बिहारी मल) था।

अकबर के समय में आमेर का राजा भारमल (बिहारीमल था जो कछवाहा • राजपूत था। उसका भतीजा सूजा उसे मेवात के सुबेदार मोहम्मद शफुद्दीन की सहायता से आमेर से निष्कासित करना चाहता था। ऐसी स्थिति में भारमल ने अकबर की सहायता प्राप्त करने का प्रयास किया। जिस समय अकबर अजमेर के खाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्र हेतु जा रहा था तो 20 जनवरी, 1562 ई० को राजा भारमल सांगनेर के निकट अकबर की सेवा में उपस्थित हुआ तथा अपनी स्थिति की सुरक्षा हेतु उसके समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

इसी समय उसने स्वेच्छा से अकबर के साथ अपनी पुत्री के विवाह का प्रस्ताव रखा जिसे अकबर ने स्वीकार कर लिया। अजमेर से लौटते समय 6 फरवरी, 1562 ई० को अकबर ने साँभर में राजा भारमल की पुत्री ‘हरखाबाई’ उर्फ जोधाबाई से विवाह किया। इसी हरखाबाई के गर्भ से अकबर के उत्तराधिकारी सलीम (जहाँगीर) का जन्म हुआ।

अकबर के साथ किसी राजपूत राजकुमारी का यह प्रथम विवाह था। इस वैवाहिक सम्बन्ध से अकबर को अनेक राजनीतिक लाभ हुए तथा कालान्तर में उसकी राजपूत नीति को प्रभावित किया। इस विवाह के पश्चात बिहारीमल को मुगल सेना में 5 हजार का मनसब प्राप्त हुआ। उसके पुत्र भागवानदास तथा पौत्र मानसिंह को भी उच्च पदों पर नियुक्त किया गया।

मेड़ता विजय (1562 ई०)

मेड़ता आमेर का पड़ोसी राज्य था। अकबर के समय में मेड़ता का दुर्ग जोधपुर के राव मालदेव के एक जागीरदार जयमल राठौर के नियंत्रण में था। अकबर ने शर्फुद्दीन को मेड़ता के दुर्ग पर अधिकार करने के लिए नियुक्त किया। उसने मेड़ता का घेरा डाला। राजपूतों ने बहादुरी से मुकाबला किया अन्ततः मार्च 1562 ई० में मुगलों ने मेड़ता पर अधिकार कर लिया। जयमल ने भाग कर मेवाड़ के राणा उदय सिंह के यहाँ शरण ली।

गढ़कटंगा (गोडवाना) विजय (1564 ई०)-

गढ़कटंगा (गोंडवाना) का हिन्दू राज्य वर्तमान में मध्य प्रदेश के उत्तरी जिलों से लेकर दक्षिणी भारत की सीमा तक विस्तृत था अर्थात् इसमें नर्मदा घाटी तथा आधुनिक मध्य प्रदेश का उत्तरी भाग शामिल था।

इस शक्तिशाली साम्राज्य का संस्थापक अमनदास गोण्ड था। इसने रायसेन को जीतने में गुजरात के शासक बहादुरशाह की सहायता की थी जिसने उसे संग्रामशाह का खिताब दिया था। संग्रामशाह ने महोबा के प्रसिद्ध चंदेल राजवंश की राजकुमारी दुर्गावती से विवाह किया था। इसकी राजधानी चौरागढ़ थी।

अकबर के समय में यहाँ संग्राम सिंह की विधवा व महोबा की चन्देल राजकुमारी रानी दुर्गावती के संरक्षण में उसके अल्पायु पुत्र वीर नारायण का राज्य था। वीर नारायण अल्पवयस्क था इसलिए राज्य की वास्तविक शक्ति रानी दुर्गावती के हाथों में थी। अकबर ने 1564 ई० में आसफ खाँ को गढ़कटंगा पर अधिकार करने के लिए भेजा।

चौरागढ़ के निकट रानी दुर्गावती ने मुगलों की विशाल सेना का मुकाबला किया। वह दो दिनों तक वीरतापूर्वक लड़ती रही। अन्ततः पराजय को निश्चित: मानकर अपने सम्मान की रक्षा के लिए स्वयं को छुरा घोप कर आत्महत्या कर ली।

1564 ई0 में किले पर मुगलों का अधिकार हो गया। इस युद्ध में आसफ खाँ को अपार सम्पत्ति हाथ लगी। परन्तु अकबर ने इस राज्य को मुगल राज्य में नहीं मिलाया तथा राजवंश से सम्बन्धित चन्द्रशाह को गद्दी सौंप दी।

मेवाड़ विजय (1568 ई०)

मेवाड़ में सिसोदिया वंश का राज्य था। वहाँ का तत्कालीन शासक राणा सांगा का पुत्र उदयसिंह था जिसने अकबर की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर दिया था। वह आमेर के कछवाहा राजवंश को हेय दृष्टि से देखता था क्योंकि इस वंश ने अकबर के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया था। इसकी राजधानी चित्तौड़ थी।

चित्तौड़ का किला मध्य राजस्थान का प्रवेश द्वार माना जाता था। राजस्थान में अकबर का सबसे कड़ा प्रतिरोध मेवाड़ के शासकों ने किया वह न तो मेवाड़ को अपने राज्य में मिला सका और न ही आत्मसमर्पण करा सका। अकबर द्वारा चित्तौड़ पर आक्रमण के कई कारण थे जिनमें दो प्रमुख था-

1-राणा उदयसिंह ने अकबर के शत्रु बाजबहादुर व विद्रोही मिर्जाओं को संरक्षण प्रदान किया था।

2. मेवाड़ दिल्ली एवं गुजरात के मार्ग में पड़ता था अतः गुजरात विजय के लिए मेवाड़ विजय आवश्यक था।

20 अक्टूबर, 1567 ई० को अकबर मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पहुँचा तथा दुर्ग का घेरा डाल दिया। यह घेरा कई माह तक चला। राणा उदय सिंह ने अपने सरदारों की सलाह पर दुर्ग की रक्षा का दायित्व जयमल और फत्ता (फतह सिंह) को सौंप कर स्वयं पास की पहाड़ियों की ओर चला गया। एक रात जब जयमल किले की टूटी हुई दीवार की मरम्मत करा रहा था तभी अकबर ने अपनी बन्दूक से उसे मार कर घायल कर जिससे उसकी मृत्यु हो गयी।

प्रातःकाल फत्ता उसकी मां और पत्नी के नेतृत्व में राजपूतों ने मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया। किन्तु वे पराजित हुए और रणक्षेत्र में ही मारे गये। मुगलों ने दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अकबर ने किले में प्रदेश कर हत्याकाण्ड का आदेश दिया जिसमें तीस हजार राजपूत मारे गये।

इस युद्ध में अकबर अपने विरोधी राजपूतों के शौर्य एवं वीरता से इतना प्रभावित हुआ कि उनके पराक्रम की स्मृति में आगरा के किले में मुख्य द्वार (दिल्ली दरवाजा) के भीतरी प्रदेश द्वार के दोनों तरफ हाथी पर बैठे हुए जयमल व फत्ता की पत्थर की दो मूर्तियाँ बनवा दी।

अकबर, आसफ खाँ को दुर्ग का दायित्व सौंपकर आगरा चला आया। राणा उदयसिंह ने उदयपुर को अपनी नई राजधानी बनाया तथा 3 मार्च, 1572 ई० को हुई अपनी मृत्यु तक वह मुगलों के विरूद्ध संघर्ष करता रहा। उसके बाद उसके पुत्र महाराणा प्रताप ने युद्ध जारी रखा।

रणथम्भौर विजय (1569 ई०)

चित्तौड़ विजय से उत्साहित होकर अकबर ने राजपूताना के अन्य राज्यों की ओर ध्यान दिया। उस समय रणथम्भौर में हाड़ा राजपूत शासन कर रहे थे। यहाँ का शासक सुरजन राय था जो मेवाड़ का एक जागीरदार था। अकबर ने फरवरी, 1569 ई० में रणथम्भौर पर आक्रमण किया। सुरजन राय ने मुगल सेना का मुकाबला किया किन्तु अन्त में राजा भगवान दास और मानसिंह की मध्यस्थता से उसने अकबर के सम्मुख समर्पण कर दिया।

18 मार्च, 1569 को उसने किला मुगलों को सौंप कर स्वयं शाही सेवा में भर्ती हो गया। उसके दो पुत्र दूदा और भोज भी अकबर की सेवा में शामिल हो गए। सूरजन राय एक मात्र राजपूत राजा था जिसे अकबर ने तव्वारा (वाद्ययंत्र) बजाने की छूट दे रखी थी।

कालिंजर विजय (1569 ई०) –

कालिंजर का दुर्ग (वर्तमान में बोंदा जिला, उत्तर प्रदेश) एक अभेद्य दुर्ग माना जाता था। यह रीवा के राजा रामचन्द्र के अधिकार में था। अगस्त, 1569 ई० में अकबर ने मजनू खाँ काकशाह के नेतृत्व में कालिंजर विजय के लिए एक सेना भेजी। आरम्भ में राजा गरचन्द्र ने शाही सेना का प्रतिरोध करने का निश्चय किया किन्तु बाद में आत्मसमर्पण कर दुर्ग मुगलों को सौप दिया।

बादशाह अकबर ने राजा रामचन्द्र के साथ उदारपूर्ण व्यवहार किया तथा इलाहाबाद के निकट उसे एक जागीर प्रदान की। मजनूखाँ काकशाह को कालिंजर का प्रथम मुगल सुबेदार नियुक्त किया गया। कालिंजर के पतन के साथ ही राजपूतों के प्रतिरोध का मूलाधार नष्ट हो गया। कालिंजर के उत्तर भारत में स्थित होने के कारण अकबर के लिए यह महत्वपूर्ण विजय थी।

जोधपुर एवं बीकानेर (1570 ई०)

कालिंजर के पतन के साथ ही अधिकांश राजपूत सरदारों ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। जब अकबर ने नागौर में ठहरा हुआ था तो नवम्बर 1570 ई० में दो राजपूत शासकों, जोधपुर के राजा मानदेव का पुत्र चन्द्र सेन तथा बीकानेर के राय कल्याणमल व उसके पुत्र रायसिंह ने राजा भगवान दास के माध्यम से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली।

राजा कल्याणमल ने अपनी पुत्री का विवाह भी अकबर के साथ कर दिया। वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के बाद अकबर ने रायकल्याणमल को पुनः बीकानेर वापस लौटा दिया तथा उसके पुत्र रायसिंह को शाही सेवा में भर्ती कर लिया।

1570 में ही जैसलमेर के रावलहरराय ने भी अकबर की अधीनता स्वीकार कर अपनी पुत्री का विवाह उससे कर दिया। इस प्रकार 1570 ई० के अन्त तक मेवाड़ और उसके अधीनस्थ राज्य डूंगरपुर, बाँसवाड़ा तथा प्रतापगढ़ को छोड़कर पूरा राजपूताना मुगल राज्य क्षेत्र का आंग बन गया।

हल्दी घाटी का युद्ध और मेवाड़ विजय-

1568 ई० में उदयसिंह को पराजित कर अकबर ने यद्यपि मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर अधिकार कर लिया था किन्तु अभी भी राज्य का एक बड़ भूभाग उसके अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

हल्दी घाटी का युद्ध और मेवाड़ विजय

1572 में उदयसिंह की मृत्यु के बाद मेवाड़ के सामंतों ने 3 मार्च, 1572 ई० को गोगुण्डा में राणा प्रताप सिंह का राज्याभिषेक किया। इस अवसर पर राणा प्रताप ने अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा का संकल्प लिया। उसने उदयपुर से लगभग चालीस मील दूर एक दुर्गम पहाड़ी पर स्थित कुम्भलगढ़ को अपनी राजधानी बनाया।

आवश्यकता अनुरूप उसने शासन प्रबंध में भी परिवर्तन किया । बिहार और बंगाल विजय (1574-76 ई०) के बाद अकबर ने मेवाड़ की ओर अपना ध्यान आकर्षित किया।

अप्रैल, 1576 ई० में उसने अपना मुख्यालय अस्थाई रूप से अजमेर स्थानान्तरित कर शाही फौजों को वहाँ नियुक्त किया। राजा मानसिंह को सेनापति और साम्राज्य का मीरबख्शी (सेनाध्यक्ष) तथा आसफखान को उप-सेनापति बनाया।

बदायूँनी ने जो आसफ खान के अधीन एक योद्धा के रूप में इस युद्ध में भाग लिया था, अपनी पुस्तक मुन्तखाब-उत-तवारीख में हल्दी घाटी के युद्ध का आँखों देखा विवरण प्रस्तुत किया है। शाही सेना अप्रैल, 1576 ई० में मानसिंह के नेतृत्व में गोगुंडा की ओर प्रस्थान की राणा प्रताप उर्फ कीका भी अपनी सेना के साथ शाही सेना का मुकाबला करने के लिए आगे बढ़ा। उसने अपनी सेना को दो भागों में दिया। एक का सेनापति स्वयं राणा था एवं दूसरे भाग का नेतृत्व उसके एक विश्वास पात्र हकीम सूर अफगान ने संभाला।

18 जून, 1576 ई० को गोगुण्डा के निकट हल्दी घाटी के मैदान में राणा प्रताप और मुगलों के बीच युद्ध हुआ जिसमें राणा प्रताप पराजित हुआ। उसने भाग कर अरावली की श्रेणियों में शरण ली । मुगल सेना ने गोगुण्डा पर अधिकार कर लिया किन्तु मेवाड़ पर पूर्णरूप से अपनी सत्ता स्थापित करने में असफल रहे। राणाप्रताप को पराजित करने के पश्चात् अकबर ने उसके समर्थकों जालौर, सिरोही तथा ईदर के राजाओं के दमन का निश्चय किया।

सर्वप्रथम उसने जालौर पर अधिकार कर लिया। कुली खाँ को इंदर के राय नारायण के विरूद्ध भेजा। मुगल सेना ने इंदर पर अधिकार कर लिया। का निश्चय किया बीसवाड़ा के रावल प्रतापसिंह तथा दूंगरपुर के रावल आशकरन ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। इसके अतिरिक्त बूंदी तथा सिरोही पर भी मुगलों का अधिकार हो गया। इस प्रकार केवल मेवाड को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण राजपूताना मुगल सत्ता के अधीन हो गया।

1577 ई० में अकबर ने पुनः मेवाड़ के विरुद्ध भगवान दास, मानसिंह तथा शाहनवाज खाँ को नियुक्त किया जिन्होंने ने सफलतापूर्वक राणा प्रताप के विरुद्ध सैन्य संचालन किया। इसी बीच बिहार में उपद्रव को शान्त करने के लिए शाहनवाज खाँ को वहाँ जाना पड़ा। उधर अकबर भी उत्तर-पश्चिम सीमान्त में व्यस्त हो गया। स्थिति का लाभ उठाकर राणा प्रताप पुनः मेवाड़ को जीतने का प्रयत्न किया किन्तु सफल नहीं हुआ।

19 जनवरी, 1997 ई० को राणा प्रताप की मृत्यु हो गयी। उसके बाद उसका पुत्र अमरसिंह शासक बना। पिता की भाँति उसने भी कभी अकबर की अधीनत स्वीकार नहीं की। 1599 ई० अकबर ने शहजादा सलीम को अजमेर का सुबेदार नियुक्त किया तथा मानसिंह के साथ उसे अमरसिंह के दमन का आदेश दिया। किन्तु सलीम को सफलता नहीं मिली।

(1572-7330) गुजरात विजय (1572-73 ई०)

गुजरात अभियान के दौरान ही अकबर ने पहली बार कैम्बे में एक पोत में समुद्र विहार किया। गुजरात विजय के बाद अकबर ने 1573 ई० में फतेहपुर सीकरी शहर की स्थापना की। गुजरात भारत के समुद्र तट पर स्थित एक समृद्ध प्रदेश था। यह पश्चिमी देशों के साथ व्यापार का एक प्रमुख केन्द्र स्थल था।

अकबर के समय में यहाँ का शासक गुजफ्फर शाह तृतीय था। यह एक अयोग्य शासक था। इसके काल में गुजरात में चारों ओर अराजकता एवं अव्यवस्था व्याप्त हो गयी। ऐसी स्थिति में एतिमाद खाँ नामक एक शक्तिशाली अमीर ने अकबर को गुजरात पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया। इसके अतिरिक्त अकबर द्वारा गुजरात पर आक्रमण के अन्य कारण भी थे-

गुजरात आक्रमण के कारण- गुजरात पर आक्रमण के प्रमुख कारण थे-

1. गुजरात भारत का एक समृद्ध प्रदेश था। पश्चिमी देशों के साथ अधिकांश व्यापार गुजरात से ही होता था।

2. गुजरात के तटीय क्षेत्रों पर पुर्तगालियों का वर्चस्व था। वे हज जाने वाले मुगल जहाजों को लूटते थे। फलतः उन पर अंकुश लगाना आवश्यक था। 3. विद्रोही मिर्जाओं ने गुजरात में शरण ले रखी थी।

4. मुजफ्फर शाह की अयोग्यता के कारण अमीरों में पारस्परिक वैमनस्य के कारण गृह युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। अतः अकबर के लिए गुजरात जितना आसान था।

जुलाई, 1572 ई० में अकबर ने अपनी सेना के साथ गुजरात की राजधानी अहमदाबाद की ओर प्रस्थान किया। राजस्थान के मार्ग से होते हुए वह अहमदाबाद पहुंचा। मुजफ्फरशाह तृतीय ने बिना किसी युद्ध के ही आत्मसमर्पण कर दिया। एतिमाद खाँ ने अहमदाबाद के दुर्ग की चाभियां अकबर को सौंप दी।

21 नवम्बर, 1572 ई० को अकबर के नाम का खुतबा पढ़ा गया तथा सिक्के जारी किए गए। गुजरात पर अधिकार के बाद अकबर ने मिर्जा अजीज कोका को उत्तरी गुजरात तथा एतिमाद को दक्षिणी गुजरात का सूबेदार नियुक्त किया।

अहमदाबाद के पश्चात् अकबर खम्भात कैम्बे) की ओर बढ़ा जहाँ मिर्जाओं ने अशांति उत्पन्न कर दी थी। यहीं पर उसने पहली बार एक पोत में समुद्र विहार किया तथा पुर्तगालियों के सम्पर्क में आया। पुर्तगालियों एवं अन्य व्यापारियों ने अकबर का सम्मान किया तथा उसकी आधीनता स्वीकार कर लिया।

खम्भात के पश्चात अकबर ने सूरत पर आक्रमण करने का निश्चय किया। क्योंकि यहाँ मिर्जाओं का नेता इब्राहिमहुसैन ने विद्रोह कर दिया था। 1572 ई० में सरनाल नामक स्थान पर अकबर ने उसे पराजित किया। इसी समय अकबर ने भगवान दास को एक निशान एवं नक्कारा प्रदान किया। यहाँ से वह सूरत की ओर प्रस्थान किया तथा दुर्ग का घेरा डाला। 26 फरवरी, 1573 ई० को हमजबान ने दुर्ग को समर्पण कर दिया। दुर्ग पर अधिकार के बाद मिर्जा अजीज कोका को गुजरात की सुबेदारी सौंप कर अकबर राजधानी आगरा लौट आया।

गुजरात पर अकबर की विजय अस्थाई सिद्ध हुई। अकबर के वापस लौटते ही 6 माह पश्चात् इख्तियारूल मुल्क एवं मिर्जाओं ने मुहम्मद हुसैन के नेतृत्व में विद्रोह कर दिया तथा अहमदबाद में मुगल सुबेदार अजीज कोका को किले में घेर लिया।

विद्रोह के समाचार पाते ही अकबर ने भगवान दास, शुजात खाँ, सैय्यद मुहम्मद बारहा एवं मालवा के सुबेदार मुजफ्फर खाँ को मिर्जा अजीज कोका की सहायता के लिए जाने का आदेश दिया तथा स्वयं 23 अगस्त, 1573 ई० को विद्रोहियों के दमन हेतु गजरात के अपने द्वितीय अभियान के लिए प्रस्थान किया। वह द्रुत गति से मात्र ग्यारह दिनों में अहमदाबाद पहुँच गया। साबरमती नदी पार कर 23 सितम्बर 1573 ई० को विद्रोहियों को पराजित किया हुसैन मिर्जा तथा इख्तियारूल मुल्क दोनों मारे गए अकबर ने मिर्जा अजीज कोका को पुनः गुजरात की सूबेदारी प्रदान कर राजधानी आगरा लौट आया।

स्मिथ ने अकबर के द्वितीय गुजरात अभियान को ऐतिहासिक दुतगामी आक्रमण कहा है। कुछ समय पश्चात् 1578 ई० में गुजरात का अंतिम शासक मुजपफर शाह तृतीय बंदीगृह से भागने में सफल हो गया और जूनागढ़ में शरण ली। 1583 ई० में उसने अहमदाबाद पर आक्रमण कर अधिकार कर लिया तथा बादशाह की पदवीं धारण कर मुगल अधिकारी कुतुबुद्दीन की हत्या कर भडोच पर भी अधिकार कर लिया।

इस विद्रोह को दबाने के लिए अकबर ने अब्दुर्रहीम खानखाना को गुजरात का सुबेदार नियुक्त किया जिसने 1584 ई० में सरखेज के युद्ध में मुजफ्फरशाह तृतीय को पूर्ण रूप से काट कर आत्महत्या कर लिया। इस प्रकार गुजरात मुगल साम्राज्य का अंग बन या अब्दुर्रहीम की इसी सफलता पर अकबर ने उसे खानखाना की उपाधि से सम्मानित किया। टोडरमल ने अपना प्रथम भूमि बन्दोवस्त गुजरात में किया।

बिहार एवं बंगाल विजय (1574-76 ई०)

शेरशाह की मृत्यु के बाद 1564 ई० में सुलेमान कर्रानी ने बिहार एवं बंगाल को सम्मिलित कर एक स्वतंत्र राज्य की घोषणा की। उड़ीसा को भी जीत कर उसने अपने साम्राज्य में मिला लिया तथा टांडा को अपनी राजधानी बनाया। कुछ समय पश्चात् उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर अपनी स्थिति मजबूत कर ली।

1572 ई० में सुलेमान कर्रानी की मृत्यु के बाद उसका ज्येष्ठ पुत्र बायजीद शासक बना किन्तु अमीरों ने उसकी हत्या कर उसके दूसरे पुत्र को गद्दी पर बिठाया। दाऊद एक महात्वाकांक्षी शासक था। उसने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की। एक स्वतंत्र शासक की भांति दाऊद ने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया तथा सिक्कों पर भी अपना नाम अंकित करवाया। उसने राजा (शाह) की उपाधि धारण की।

अकबर उस समय गुजरात में व्यस्त था। अतः स्थिति का लाभ उठाकर दाऊद ने पटना स्थित मुगल किला (जनानिया का किला) पर आक्रमण कर दिया। अकबर ने मुनीम खाँ को दाऊद के विरूद्ध भेजा तथा स्वयं 1575 ई० में विद्रोह के दमन के लिए पटना पहुंचा। दाऊद खाँ पराजित होकर बंगाल भाग गया। अकबर ने बिहार पर अधिकार कर लिया तथा मुजफ्फर खाँ तुर्बती को बिहार का सुबेदार नियुक्त कर राजधानी फतेहपुर सीकरी लौट आया। मुनीम खाँ दाऊद के विरूद्ध अभियान जारी रखा। उसने गर्गी व बंगाल की राजधानी टाँडा पर अधिकार कर लिया।

1575 ई० में तुरकोई नामक स्थान पर दाऊद पराजित हुआ तथा उड़ीसा की ओर भाग गया। अन्त में विवश्य होकर अप्रैल, 1575 ई० में उसने आत्मसमर्पण कर दिया तथा अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली दाऊद खाँ ने एक संधि की जिसके अनुसार उसे उड़ीसा में अकबर के अधीनस्थ शासक के रूप में राज्य करने की अनुमति प्राप्त हुई। 1575 ई० में मुनीम खाँ की मृत्यु हो गयी। बंगाल में पुनः अव्यवस्था फैल गई। स्थिति का लाभ उठाकर दाऊद खाँ ने बंगाल पर आक्रमण कर पुनः अधिकार कर लिया। अकबर ने पंजाब के सुबेदार खान-ए-जहाँ हुसैन कुली खाँ व टोडरमल को दाऊद खाँ के विरूद्ध भेजा।

12 जुलाई, 1576 ई० को राजमहल के युद्ध में दाऊद पराजित हुआ। मुगल सैनिकों ने उसका सिर काट कर बादशाह अकबर की सेवा में फतेहपुर सीकरी भेज दिया तथा शेष शरीर टोंडा में लटका दिया। इस प्रकार दाऊद खाँ की मृत्यु के साथ ही स्वतंत्र बंगाल राज्य का अन्त हो गया किन्तु 1580 ई० में पुनः बंगाल में विद्रोह हुआ। यह विद्रोह काकशाल विद्रोह के नाम से प्रसिद्ध है। विद्रोही मिर्जा हकीम को बादशाह बनाना चाहते थे। अकबर ने राजा टोडरमल व अजीज कोका को विद्रोहियों के विरूद्ध भेजा। दोनों के संयुक्त प्रयास से काकशालविद्रोह का दमन किया गया। इस प्रकार बंगाल में पुनः शान्ति एवं व्यवस्था स्थापित हो गई.

काबुल विजय (1581 ई०)

1581 इ० का वर्ष अकबर के लिए सर्वाधिक संकटमय वर्ष माना जाता है। एक क्योंकि इसी वर्ष अकबर के सौतेले भाई व काबुल के शासक मिर्जा मुहम्मद हकीम ने विद्रोहियों को संगठित कर सिंहासन प्राप्त करने की चेष्टा की। विद्रोहियों में जौनपुर का काजी मुल्ला मुहम्मद याजदी था जिसने अकबर के विरुद्ध फतवा जारी किया। विद्रोही अकबर को हटाकर हकीम मिर्जा को दिल्ली के सिंहासन पर बिठाना चाहते थे षडयंत्रकारियों में प्रमुख था शाही दीवान (वित्तमंत्री) ख्वाजा मंसूर । षड्यंत्रकारियों का संकेत पाकर हकीम मिर्जा ने सिन्धु नदी पार कर लाहौर के लिए प्रस्थान किया।

राजामान सिंह, भगवानदास व सैय्यदखाना ने लाहौर की रक्षा के लिए पर्याप्त प्रबंध कर रखे थे। हकीम खाँ को आशा के विपरीत पंजाब में कोई सहायता नहीं मिली। इस बीच अकबर स्वयं इसका मुकाबला करने के लिए आगे बढ़ा। अकबर के आगमन की सूचना पाकर हकीम मिर्जा पुनः काबुल भाग गया। अनेक विद्रोहियों व उनके प्रमुख नेता ख्वाजा मंसूर की हत्या कर दी गई। अकबर ने शाहजादा मुराद को हकीम मिर्जा के विरूद्ध काबुल की ओर जाने का आदेश दिया तथा स्वयं शाही सेना को पुनर्संगठित करने के लिए नवरोहताज में रूका । इसी समय उसने सिंधु नदी के किनारे ‘सिंघ सागर’ नामक एक किले का निर्माण करवाया।

10 अगस्त, 1581 ई० को अकबर काबुल में प्रवेश किया। हकीम मिर्जा काबुल से गुरबन्द भाग गया। बाद में उसने अकबर से क्षमा याचना की तथा अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने उसकी बहन बख्तुन्निसा बेगम को काबुल का सुबेदार बनाकर राजधानी लौट आया। अकबर के वापस आते ही हकीम मिर्जा पुनः काबुल पहुँचा तथा स्वयं शासन करने लगा। यद्यपि नाम उसकी बहन का रहा। जुलाई, 1585 ई० में हकीम मिर्जा की मृत्यु हो गयी। काबुल को मुगल साम्राज्य में मिला कर मानसिंह को वहाँ का सूबेदार नियुक्त किया गया। मानसिंह पहला मुगल अधिकारी था जिसे काबुल की सूबेदारी मिली।

कश्मीर विजय (1585-86 ई०)

युसूफ खाँ कश्मीर का स्वतंत्र शासक था। 1581 ई० में उसे अकबर की प्रभुत्ता स्वीकार करने के लिए कहा गया किन्तु 1581 ई० में उसने अपने पुत्र याकूब के माध्यम से एक कूटनीतिक जवाब भेजा। इस कारण अकबर उससे संतुष्ट नहीं था और कश्मीर को मुगल साम्राज्य में मिलाने का निश्चय किया। इस उद्देश्य से उसने मिर्जा शाहरूख एवं राजा भगवानदास से नेतृत्व में सेना कश्मीर भेजा। अन्त में विवश होकर युसूफ खाँ ने राजा भगवानदास के एक संधि की जिसके अनुसार उसने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली, बदले में वह कश्मीर के शासक का पद मांगा। अकबर इस संधि से संतुष्ट नहीं था। अतः उसने युसूफ खाँ व उसके पुत्र याकूब खाँ को कैद कर लिया।

बाद में किसी प्रकार याकूब खाँ कैद से भागने में सफल हुआ तथा मुगलों के विरूद्ध युद्ध छेड़ दिया। अकबर ने कासिम खाँ के नेतृत्व में कश्मीर विजय हेतु दूसरा अभियान भेजा। एक युद्ध में याकूब खाँ पराजित हुआ और पकड़ा गया। उसे अपने पिता के साथ कैदी के रूप में बिहार भेज दिया गया जहाँ दोनों की मृत्यु हो गयी। इस प्रकार 1586 ई० में कश्मीर को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर उसे काबुल सूबा का एक सरकार बना दिया गया।

सिन्ध विजय (1591 ई०)

यद्यपि अकबर ने 1574 ई० में बक्सर जीत लिया था, किन्तु दक्षिणी सिन्ध का एक बड़ा भाग अभी भी अविजित था। उस समय सिन्ध का शासक मिर्जा जानी बेग था। अकबर के लिए सिन्ध विजय महत्वपूर्ण था क्योंकि इस पर अधिकार करने के पश्चात् उसे कंधार विजय में सहायता मिलती। अतः अकबर ने 1590 ई० में अब्दुर्रहीम खान-खाना को मूल्तान का सूबेदार नियुक्त किया तथा उसे सिन्ध पर अधिकार करने का आदेश दिया।

मिर्जा जानी बेग ने पहले मुगलों का मुकाबला किया किन्तु बाद आत्मसमर्पण कर अकबर की अधीनता स्वीकार कर किया। उसने अपने दो दुर्ग थट्टा व सेहवान अकबर की सौंप दिया। अकबर ने भी उसके साथ अच्छा व्यवहार किया। 3000 का मनसब प्रदान कर उसे शाही सेना में ले लिया। कुछ समय के लिए मिर्जा जानी बेग दीन-ए-इलाही का सदस्य भी बन गया तथा अन्त तक अकबर के प्रति वफादार बना रहा।

उड़ीसा विजय (1592 ई०)

अकबर के समय में उड़ीसा लोहानी जाति के एक अफगान परिवार के नियंत्रण में था। उस समय यहाँ का शासक कुतलू खाँ था जो एक स्वतंत्र शासक था। उसकी मृत्यु के बाद निसार खाँ शासक बना। उस समय बिहार का सुबेदार राजा मानसिंह था। 1590 ई० में राजा मानसिंह उड़ीसा पर आक्रमण किया। निसार खाँ ने उसका मुकाबला किया किन्तु पराजित होकर आत्म समर्पण कर दिया। उसे उड़ीसा की जागीर दे दी गई।

1592 ई० में उसने पुनः विद्रोह कर दिया। राजामान सिंह ने दूसरी बार उड़ीसा पर चढ़ाई कर उसे अंतिम रूप से परास्त कर दिया। उड़ीसा को मुगल साम्राज्य में सम्मिलित कर बंगाल सूबा का एक सरकार (जिला) बना दिया गया।

ब्लूचिस्तान (1595 ई०)

1595 ई० में अकबर ने मीरमासूम के नेतृत्व में एक सेना ब्लूचिस्तान विजय के लिए भेजा। मीरमासूम ने सफलतापूर्वक अफगानों को पराजित कर ब्लूचिस्तान पर अधिकार कर लिया। इस प्रकार ब्लूचिस्तान मुगल साम्राज्य का भाग बन गया।

अकबर की पश्चिमोत्तर सीमान्त नीति

सल्तनत काल से ही पश्चिमोत्तर सीमा की सुरक्षा एक प्रमुख समस्या थी क्योंकि इसी मार्ग से भारत पर बाह्य आक्रमण होते रहे। पश्चिमोत्तर सीमा पर उजबेग रोशनाई व युसुफजई आदि प्रमुख निवास करते थे। ये लोग मुगलों के विरूद्ध विद्रोह कर आफगानिस्तान को उनके चंगुल से मुक्त कराना चाहते थे।

अकबर ने सर्वप्रथम रोशनाई कबीले की ओर ध्यान दिया। ये लोग बायजीद नामक एक विधर्मी के अनुयायी थे जिसने 1560 ई० में स्वयं को पैगम्बर घोषित कर इस्लाम के विरूद्ध अपने मत का प्रचार किया। उसने अनेक लोगों को अपना शिष्य बनाया तथा स्वयं पीर रौशनी की उपाधि ग्रहण की। बायजीद ने अपनी पुस्तक खैर-उल-बयां में अपने मत का प्रतिपादन किया।

1585 ई० में बायजीद की मृत्यु हो गयी। इसलिये बायजीद को ‘रोशनाई सम्प्रदाय का संस्थापक माना जाता है। इसके बाद उसका पुत्र उमर उत्तराधिकारी बना किन्तु वह भी युसुफजाइयों द्वारा मारा गया। तताश्चात् रोशानियों का नेतृत्व उसके छोटे भाई जलाल के हाथों में आया। मुगलों के विरूद्ध उसकी सहायता ट्रांस आक्सियाना के शासक अब्दुल्ला खाँ उजबेग कर रहा था। अकबर का तत्कालिक ध्येय यही था कि अब्दुल्ला खाँ उजबेग इस लड़ाई में शामिल होकर अनुचित लाभ न उठा सके। अतः उसने रोशनियों के दमन हेतु सेना भेजी।

मुगलों के साथ रोशनियों का संघर्ष लगभग 15 वर्षों से भी अधिक चला । अन्त में 1600 ई० में जलाल खाँ पराजित हुआ और मारा गया। अफगानिस्तान से लगभग 14000 रौशनियों को पकड़ा गया। उन्हें विधर्मी करार कर दास बना लिया गया तथा बिक्री के लिए मध्य एशिया के बाजारों में भेज दिया गया। रोशनियों के पश्चात् • अकबर ने युसुफजाइयों की ओर ध्यान दिया। इस समय इनका नेता अब्दुल्ला खाँ उजबेग था जो अत्यधिक शक्तिशाली था।

अकबर ने जैन खाँ व बीरबल को यूसुफजाइयों के दमन हेतु भेजा। इसी युद्ध में राजा बीरबल मारा गया। तत्पश्चात् अकबर ने राजा टोडमल व मानसिंह के नेतृत्व में सेना भेजी। दोनों के संयुक्त प्रयास से यूसुफजई बुरी तरह पराजित हुए तथा हजारों विद्रोहियों की हत्या कर दी गई।

मुगलों की इस सफलता से यूसुफजई नेता अब्दुल्ला खाँ उजबेग ने मित्रता स्थापित करने के उद्देश्य से अपना एक दूत मण्डल अकबर की सेवा में भेजा। अतः अकबर ने उजबेगों से मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित कर अपने विशाल साम्राज्य की हिन्दकोह से सटी उत्तर-पश्चिमी सीमाओं को सुरक्षित किया। 1598 ई० में अब्दुल्लाह उजबेग की मृत्यु हो गयी। अतः अकबर उत्तर-पश्चिम के संभावित खतरे से मुक्त हो गया।

कंधार विजय (1595 ई०)

अकबर ने कन्धार के किले पर अधिकार को निश्चय किया। इस समय यहाँ मुजफ्फर हुसैन मिर्जा ईरान के गवर्नर के रूप में नियुक्त था। अकबर ने खाने खाना के नेतृत्व में कन्धार पर अधिकार करने के लिए एक सेना भेजी खानेखाना ने कंसार को विजित कर लिया तथा मुजफ्फर मिर्जा ने अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। अकबर ने शाहबेग को कंधार का प्रशासक नियुक्त किया। इस प्रकार कंधार मुगल साम्राज्य का अंग बन गया।

अकबर की दक्षिण नीति


अकबर की दक्षिण नीति मूलतया साम्राज्यवादी थी। वह सम्पूर्ण भारत को एक संगठित राष्ट्र का रूप प्रदान करना चाहता था। उत्तर भारत व सीमांत प्रदेशों में अपनी शक्ति स्थापित करने के पश्चात् अपना ध्यान दक्षिण की ओर आकर्षित किया तथा यहाँ के स्वतंत्र राज्यों को अपने अधीन लाने का प्रयास किया। इसके अतिरिक्त पुर्तगालियों का प्रभाव दक्षिण में बढ़ता जा रहा था जिसे अकबर नियंत्रित करना चाहता था।

1572 ई० में मालवा, राजपूताना तथा गुजरात पर अधिकार स्थापित हो जाने से दक्षिण से मुगल राजधानी का सीधा सम्पर्क स्थापित हो गया। अतः 1591 ई० में अकबर ने दक्षिण के चार राज्यों खानदेश, अहमदनगर, बीजापुर एवं गोलकुण्डा के शासको के पास अपने दूतमण्डल के माध्यम से मुगल साम्राज्य की अधीनता स्वीकार करने का प्रस्ताव भेजा।

इन चार राज्यों में केवल खानदेश के शासक राजा अलीखान ने अकबर की अधीनता स्वीकार की। शेष तीन राज्यों में बीजापुर और गोलकुण्डा के शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं किन्तु उन्होंने अकबर को बहुमूल्य वस्तुएं भेंट स्वरूप भेजी जबकि अहमदनगर के शासक बुरहानुलमुल्क ने न तो अधीनता स्वीकार की और न ही कोई उपहार भेजी। अतः अकबर सर्वप्रथम दक्षिण में अपना पहला अभियान अहमद नगर के विरूद्ध किया।

अहमद नगर- अकबर ने अहमदनगर पर आक्रमण के उद्देश्य से 1593 ई० में दो मुगल सेनाएं प्रस्थान की इसमें एक का नेतृत्व अब्दुर्रहीम खानखाना व दूसरे का शहजादा मुराद कर रहा था। इस समय अहमदनगर की आन्तरिक स्थिति दयनीय थी। 1595 ई० में बुरहानुलमुल्क के मृत्यु के बाद उसका पुत्र इब्राहिमगद्दी पर बैठा। किन्तु बीजापुर के साथ हुए एक युद्ध में वह भी मारा गया।

इब्राहिमके मृत्यु के बाद अहमदनगर में अव्यवस्था व्याप्त हो गयी। गद्दी के दावेदार कई गुटो में विभक्त हो गए तथा अमीर वर्ग षड्यंत्रों में लीन हो गए। अमीरों का एक दल बुरहानुलमुल्क की बहन चांद बीबी के साथ जो इब्राहिमके शिशु पुत्र बहादुरशाह को सुल्तान बनाना चाहते थे।

दूसरा दल इखलास खों हब्सी का था जो किसी अन्य को शासक बनाना चाहता था। तीसरा दल बुरहानुलमुल्क के ज्येष्ठ पुत्र अली को सत्तारूढ़ करना चाहता था, जबकि चौथा दल अहमदनगर का पेशवा (प्रधानमंत्री) मियाँ मंजू का था। जो चांद बीबी का विरोधी था। इस प्रकार अहमदनगर में गृहयुद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी। ऐसी स्थिति में मियागंजू ने अपनी सहायता के लिए मुगली की अहमदनगर आमंत्रित किया। मुगलों के लिए यह स्वर्णिम अवसर था।

अतः अकबर के आदेश से मुराद गुजरात से तथा अब्दुर्रहीम खानखाना मालवा से अहमदनगर की और प्रस्थान किए। नवम्बर, 1595 ई० में दोनों सेनाए अहमदनगर पहुँच गई तथा घेरा डाल दिया। मुगलों के आक्रमणकारी स्वभाव को देखकर मियाँ मंजू भयभीत हो गया। वह स्वयं बीजापुर की सीमा पर पहुँच गया तथा किले का दायित्व चाँद बीबी को सौप दिया। चाँद बीबी बहादुरी के साथ तीन माह तक मुगली की मुकाबला की 1596 ई० में पारस्परिक मतभेद, (मुराद व खानखाना के मध्य), |

रसद की कमी तथा बीजापुर व गोलकुण्डा से अहमदनगर के लिए सहायता की सम्भावना को देखते हुए मुगलों ने अहमदनगर से संधि कर ली 23 फरवरी, 1996 ई० को शाहजादा मुराद व चाँद बीबी के मध्य एक संधि हुई जिसके अनुसार मुगलों ने बुरहानुलमुल्क के शिशु पौत्र बहादुर शाह को चाँद बीबी के संरक्षण में अहमदनगर का वै शासक मान लिया। बदले में अहमदनगर ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली। मुगल साम्राज्य को बरार का क्षेत्र दे दिया गया। तदनुसार मुगल सेना बरार के सर्वाधिक महत्वपूर्ण गढ़ इलिचपुर की ओर मुड़ी तथा बिना किसी विशेष कठिनाई के इस पर कब्जा कर लिया। मुगलों ने एक नया शहर शाहपुर की स्थापना की तथा उसे अपना सैनिक मुख्यालय बनाया।

अहमदनगर की यह संधि अस्थाई सिद्ध हुई। अधिकांश अमीरों ने इसे मानने से इंकार कर दिया तथा बरार को पुनः अहमदनगर के अन्तर्गत लाने का प्रयास करने लगे। अकबर ने खानखाना व मुराद को अहमदनगर पर पुनः आक्रमण करने का आदेश दिया। परन्तु दोनों के मतभेद को देखकर बाद में खानखाना को बुला लिया तथा उसके स्थान पर अबुल फजल को भेजा।

इसी बीच 1599 ई० में अतिशय मद्यपान के कारण दौलताबाद के निकट शाहजादा मुराद की मृत्यु हो गयी। उसके स्थान पर अकबर ने शाहजादा दानियाल को नेतृत्व सौंपा। मई, 1599 ई० में शाही सेना ने पुनः अहमदनगर का घेरा डाला। कई माह के घेरे के बाद किले के अन्दर अहमदनगर की सेना भुखमरी के कगार पर पहुँच गई। अन्त में विवश होकर चाँद बीबी मुगलों के साथ संधि हेतु सहमत हो गयी। किन्तु इसी बीच जीताखान नामक एक हिजड़े ने उसकी हत्या कर दी। चाँदी बीबी की हत्या के साथ ही अहमदनगर का पतन हो गया।

1600 ई० में मुगलों ने अहमदनगर के दुर्ग पर अधिकार कर लिया। अहमदनगर के सुल्तान निजामशाह को बन्दी बनाकर ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया गया। इस प्रकार बरार, दौलताबाद और अहमदनगर के किलों पर मुगलों का अधिकार हो गया। किन्तु कुछ समय पश्चात् अमीरों ने मुर्तजा अली नामक एक व्यक्ति को सत्तारूढ़ कर मुगलों के विरूद्ध पुनः संघर्ष आरम्भ किया। अतः अकबर अहमदनगर को मुगल साम्राज्य में मिलाने में असफल रहा और अहमदनगर का अधिकांश भाग मुगल सत्ता से स्वतंत्र रहा।

खानदेश- खानदेश ‘दक्षिण का प्रवेशद्वार’ माना जाता था। इसकी राजधानी बुरहानपुर थी। यहाँ का शासक राजा अली खाँ ने 1596 ई० में स्वेच्छा से अकबर की अधीनता स्वीकार कर ली। 1597 ई० में अली खाँ मुगलों के तरफ से युद्ध करता हुआ मारा गया। इसके बाद उसका पुत्र मीरन बहादुर गद्दी पर बैठा। उसने मुगलों का अधिपत्य मानने से इंकार कर दिया। अकबर ने आसीरगढ़ के किले को घेरने का आदेश दिया। यह घेराबंदी खान-ए-आजम आसफ खान, मुर्तजा खान एवं थट्टा के जानी बेग के संयुक्त नेतृत्व में की गई। शीघ्र ही अबुल फजल भी उसमें सम्मिलित हो गया।

1599 ई० में अकबर स्वयं बुरहानपुर पहुँचा जो खानदेश की राजधानी थी। मीरन बहादुर ने अपने आपको असीरगढ़ के दुर्ग में सुरक्षित कर लिया था। असीरगढ़ का किला सर्वाधिक सुदृढ़ था। यह घेरा कई माह तक चला। जब अकबर को लगा कि किला अजेय है तब उसने रिश्वत और कपट का सहारा लिया। दुर्ग के कुछ अधिकारियों को धन का प्रलोभन देकर अपनी ओर मिला लिया। अतः अन्त में विवश होकर फरवरी 1601 ई० में मीरन बहादुर ने आत्मसमर्पण कर दिया और असीगढ़ के किले पर मुगलों का अधिकार हो गया।

मीरन बहादुर को चार हजार अशर्फियों वार्षिक पेंशन देकर बन्दी के रूप में ग्वालियर के दुर्ग में भेज दिया गया। अकबर ने दक्षिण में विजित खानदेश, अहमदनगर तथा बरार को तीन प्रदेश के रूप में गठित किया तथा शाहजादा दानियाल को इन तीनों प्रान्तों एवं पश्चिमी भारत (गुजरात मालवा) का सुबेदार नियुक्त किया। दानियाल के नाम पर ही दक्कन के सभी मुगल भाग (खानदेश समेत) का नाम दानदेश रखा गया। अकबर के खानदेश विजय के बाद बीजापुर और गोलकुण्डा के शासको ने भी मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली।

बीजापुर के सुल्तान इब्राहिम आदिलशाह ने अपनी पुत्री का विवाह शाहजादा दानियाल से कर दिया। इसके बाद अगस्त, 1601 ई० में अकबर फतेहपुर सीकरी लौट आया। यहीं पर उसने अपने आसीरगढ़ (दक्षिण विजय) की विजय की स्मृति में प्रसिद्ध बुलंद दरवाजा का निर्माण करवाया तथा ‘दक्षिण के बादशाह की उपाधि धारण की।

अकबर ने दक्षिण विजय के बाद अपने राज्यों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित किया उसके साम्राज्य में प्रान्तों की कुल संख्या पन्द्रह थी। जिसमें उत्तर में बारह तथा दक्षिण में तीन थे। उत्तर के बारह राज्य थे- बंगाल, बिहार, इलाहाबाद, अवध, आगरा, दिल्ली, लाहौर, मुल्तान, काबुल, अजमेर, मालवा और अहमदाबाद (गुजरात) तथा दक्षिण में तीन राज्य- अहमदनगर, खानदेश व बसर थे। उड़ीसा, बंगाल का एक सरकार (जिला) था, जबकि कश्मीर और कंधार, काबुल (अफगानिस्तान) सूबा के सरकार थे। इसी प्रकार ब्लूचिस्तान और सिंध मुल्तान सूबा के सरकार थे।

अकबर की धार्मिक नीति

धार्मिक नीति के क्षेत्र में अकबर ने एक नई दिशा में प्रगति की। उसकी महानता उसकी धार्मिक नीति पर ही अधारित है। अकबर से पूर्व सल्तनत कालीन शासकों द्वारा उदार धार्मिक नीति का प्रदर्शन नहीं किया गया। अफगान शासकों में मात्र शेरशाह ने इस दिशा में कुछ प्रयास किया, किन्तु एक पूर्ण उदार धार्मिक नीति का प्रारम्भ अकबर के शासन काल में ही सम्भव हुआ अपनी इस नीति से उसने सभी धर्मो एवं सम्प्रदायों के एकता व समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया।

अकबर की धार्मिक नीति का निर्धारण विभिन्न तत्वों द्वारा हुआ है। धार्मिक उदारता अकबर को विरासत के रूप में मिली थी। यद्यपि बाबर रूढ़िवादी सुन्नी विचारधारा वाले परिवार से सम्बद्ध था किन्तु वह धार्मिक दृष्टिकोण से उदार प्रवृत्ति का था। अकबर के पिता हुमायूँ में भी उदारता एवं साहिष्णुता के गुण विद्यमान थे। अकबर की माता हमीदा बानों बेगम के पिता शिया थे तथा उदार धार्मिक दृष्टिकोण वाले व्यक्ति थे।

अकबर के धार्मिक नीति को उदार बनाने में उसके शिक्षक एवं संरक्षकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बायजीद, मुनीम खाँ, मीर अब्दुल लतीफ व मुल्ला पीर मुहम्मद जैसे उदार शिक्षकों का अकबर पर गहरा प्रभाव पड़ा। इनमें मीर अब्दुल लतीफ अत्यन्त उदार थे जिनका अकबर पर सर्वाधिक प्रभाव पड़ा। इन्हीं से अकबर ने सुलह-ए-कुल अर्थात सर्वात्रिक भाई चारा का श्रेष्ठ सिद्धान्त सीखा।

अकबर का संरक्षक बैरम खाँ भी अत्यन्त उदार था। अकबर की धार्मिक नीति को भक्ति एवं सूफी सन्तों ने भी प्रभावित किया। वह सूफीवाद की चिश्तिया शाखा के अधिक निकट था तथा शेख सलीम चिश्ती के प्रति उसमें अपार श्रद्धा थी। सूफी विद्वान शेख मुबारक तथा उसके पुत्र अबुल फजल एवं फैजी ने भी अकबर की उदार मनोवृत्ति के विकास में महत्वपूर्ण सहयोग दिया। शेख मुबारक 1573 ई० में गुजरात विजय के बाद अकबर के सम्पर्क में आया। इसके अतिरिक्त अकबर स्वयं उदार प्रवृत्ति का व्यक्ति था धर्म एवं जाति का भेदभाव किए बिना प्रजा के कल्याण को ही वह ईश्वर की सच्ची उपासना मानता था।

इसी से प्रभावित होकर 1562 ई० में युद्ध बन्दियों को दास बनाने तथा बलपूर्वक इस्लाम स्वीकार कराने पर प्रतिबंध लगा दिया। 1562 ई० में अकबर ने अम्बर की राजपूत राजपूत राजकुमारी जोधाबाई उर्फ हरखाबाई से विवाह किया। इसका राजनैतिक एवं धार्मिक परिणाम महत्वपूर्ण रहा। वह हिन्दू धर्म के सम्पर्क में आया तथा उन्हें अनेक सुविधाएं प्रदान की। वह स्वयं मथुरा की यात्रा की तथा 1563 ई० में तीर्थयात्रा कर समाप्त कर दिया।

1563 में ही पंजाब में गोहत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया। 1564 ई० में हिन्दुओं पर लगने वाला जजिया कर को भी समाप्त कर दिया। यद्यपि बाद में राजपूतों से संघर्ष के दौरान इस कर को पुनः लगा दिया गया तथा अन्तिम रूप से 1579 ई० में उसने इसे समाप्त कर दिया। अपनी प्रजा की पूर्णरूप से धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान कर अकबर इस्लाम धर्म के मूल तत्वों को समझने की उत्सुकता व्यक्त की। इस उद्देश्य से उसने 1575 ई० में फतेहपुर सिकरी में इबादतपात्र (पूजागृह) के निर्माण का आदेश दिया।

इबादत खाना (पूजा गृह)

  • स्थापना- 1575 ई० में।
  • स्थान– फतेहपुर सीकरी ।

इबादत खाना (पूजा गृह)

1575 ई० तक अकबर सुन्नी धर्म के बाह्य रूपों को मानता रहा। उसने इस्लाम धर्म के दर्शन को समझने के उद्देश्य से शेख अब्दुल नबी तथा मखदूम-उल-मुल्क अब्दुल्ला सुल्तानपुरी जैसे उलेमाओं की शिष्यता ग्रहण की। शिया मत के अनुयायी मुल्ला यजदी भी उसकी आध्यात्मिक पिपासा को शांत नहीं कर सके। अतः 1575 ई० में अकबर ने फतेहपुर सीकरी में एक इबादत खाना (पूजागृह) का निर्माण करवाया। इसमें प्रति वृहस्पतिवार को संध्या के समय नियमित रूप से धार्मिक विचार-विमर्श हुआ करता था।

प्रारम्भ में केवल यह मुसलमान शेख-सैय्यदों और उलेमाओं तक सीमित था। आरम्भ में ही मुस्लिम धर्मशास्त्री दो खेमों में बंट गए जो इस्लामी धर्म ग्रन्थों की व्याख्या के मामले में एक दूसरे के विरोधी थे। इसमें शेख मखदूम-उल-मुल्क और शेख अब्दुल नबी कट्टर सुन्नी दल के नेता थे, जबकि शेख मुबारक, फैजी और अबुल फजल स्वतंत्र विचारकों व उदार धर्मशास्त्रियों के दल का प्रतिनिधित्व करते थे।

शीघ्र ही धर्मशास्त्रियों ने विचार-विमर्श के मध्य एक दूसरे के प्रति असहिष्णुता का भाव दिखाया। शेख व मुल्लाओं की पारस्परिक मत-वैभिन्नता का स्पष्ट उल्लेख बदायूँनी ने किया है। उलेमाओं के आपसी द्वेष एवं उनकी अशिष्टता से अकबर बहुत असंतुष्ट हुआ।

फलतः उसने 1578 ई० में सभी धर्मावलम्बियों के लिए लिए इबादतखाने का द्वार खोल दिया। अब हिन्दू, जैन, पारसी व ईसाई आदि धर्मों के आचार्य भी इवादतखाने में भाग लेने लगे। इबादतखाने में भाग लेने वाले प्रमुख आचार्य है-

1. हिन्दू –पुरुषोत्तम और देवी

2. ईसाई– रूडोल्फ अकावीवा व एण्टोनी मॉनसेरॉट

3. पारसी– दस्तूरजी मेहरजी राणा

4. जैन– हरिविजय सूरी (जगत गुरु की उपाधि), विजयसेन सूरी, भानुचन्द उपाध्याय व जिनचन्द्र सूरी (युग प्रधान की उपाधि) ।

अकबर व ईसाई धर्म- नैतिकता, दया एवं प्रेम के सिद्धान्तों के कारण अकबर ईसाई धर्म की ओर आकृष्ट हुआ। उसके द्वारा आमंत्रित करने पर तीन इसाई मिशन भारत आए । पहला ईसाई मिशन, 19 फरवरी, 1580 ई० को फतेहपुर सीकरी पहुँचा। इस मिशन में रिडोल्फ अक्वा, एण्टोनी मान्सेरॉट और एनरिक्वेज शामिल थे। दूसरा मिशन 1591 से 1592 ई० तक दरबार में रहा।

इस मिशन में एडवर्ड लैताने क्रिस्टोफर-डि-वागा शामिल थे। तीसरा मिशन 1595 ई० में आया। इसमें जैरोम जेवियर, पिनहैरो और वैनेडिक्ट -डि-गोएज शामिल थे। अकबर ने ईसाइयों को आगरा व लाहौर में गिरजा घर बनाने, सार्वजनिक रूप से पूजा पाठ करने लौरी उत्सव मनाने व भारत में ईसाई मत का प्रचार करने की अनुमाति प्रदान की।

अकबर व जैन धर्म- अकबर ईसाई धर्म की अपेक्षा जैन धर्म से अधिक प्रभावित था। अकबर ने जैनाचार्य हरिविजय सूरी, जिन्हें उसने तपगच्छ (गुजरात) आमंत्रित किया था, को जगतगुरु की उपाधि प्रदान की अबुल फजल ने अकबर के दरबार के उन सर्वोच्च विद्वानों में जिनके लिए यह कहा जाता था, कि ये लोग दोनों लोकों का रहस्य जानते हैं, हरिविजय विजय सूरी को भी रखा।

हरिविजय सूरी से प्रभावित होकर अकबर ने वर्ष के कुछ दिनों के लिए स्वयं बांस-मक्षण बन्द कर दिया, बहुत से बन्दियों को छोड़ दिया और पशु-पक्षियों के पर रोक लगा दी। हरिविजय सूरी अकबर के दरबार में दो वर्ष तक रहे। इसके अतिरिक्त अकबर अन्य जैनाचार्य शान्तिचन्द्र, विजयसेन सूरी, भानुचन्द्र उपाध्याय व जयसोम उपाध्याय से भी भेंट की। खतरगच्छ सम्प्रदाय के जैनाचार्य जिन चन्द्र सूरी को 1991 ई० में अकबर ने अपने दरबार में आमंत्रित किया तथा युग प्रधान की उपाधि से सम्मानित किया।

अकबर और पारसी धर्म- जैन धर्म की अपेक्षा अकबर पारसी धर्म को अधिक पसन्द करता था। 1578 ई० में उसने सूरत में पारसी पुरोहित नवसारी के दस्तूरजी मेहरजी राणा से भेंट की। अकबर ने दस्तूर जी राणा को 200 बीघा जमीन जीविकोपार्जन के लिए दिया। इसके साथ उन्हें यह अधिकार भी दिया कि वे इस भूमि को अपने लड़कों के नाम भी कर सकते थे।

पारसी विधान के अनुसार ही अकबर ने राजमहल में पवित्र अग्नि प्रज्वलित करने का आदेश दिया जो अबुल फजल की देख-रेख में लगातार जलती रहती थी। पारसी धर्म के प्रभाव से बादशाह सूर्य, अग्नि और प्रकाश के प्रति पूजा भाव प्रकट करने लगा तथा झरोखा दर्शन, तुलादान व पायबोस जैसी पारसी परम्पराओं को आरम्भ किया।

अकबर और हिंदू धर्म- अकबर सबसे अधिक हिंदू धर्म से प्रभावित था। हिन्दू धर्म के सिद्धान्तों का पूर्ण परिचय प्राप्त करने के उद्देश्य से अकबर ने जिन हिन्दू-आचायों से सम्पर्क किया उनमें पुरूषोत्तम और देवी प्रमुख थे। इनके प्रभाव से उसने बहुत से विश्वासों एवं विधानों को अपना लिया। वह स्वयं हिन्दू त्यौहारों- होली, दीवाली व बसन्त आदि में भाग लेता था। अकबर ने बल्लाभाचार्य के पुत्र

विट्ठल नाथ की गोकुल एवं जैतपुरा की जागीर दी थी। सूफीमत- सूफी सम्प्रदायों में अकबर चिश्चितया मत के अधिक निकट था तथा उसे प्रश्रय प्रदान किया। यह शेख सलीम चिश्ती का परम भक्त था। इन्हीं के आशीर्वाद से अकबर को एक पुत्र की प्राप्ति हुई जिसका नाम उन्हीं के नाम पर सलीम (जहांगीर) रखा। इस प्रकार इबादतखाने में होने वाली वाद-विवाद ने अकबर के धार्मिक विचारों के विकास में गहरी भूमिका निभायी। इससे अद्वैतवाद के प्रसार में सहायता मिली।

महजर की घोषणा

अकबर ने फतेहपुर सीकरी की जामा मस्जिद के प्रधान पुरोहित को पदच्युत कर दिया तथा 22 जून, 1579 ई० को स्वयं प्रवचन मंच पर चढ़ा और अपने ही नाम का खुतबा पढ़ा। वह खुतबा का प्रारूप परवर्तित करना चाहता था परन्तु उलेमाओं के आक्रामक प्रतिशोध के कारण उसे क्रियान्वित नहीं कर सका। इसके दो माह पश्चात् सितम्बर 1579 ई० में समस्त धार्मिक मामलों को अपने हाथ में लेने के लिए एक महजरनामा व घोषणा पत्र जारी करवाया जिसके अनुसार उलेमा के मतभेदों की दशा में अकबर को इमामे आदिल (प्रधान व्याख्याकार) के रूप में स्वीकार किया गया। इस दस्तावेज में उसे अमीर-उल-मोमिनीन कहा गया।

महजर की घोषणा के द्वारा अकबर धार्मिक विषयों पर विवाद की स्थिति में सबसे बड़ा धार्मिक अधिकारी हो गया। उसे विरोधी न्यायिक धारणाओं में से किसी एक को चुनने का अधिकार प्राप्त था। उसका निश्चय अन्तिम होता था तथा उलेमा व मुस्लिम जनता इससे बद्ध होती थी। महजर पत्र का प्रारूप शेख मुबारक ने तैयार किया था तथा उसे जारी करने की प्रेरणा स्वयं मुबारक तथा उसके दोनों पुत्र अबुल फजल एवं फैजी द्वारा दी गई थी।

इस प्रारूप पत्र पर सद्र-उस- सुदूर अब्दुलनबी, मखदूमुलमुल्क, जलालुद्दीन मुल्तानी, सदे जहाँ गाजी खाँ बदख्शी, व शेख मुबारक आदि के हस्ताक्षर थे। अकबर द्वारा महजरनामा की घोषणा के विषय में विद्वानों के अलग-अलग मत हैं- स्मिथ एवं वूल्जले हेग ने “महजर को अचूक आज्ञापत्र की संज्ञा दी है। इनके अनुसार “अकबर पोप भी बन गया और राजा भी।” परन्तु यह आरोप सही नहीं है क्योंकि अकबर किसी धार्मिक पहलू पर विवाद की स्थिति में ही धर्म का व्याख्याता हुआ न कि सामान्य स्थिति में ।

दीन-ए-इलाही

दीन-ए-इलाही (तौहीद-ए-इलाही) धर्म की स्थापना अकबर ने 1582 ई० में की थी। इसका उद्देश्य एक नये धर्म का प्रवर्तन नहीं बल्कि सभी धर्मो में सामंजस्य स्थापित करना था। दीन-ए-इलाही वास्तव में सूफी सर्वेश्वरवाद पर आधारित एक विचार पद्धति थी जिसके प्रवर्तन की प्रेरणा मुख्य रूप से निजामुद्दीन औलिया के सुलहकल या सार्वभौमिक सौहार्द्र से मिली थी। इस नवीन सम्प्रदाय का प्रधान पुरोहित अबुल फजल था।

आइने अकबरी में कुल अठारह लोगों का नाम मिलता है जिन्होंने दीन-ए-इलाही को पूरी तरह से ग्रहण किया था हिन्दुओं में केवल बीरबल ने ही इसे स्वीकार किया था जबकि राजा भगवान दास मानसिंह इसके सदस्य बनने से साफ इंकार कर दिए थे। सदस्यता- दीन-ए-इलाही के सदस्यता का द्वार सभी धर्मों के लोगों के लिए खुला था। शिष्यता ग्रहण करने का दिन रविवार निश्चित किया गया था। इस दिन सदस्यता ग्रहण करने वाले नवागंतुक हाथ में पगड़ी लेकर बादशाह के चरणों में अपना शीश रख देते थे तथा बादशाह उसे उठाकर अपने हाथों से उसकी पगड़ी उसके सिर पर रखता था तथा गुरु के रूप में उसे गुरू मंत्र देता था।

इसके सदस्य जब एक दूसरे से मिलते थे तो अल्लाह-ओ- अकबर (अल्लाह महान है) तथा जल्ले • जलालहू (उसके यश में वृद्धि हो) से एक दूसरे का संबोधन करते थे। दीन-ए-इलाही के सदस्यों को चरणों अर्थात् चहारगाना-ए-इल्खास को पूरा करना होता था। ये चार चरण थे- जमीन, सम्पत्ति, सम्मान और धर्म। इनमें से चारों को समर्पित करने वाला सदस्य उच्चतम श्रेणी में तथा तीन, दो या एक को समर्पित करने वाले क्रमशः नीचे की श्रेणी में आते थे।

प्रमुख सिद्धान्त- दीन-ए-इलाही के अन्तर्गत मुख्य सिद्धान्त निम्नलिखित थे-

1. साम्राट को अपना आध्यात्मिक गुरू मानना ।

2. उसके आदेशानुसार आचरण मानना ।

3. दानता तथा दानशीलता

4. सांसारिक इच्छा का परित्याग 5. शाकाहारी भोजन लेना

6. विशुद्ध नैतिक जीवन व्यतीत करना ।

7. मधुर भाषी होना

8. ईश्वर से प्रेम तथा उसकी एकात्मकता के प्रति समर्पण।

इसके अतिरिक्त दीन-ए-इलाही के सदस्यों को मांस के सेवन से बचने के लिए कहा गया। प्रत्येक सदस्य को अपने जन्मोत्सव पर भोजन एवं दान देना होता था। अल्पायु, बाँझ एवं गर्भवती स्त्रियों से सहवास वर्जित था। बहेलियों, मछुओं, कसाइयों आदि निम्न कोटि की जातियों के साथ भोजन करना निषिद्ध था। 1583 ई० में अकबर ने एक नया संवत् इलाही संवत् जारी किया।

विभिन्न मत- अकबर के दीन-ए-इलाही के सम्बन्ध में इतिहासकारों ने अपना अलग-अलग मत दिया है। जहाँगीर के समकालीन मोहसिन फानी ने अपनी रचना दबिस्तनि मजाहिब में पहली बार इसे स्वतंत्र धर्म के रूप में वर्णित किया है। स्मिथ के अनुसार- दीन-ए-इलाही अकबर की मूर्खता का स्मारक है, उसकी बुद्धिमत्ता का नही……..” ।

सामाजिक सुधार


अकबर ने हिन्दुओं तथा मुसलमानों दोनों के सामाजिक जीवन को सुधारने का प्रयास किया। उसने दास प्रथा को समाप्त कर दिया। बहुविवाह को प्रतिबंधित किया तथा विधवा-विवाह को प्रोत्साहन दिया। बाल विवाह को रोकने के लिए अकबर ने 16 वर्ष से कम आयु के बालक तथा 14 वर्ष से कम आयु की कन्या का विवाह वर्जित कर दिया। विवाहों की वैधानिकता की जांच के लिए तुरबेग नामक अधिकारी की नियुक्ति की उसने अन्तर्जातीय विवाह को भी प्रोत्साहन दिया।

राजपूतों में कन्या के जन्म पर उसकी हत्या कर दी जाती थी किन्तु अकबर ने इस पर रोक लगा दिया। उसने सती प्रथा को भी प्रतिबंधित कर दिया। भिक्षावृत्ति के समाधान का प्रयास किया तथा वेश्याओं को नगर के बाहर एक अलग स्थान पर निवास करने की आज्ञा प्रदान की और उस स्थान का नाम शैतानपुरी रखा।

अकबर के अन्तिम दिन व मृत्यु


अकबर के जीवन के अन्तिम दिन बहुत दुःख पूर्ण रहे उसके दो पुत्रों मुराद एवं दानियाल की अत्यधिक मदिरापान के कारण क्रमशः 1599 ई० तथा 1607 ई० में मृत्यु हो गयी थी । उसके ज्येष्ठ पुत्र सलीम विद्रोही हो चुका था। इसके अतिरिक्त शाहजादा सलीम के इशारे पर वीर सिंह बुंदेला द्वारा 19 अगस्त 1602 ई० को अबुल फजल की हत्या तथा 1593 ई० शेख मुबारक व 1595 ई० में फैजी की मृत्यु के कारण अकबर अत्यन्त दुःखी रहता था। अबुल फजल की हत्या अकबर को वज्रपात जैसी लगी थी।

4 अक्टूबर, 1605 ई० को अकबर अतिसार से पीड़ित हो गया। उसका व्यक्तिगत वैद्य हकीम अली बीमारी को पहचानने में विफल रहा अत हालत बिगड़ती चली गयी। अन्ततः 25-26 अक्टूबर, 1605 ई० को अर्ध रात्रि अकबर की मृत्यु हो गयी। उसे आगरा के निकट सिकन्दरा में दफनाया गया। अकबर का अन्तिम संस्कार मुस्लिम रीति-रिवाज के अनुसार हुआ अकबर को उसकी मृत्यु के पश्चात् ‘अर्श- आशियानी’ (स्वर्ग में रहने वाला) कहा गया।


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