सम्राट अशोक की जीवनी 273-236 ईसा पूर्व पूर्व Samrat Ashok Ki Jivni

 सम्राट अशोक की जीवनी   273-236 ईसा पूर्व  Samrat Ashok Ki Jivni

सम्राट अशोक महान और बौद्ध धर्म

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     बिंदुसार की मृत्यु के पश्चात बिंदुसार की मृत्यु के पश्चात उसका सुयोग्य पुत्र अशोक महान विशाल मौर्य साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। अशोक विश्व इतिहास के उन महानतम सम्राटों में अपना सर्वोपरि स्थान रखता है, जिन्होंने अपने युग पर अपने व्यक्तित्व की छाप लगा दी है तथा भावी पीढ़ियाँ जिनका नाम अत्यंत श्रद्धा एवं कृतज्ञता के साथ स्मरण करती हैं। निःसन्देह उनका शासनकाल भारतीय इतिहास के उज्जवलतम पृष्ठ का प्रतिनिधित्व करता है। अशोक के शिलालेखों में उसके शासन के इतिहास के मुख्य चरणों तथा उसके क्रियाकलापों के पीछे अंतर्निहित उद्देश्यों का स्पष्ट रूप से उल्लेख हुआ है। उज्जैनी और तक्षशिला में राज्यपाल के रूप में कार्य करने के उपरांत अशोक बिंदुसार के बाद मौर्य सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
 
 

life of ashoka

 

 अशोक का प्रारंभिक जीवन- Ashoka’s early life-

       अशोक के प्रारंभिक जीवन के विषय में हमारे पास केवल पारंपरिक विवरण ही उपलब्ध हैं। यद्यपि अशोक के बहुत से अभिलेख प्राप्त हुए हैं तथापि हमें उसके प्रारंभिक जीवन के लिए मुख्यत: बौद्ध साक्ष्यों-दिव्यदान तथा सिंहली अनुश्रुतियों पर ही निर्भर करना पड़ता है। 

 अशोक की माता का नाम  

बौद्ध साहित्य में अशोक की माता का नाम जनपद कल्याणी या सुभद्रांगी था। 
 
शासक बनने से पहले राजकुमार के रूप में अशोक ने उज्जैनी तथा तक्षशिला के राज्य प्रमुख ( वायसराय ) पद पर कार्य किया था।

 अशोक की पत्नियां 

      उज्जैन में उसके शासन के दौरान उसका विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री से प्रेम हो गया जिसका उल्लेख देवी अथवा विदिशा महादेवी  के रूप में मिलता है। अशोक ने उससे विवाह कर लिया। अशोक की दो अन्य सुप्रसिद्ध रानियाँ असंधिमित्रा तथा कारूवाकी थीं। इसके आलावा पद्मावती और तिष्यरक्षिता  का भी विवरण आता है। दूसरी रानी कारूवाकी का उल्लेख इलाहाबाद के स्तम्भ लेख पर उत्कीर्ण रानी की राजाज्ञा में मिलता है, जिसमें उसके धार्मिक तथा पुण्यार्थ दान का उल्लेख है। उसका वर्णन राजकुमार तीवर की माता के रूप में हुआ है। 
🔴  तीवर अशोक का एकमात्र पुत्र है जिसका उल्लेख शिलालेखों में मिलता है।
     अशोक ने अपना उल्लेख पियदस्सी राजा मगध अर्थात प्रियदर्शी मगध नरेश के रूप में किया है। अपने शिलालेखों में अशोक ने दो उपाधियाँ-देवनाम्प्रिय और पयदस्सी ( संस्कृत में उसकी उपाधि का पूर्ण रूप है देवानाम्प्रिय प्रियदर्शी राजा ) धारण की है।

 अशोक का राज्यरोहण–  

    अशोक अपने पिता (बिंदुसार ) के शासनकाल में अवन्ति ( उज्जयिनी ) का उपराजा (वायसराय ) था। सिंहली अनुश्रुतियों ( महावंश तथा दिव्यदान ) के अनुसार अशोक ने सिंहासन प्राप्त करने के लिए अपने 99 भाइयों की हत्या की। परन्तु सिंहली अनुश्रुतियों की इन कथाओं पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अशोक के पाँचवें अभिलेख में उसके जीवित भाइयों के परिवार का उल्लेख मिलता है। अभिलेखीय साक्ष्यों से यह भी ज्ञात हाेता है कि अशोक के शासन के तेरहवें वर्ष में उसके अनेक भाई तथा बहन जीवित थे जो साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में निवास करते थे। सम्भवतः उत्तराधिकार के युद्ध में उसे अपने भाईयों से युद्ध करना पड़ा हो, और अपनी स्थिति सुदृढ़ करने में चार वर्ष का समय लगा। क्योंकि 269 ईसा पूर्व में विधिवत् उसका राज्याभिषेक हुआ। उसके अभिलेखों में आभिषेक के समय से ही राज्यगणना की गई है।
 
🔴 मास्की तथा गूर्जरा के लेखों में अशोक का नाम ‘अशोक’ मिलता है।

   
 

कलिंग युद्ध तथा उसके परिणाम Kalinga war and its consequences

 
🔴अपने शासन के आठवें वर्ष ( 261 ईसा पूर्व ) में अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया।
🔴 कलिंग का प्राचीन राज्य वर्तमान दाक्षिणी उड़ीसा में स्थित था।
🔴अशोक के तेरहवें शिलालेख में कलिंग युद्ध का वर्णन है।
🔴कलिंग युद्ध में डेढ़ लाख मनुष्यों का अपहरण (युद्ध बन्दी ) हुआ।
🔴एक लाख लोगों की हत्या की गई तथा कई गुना लोग घायल हुए।
🔴कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने युद्ध नीति को त्याग कर धम्म नीति को अपना लिया।
🔴 अशोक ने बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिया।
🔴इसके बाद एक नये युग का प्रारम्भ हुआ और यह युग था– शान्ति, अहिंसा, सामाजिक प्रगति तथा धम्म यात्राओं का।

              अशोक और बौद्ध धर्म Ashoka and Buddhism

king ashoka and his relesone
भगवान महात्मा बुद्ध

 

    अशोक अपने प्रारंभिक वर्षों में ब्राह्मण धर्म का अनुयाई था। राजतरंगिणी के आधार पर यह कहा जा सकता है कि वह भगवान शिव का उपासक था। सिंहली अनुश्रुतियों – दीपवंश और महावंश- के अनुसार  अशोक को उसके शासन के चौथे वर्ष में ‘निग्रोथ’ नामक सात वर्षिय भिक्षु ने बौद्ध मत में दीक्षित किया। इसके पश्चात ‘मोग्गलिपुत्ततिस्स’ के प्रभाव से वह पूर्णरूपेण बौद्ध बन गया।
🔴अशोक अपने तेरहवें शिलालेख में घोषणा करता है कि ‘इसके बाद देवताओं का प्रिय धम्म की सोत्साह परिरक्षा, सोत्साह अभिलाषा एवं सोत्साह शिक्षा करता है?”(तिवेध्रमाशिलन ध्रम कमत ध्रमनुशस्ति देवन-पियस……….।) 
🔴प्रथम लघु शिलालेख में हम जानकारी पाते हैं कि अशोक बौद्ध बनने के पश्चात् ढाई वर्ष तक वह साधारण उपासक था।
🔴अपने अभिषेक के दसवें वर्ष अशोक ने सम्बोधि ( बोधगया ) की यात्रा की।
🔴 बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेने के पश्चात अशोक के जीवन में अनेक परिवर्तन उत्पन्न हो गए उसने अहिंसा तथा सदाचार पर चलना प्रारंभ कर दिया, उसने मांस-भक्षण त्याग दिया तथा राजकीय भोजनालय में मारे जाने वाले पशुओं की संख्या कम कर दी गई। आखेट तथा विहार यात्रा रोक दी गयीं और उनके स्थान पर धर्म यात्राओं का प्रारंभ हुआ।
🔴 बौद्ध धर्म ग्रहण करने के पश्चात अशोक ने सर्वप्रथम बोधगया की यात्रा की।
🔴 अपने अभिषेक के बीसवें वर्ष अशोक ने लुंबिनी ग्राम की यात्रा की। उसने वहां पत्थर की सुदृढ़ दीवार बनवाई तथा शिला-स्तंभ खड़ा किया। क्योंकि वहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था।। अतः लुंबिनी ग्राम कर मुक्त घोषित किया गया तथा केवल 1/8 भाग लेने की घोषणा की गई (रूमिन्देई का लघु स्तम्भ लेख ) ।
🔴 अशोक ने नेपाल की तराई में स्थित निग्लीवा में कनकमुनि ( एक पौराणिक बुद्ध ) के स्तूप को संबर्द्धित एवं द्विगुणित करवाया। अनुश्रुतियां उसे 84000 स्तूपों के निर्माता के रूप में स्मरण करती हैं।
🔴 सांची के लघु स्तंभ लेख में वह ( अशोक ) बौद्ध संघ में फूट डालने वाले भिक्षुओं तथा भिक्षुओं को चेतावनी देता है–जो कोई भिक्षु या भिक्षुणी संघ को भंग करेगा वह श्वेत वस्त्र पहनाकर अयोग्य स्थान पर रखा जाएगा। इस प्रकार यह आदेश  भिक्षु संघ और भिक्षुणी संघ में सूचित किया जाना चाहिए क्योंकि मेरी इच्छा है कि संघ समग्र होकर चिरस्थायी हो जाए (ये संघ भखति भिखु या भिखुनि वा ओदातानिदुसानि सनंधापयितु अनावासमि वासापेतविये । इछा हि मे किंति संघे समगे चिंलथितीके सियाति । )।
🔴 अशोक ने अपने अभिषेक के 18 में वर्ष लंका के राजा के पास भेजे गए एक संदेश में बताया था कि वह शाक्यपुत्र ( गौतम बुद्घ ) के धर्म का एक साधारण उपासक बन गया है।

               अशोक की धार्मिक नीति Ashoka’s Religious Policy

  यद्यपि अशोक ने व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया तथा पूर्णरूपेण आश्वस्त हो गया कि जो कुछ भगवान बुद्ध ने कहा है वह शब्दशः सत्य है, तथापि अपने विशाल साम्राज्य में उसने कहीं भी किसी दूसरे धर्म अथवा संप्रदाय के प्रति अनादर अथवा असहिष्णुता प्रदर्शित नहीं की। उसके अभिलेख इस बात के साक्षी हैं कि अपने राज्य के विभिन्न मतों तथा संप्रदायों के प्रति वह सदैव उदार एवं सहनशील बना रहा। उसने बलपूर्वक किसी को भी अपने मत में दीक्षित करने का प्रयास नहीं किया।
🔴 सातवें शिलालेख में वह अपनी धार्मिक इच्छा व्यक्त करते हुए बताता है कि सब मतों के व्यक्ति सब स्थानों पर रह सके क्योंकि वे सभी आत्म संयम एवं हृदय की पवित्रता चाहते हैं ( देवानपियो पियदासि  राजा सर्वत इछति सवे पासंडा बसेयु। सवे ते सयमं चा भावसुधिं च इछति । )
🔴 12 वें शिलालेख में अशोक ने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करते हुए कहा है—–‘ मनुष्य को अपने धर्म का आदर और दूसरे धर्म की अकारण निंदा नहीं करनी चाहिए। एक ना एक कारण से अन्य धर्मों का आदर करना चाहिए ऐसा करने पर मनुष्य अपने संप्रदाय की वृद्धि करता है तथा दूसरे के संप्रदाय का उपकार करता है। इसके विपरीत करता हुआ वह अपने संप्रदाय को क्षीण करता है तथा दूसरे के संप्रदाय का अपकार करता है। जो कोई अपने संप्रदाय के प्रति भक्ति और उसकी उन्नति की लालसा से दूसरे के धर्म की निंदा करता है वह वस्तुतः आपने संप्रदाय की बहुत बड़ी हानि करता है। लोग एक दूसरे के धम्म को सुनें। इससे सभी संप्रदाय बहुश्रुत ( अधिक ज्ञान वाले ) होंगे तथा संसार का कल्यांण होगा।’
🔴 अशोक ने बराबर ( गया जिला ) पहाड़ी पर आजीवक संप्रदाय के सन्यासियों के निवास के लिए कुछ गुफाएं निर्मित करवाई थी।

                   अशोक का धम्म

    अपनी प्रजा के नैतिक उत्थान के लिए अशोक ने जिन आचारों की संहिता प्रस्तुत की उसे उसके अभिलेखों में धम्म कहा गया है। धम्म संस्कृत के धर्म का ही प्राकृत रूपांतर है। परंतु अशोक के लिए इस शब्द का विशेष महत्व था। वस्तुतः यदि देखा जाए तो यही धम्म तथा उसका प्रचार अशोक के विश्व इतिहास  में प्रसिद्ध होने का सर्वप्रमुख कारण है।
    दूसरे स्तंभ-लेख में अशोक स्वयं प्रश्न करता है –‘कियं चु धम्मे?’ ( धर्म क्या है?)। इसका उत्तर वह दूसरे एवं सातवें स्तंभ-लेखों में स्वयं देता है। वह हमें उन गुणों को गिनाता है जो धम्म  का निर्माण करते हैं। इन्हें हम इस प्रकार रख सकते हैं—‘अपासिनवेबहुकयानेदयादानेसचेसोचयेमाददेसाधवे’  च।
अर्थात
1- अपासिनवे- अल्प पाप।
2-बहुकयाने- अत्याधिक कल्याण।
3-दया।
4 दान।
5-सत्यवादिता।
6-सोचये- पावित्रता।
7-मादवे- मृदुता।
8-साधवे- साधुता।
    इन गुणों को व्यवहार में लाने के लिए निम्नलिखित बातें आवश्यक बताई गई हैं—–
1- अनारम्भो प्राणानाम् ( प्राणियों की हत्या न करना)।
2- आविहिंसा भूतानाम् (प्राणियों को क्षति न पहुंचाना )।
3- मातरि-पितरी सुस्रुसा (माता- पिता की सेवा करना )।
4- थेर सुस्रुसा ( वृद्धों की सेवा करना )।
5- गुरुणाम अपचिति ( गुरुजनों का सम्मान करना )।
6- मित संस्तुत नाटिकाना बहमण-समणानां दानं संपटिपति (मित्रों, परिचितों, ब्राहम्णों तथा श्रमणों के साथ सच्छा व्यवहार करना )।
7- दास-भतकम्हि सम्य प्रतिपति ( दासों एवं नौकरों के साथ अच्छा बर्ताव करना )।
8- अप-व्ययता ( अल्प व्यय )।
9- अपभाण्डता (अल्प संचय )।
  यह धम्म के व्यवहारिक पक्ष हैं। इसके अतिरिक्त अशोक के धम्म का एक निषेधात्मक पक्ष भी है। जिसके अंतर्गत कुछ दुर्गुणों की गणना की गई है। ये दुर्गुण व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग में बाधक होते हैं। इन्हें ‘आसिनव’ शब्द से व्यक्त किया गया है। आसिनव को अशोक तीसरे स्तंभ लेख में पाप कहता है। मनुष्य आसिनव के कारण सद्गुणों से विचलित हो जाता है। उसके अनुसार निम्नलिखित दुर्गुणों से आसिनव हो जाते हैं।
1- चंडिये अर्थात प्रचण्डता।
2- निठुलिये अर्थात निष्ठुरता।
3- कोधे अर्थात क्रोध।
4- मनो अर्थात घमण्ड।
4- इस्सा अर्थात ईर्ष्या।
      इस प्रकार धर्म का पूर्ण परिपालन तभी संभव हो सकता है जब मनुष्य उसके गुणों के साथ ही साथ इन विकारों से भी अपने को मुक्त रखे।  इसके लिए यह भी आवश्यक है कि मनुष्य सदा आत्म- निरीक्षण करता रहे, ताकि उसे अधःपतन के मार्ग में अग्रसर करने वाली बुराइयों का ज्ञान हो सके। तभी धर्म की भावना का विकास हो सकता है। धर्म के मार्ग का अनुसरण करने वाला व्यक्ति स्वर्ग की प्राप्ति करता है और उसे इहलोक तथा परलोक दोनों में पुण्य की प्राप्ति होती है।

     प्रांतीय प्रशासन के केंद्र-  

     अशोक के पितामहा चंद्रगुप्त के समय से ही पाटलिपुत्र (पटना) राजधानी थी। कौशांबी ( इलाहाबाद उत्तर प्रदेश के पास) , उज्जैनी ( मध्य प्रदेश), सुवर्णागिरी ( शायद यह एर्रगुडी आंध्र प्रदेश के समीप स्थित आधुनिक जौनागिरी जिसका उपमंडल इसिला ( सिद्धपुर) था। कलिंग उड़ीसा में तोसाली ( धौली) और समापा (जौगढ़ के पास) प्रांतीय प्रशासन के महत्वपूर्ण केंद्र थे। जिनका स्पष्ट उल्लेख मिलता है कुछ अन्य केंद्र भी रहे होंगे।150 ईसा पूर्व के रुद्रदामन के जूनागढ़ शिलालेख में यवन राजा ‘तुषास्फ’  का सौराष्ट्र में अशोक के प्रांतीय गवर्नर के रूप में उल्लेख है।
        पृथक कलिंग शिलालेखों में तोसाली और उज्जैनी के प्रांत प्रमुखों को कुमार कहा गया है। ब्रम्हगिरी-सिद्धपुर के शिलालेखों में स्वर्ण गिरी के प्रांत प्रमुख को आर्यपुत्र के नाम से संबोधित किया गया है। तोसाली, सुवर्णगिरी, उज्जैनी और तक्षशिला प्रत्येक राजपरिवार के राजकुमार के अधीन थे।

   अशोक के शिलालेखों में उल्लिखित प्रमुख अधिकारी—

1- महामात्र महामात्र और धम महामात्र शब्द अधिकारियों के पद क्रम में निश्चित ही उच्च स्तर का सूचक था। उन्हें साम्राज्य के प्रत्येक बड़े नगर तथा जिले में नियुक्त किया जाता था। शिलालेखों में पाटलिपुत्र, कौशांबी, तोसाली समापा, सुवर्णागिरी तथा इसिला के महामात्र का उल्लेख मिलता है। इनमें से प्रत्येक महामात्र को प्रदान की गई अतिविशिष्ट उपाधियों से ही उसके कर्तव्यों की जानकारी हो जाती है।
🔴 अशोक ने अपने राज्य अभिषेक के 13 वर्ष के पश्चात धम महामात्रों के पद का सृजन किया था इसका उल्लेख पांचवें शिलालेख में हैं।
🔴 धम्म महामात्रों का कर्तव्य देश में सभी संप्रदायों के बीच धम्म प्रवर्तन करना तथा उसको बढ़ावा देना और धम्म में निरत लोगों के सुख-शांति का संवर्धन करना था।
🔴 अंत महामात्र सीमाओं पर किए जाने वाले अभियानों के अध्यक्ष होते थे जो सीमाओं पर तथा अन्यत्र जनजातियों में धम्म का प्रचार करते थे।
2-इतिझक महामात्र ( स्त्री-अध्यक्ष महामात्र )-  जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है कि वे स्त्रियों के कल्याण से संबंधित अधिकारी थे। लेकिन उनके कर्तव्यों का विस्तृत विवरण अभी तक नहीं प्राप्त हुआ है।
3- राजुक और राष्ट्रिय (रथिक )  तीसरे वृहद् शिलालेख तथा प्रथम एवं चतुर्थ स्तंभ लेखों में राजुक या रज्जुक का उल्लेख मिलता है। चतुर्थ स्तंभ लेख में राजुकों का उन अधिकारियों के रूप में उल्लेख किया गया जिन के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत लाखों लोग निवास करते थे। इनका कार्य जनपद के कल्याण का संवर्धन करना था। अशोक ने राजुकों को दंड एवं पुरस्कार प्रदान करने की स्वतन्त्रता भी दी थी। दंड देने के संदर्भ से यह पता चलता है कि राजुक न्यायिक कार्य भी करते थे।
4-युक्त तृतीय वृहद् शिलालेख में युक्तों को अधीनस्थ अधिकारी के रूप में उल्लेखित किया गया है तथा उन्हें संभवत सचिवालय संबन्धी एवं लेखा-कार्य सौंपा गया था।
5- प्रतिवेदक-  चतुर्थ वृहद् शिलालेख एवं अन्य शिलालेखों में प्रतिवेदक नामक जिन राज्य कर्मचारियों का उल्लेख किया गया है उनका कार्य राजा को शासन और जनता संबंधी सभी बातों की सूचनाएं प्रदान करते रहना था। उनकी सम्राट के पास सीधी पहुंचती है।
6- पुलिस-  अशोक के शिलालेखों मैं राजुकों या रज्जुकों के साथ पुलिस (अर्थात पुरुषों ) का उल्लेख है। जो राजुकों की भांति सम्राट के आदेशों का पालन करते हैं।
7-वचभूमिक–  गौशालाओं के निरीक्षक होते थे जिनका कार्य पशुधन की देखरेख करना था।
8-नगर व्यावहारिक(नगल-व्यूहालिक )-  नगर व्यवहारिक प्रशासन व्यवस्था की देखरेख करने के साथ-साथ न्यायाधिकारियों के रूप में भी कार्य करते थे। अशोक ने इन अधिकारियों को अपने शिलालेखों में निर्देश देते हुए कहा कि वे हर समय यह प्रयास करें कि अकारण किसी को बंधन और परिक्लेश का दंड ने मिले।

🔴 कल्हण अशोक को कश्मीर का प्रथम मौर्य शासक बताता है।
🔴 अशोक ने कश्मीर में श्रीनगर तथा नेपाल में देवीपाटन नामक दो नगरों की स्थापना की।
 
 निष्कर्ष 
       इस प्रकार इस ब्लॉग में हमने भारत के महान सम्राट अशोक के विषय में जाना। अशोक की नीतियों ने भारत को विश्व इतिहास में विशिष्ट पहचान दिलाई। यह अशोक ही था जिसने बौद्ध धर्म को भारत के बाहर पहचान दिलाई। उसके सार्वजानिक कार्यों ने जनता को अनेक सुविधाएं प्रदान की।

  

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