Muhammad Bin Tughlaq in Hindi | मुहम्मद बिन तुग़लक़- इतिहास, योजनाएं, उपलब्धियां, असफलताएं, चरित्र और मृत्यु

Muhammad Bin Tughlaq in Hindi | मुहम्मद बिन तुग़लक़- इतिहास, योजनाएं, उपलब्धियां, असफलताएं, चरित्र और मृत्यु

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Last updated on February 24th, 2024 at 06:41 pm

सल्तनतकालीन भारतीय इतिहास का सबसे शिक्षित मगर सबसे अभागा सुल्तान था Muhammad Bin Tughlaq-मुहम्मद तुग़लक़ । उसके पिता का नाम गयासुद्दीन तुग़लक़ उर्फ़ गाज़ी मालिक था। गयासुद्दीन की मृत्यु 1325 ईस्वी होने के बाद उसके उत्तराधिकारी के रूप में उसके पुत्र राजकुमार जूना खां को सिंहासन पर बैठाया गया। यही जूना खां मुहम्मद तुग़लक़ की उपाधि धारण करके इतिहास में प्रसिद्ध हुआ। हमें अनेक स्रोतों से उसके विषय में रोचक और विश्वसनीय जानकरी मिलती है।

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Muhammad Bin Tughlaq in Hindi | मुहम्मद बिन तुग़लक़- इतिहास, योजनाएं, उपलब्धियां, असफलताएं, चरित्र और मृत्यु

Muhammad Bin Tughlaqमुहम्मद तुग़लक़ के विषय में जानकारी के साहित्यिक स्रोत

मुहम्मद तुग़लक़ के विषय में जानकारी के हमारे पास विवसनीय स्रोत उपलब्ध हैं जो इस निम्नवत हैं —–

1- जियाउद्दीन बरनी- ज़याउद्दीन बरनी दोआब में बरन यानि वर्तमान बुलंदशहर का निवासी था। वह फ़िरोज़शाह तुग़लक़ के समय का प्रसिद्ध विद्वान था। उसने तारीखे-फ़िरोज़- शाही की रचना की। इस पुस्तक में उसने मुहम्मद तुग़लक़ के चरित्र और उसकी योजनाओं-राजधानी परिवर्तन, मुद्रा प्रचलन, दोआब में कर वृद्धि के विषय में विस्तार से लिखा है। इसने एक अन्य पुस्तक फ़तवाये-जहाँदारी की भी रचना की।

2- इब्न बतूता- मुहम्मद तुग़लक़ के विषय में इब्न बतुता ने विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध कराई है। उसका जन्म 24 फरवरी 1304 ईस्वी में अफ़्रीकी देश मोरक्को प्रदेश के प्रसिद्ध नगर तांजियर हुआ था। इसका वास्तविक नाम मुहम्मद बिन अब्दुल्ला इब्न बत्तूता था। वह 12 सितम्बर 1333 ईस्वी में सिंध पहुंचा। उसने रिहला(क़िताब-उर-रिहला) की रचना की जिसमें भारत के विषय में लिखा। वह आठ वर्ष [ 1334- 1342 ] भारत में रहा। उसने मुहम्मद तुग़लक़ को दानदाता और रक्तपिपाशु कहा है।

3- इन सबके अतिरिक्त हमें अन्य स्रोत भी मिलते है —

  • शम्स-ए-सिराज अफीफ – तारीखे-फ़िरोज़शाही, फतुहात-ए-फ़िरोज़शाही
  • ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी – मुंशते मैहरु
  • अमिर खुसरो – तुग़लक़ नामा और
  • याहिया-बिन-अहमद सरहिंदी– तारीखे-मुबारक शाही

मुहम्मद तुग़लक़ का प्रारम्भिक जीवन

जूना खां { मुहम्मद तुग़लक़ } अपने पिता गयासुद्दीन तुग़लक़ का सबसे बड़ा पुत्र था, उसकी माता का नाम बेगम नूर जहां था। उसका जन्म 1290 में मुल्तान के कोटला में हुआ था। वह तीव्र बुद्धि का था। खुसरो शाह ने उसे ‘तुरंगों का स्वामी‘ नियुक्त किया था। मगर मुहम्मद तुग़लक़ ने अपने स्वामी को उखाड़ फेंकने में अपने पिता की मदद की। 1320 मुहम्मद तुग़लक़ ने नए वंश की नीव रखी और मुहम्मद तुग़लक़ को ‘उलघ खां’ की उपाधि देकर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। 1325 में अपने पिता के बाद वह दिल्ली की गद्दी पर बैठा। मुहम्मद बिन तुगलक को संस्कृत, फारसी, अरबी और तुर्की समेत कई भाषाओं की अच्छी जानकारी थी।

विवरणजानकारी
नाममुहम्मद बिन तुगलक
वास्तविक नाम‘उलूग ख़ाँ’
उपनाम‘जूना ख़ाँ’
जन्म1290
जन्मस्थानमुल्तान के कोटला, पाकिस्तान
पिताग़यासुद्दीन तुग़लक
माताज्ञात नहीं
पूर्ववर्तीगयासुद्दीन तुग़लक़
उत्तरवर्तीफीरोज तुग़लक़
राजवंशतुगलक वंश
पददिल्ली का सुल्तान
धर्मइसलाम
शासनकाल1325-1351
मृत्यु20 मार्च 1351
मृत्यु का स्थानथट्टा, सिंध
शासक का नामकाल
गयासुद्दीन तुगलक- Ghiyasuddin Tughlaq1320-24 ईस्वी
मोहम्मद तुगलक Muhammad Tughlaq1324-51 ईस्वी
फिरोज शाह तुगलक Firuz Shah Tughlaq1351-88 ईस्वी
मोहम्मद खान Muhammad Khan1388 ईस्वी
गयासुद्दीन तुगलक शाह II Ghiyasuddin Tughlaq II1388 ईस्वी
अबू बाकर Abu Bakr1389-90 ईस्वी
नसीरुद्दीन मोहम्मद Nasiruddin Muhammad1390-94 ईस्वी
हूंमायू Humayun1394-95 ईस्वी
नसीरुद्दीन महमूद Nasiruddin Mahmud1395-1412 ईस्वी

मुहम्मद तुग़लक़ की योजनाएं

मुहम्मद तुग़लक़ ने अपनी गृहनीति के तहत साम्राज्य के विकास हेतु निम्न योजनाओं को लागू किया।

दोआब में कर बृद्धि 1325 ईस्वी

अपनी प्रथम योजना के तहत गंगा-यमुना के बीच के दोआब में 10 से 20 गुना तक बढ़ा दिया। तारीखे-ए-मुबारक शाही के अनुसार कर 20 गुना तक बढ़ाया गया जिसमें गढ़ी या मकान कर, चराही कर भी जुड़े थे। बदायूनी ने करों की वृद्धि को दोगुना बताया है। पर यह योजना उस समय लागू की गई जब दोआब में वर्षा की कमी के कारण दुर्भिक्ष चल रहा था। सुल्तान के कर्मचारियों ने कठोरता से बढ़ी दर पर किसानों से कर बसूला। परिणामस्वरूप किसान गांव छोड़कर भागने लगे, कृषि ख़त्म हो गई। सुल्तान को जब तक यह खबर मिली और योजना को बापस लिया गया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अतः कर वृद्धि की योजना असफल रही।

कृषि विभाग की स्थापना

कर वृद्धि से उपजे संकट और विद्रोह को शांत करने के लिए मुहम्मद तुग़लक़ ने एक कृषि विभाग ‘दीवान-ए-कोही’ की स्थापना की। 2 वर्ष तक 60 वर्गमील भूमि पर हेर-फेर कर फसलें उगाई गईं और 70 लाख रुपया व्यय किया गया। मगर यह योजना असफल रही क्योंकि भूमि अनुपजाऊ निकली तथा अधिकारीयों ने भी घोटाला किया।

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राजधानी परिवर्तन- 1327 ईस्वी-

सामरिक महत्व और केंद्रीय स्थिति को देखते हुए 1327 ईस्वी में मुहम्मद तुग़लक़ ने दौलताबाद को दिल्ली के स्थान पर राजधानी बनाने का निर्णय लिया। दौलताबाद तक सड़क बनवाई गई और दोनों ओर वृक्ष लगवाए गए। लोगों को जबरन दौलताबाद ले जाया गया। दिल्ली वीरान हो गई। जाते समय भी बहुत से लोगों की मृत्यु हो गई।

दौलताबाद पहुंचकर लोग वह की गर्म जलवायु सहन न कर सके और मृत्यु के मुंह में जाने लगे। सुल्तान को अपनी गलती का एहसास हुआ और 1335 ई. में दौलताबाद से लोगों को वापस दिल्ली चलने का फरमान सुनाया । राजधानी परिवर्तन के प्रयोग ने दक्षिण भारत में मुस्लिम धर्म और संस्कृति का विकास हुआ, जिसने अंततः बहमनी साम्राज्य के उदय का मार्ग प्रशस्त किया। लेन-पूल के अनुसार “दौलताबाद एक पथभ्रष्ट शक्ति का स्मारक था।”

सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन 1329-30 ईस्वी –

एडवर्ड थॉमस ने मुहम्मद तुग़लक़ को “धनवानों का राजकुमार” कहा है। एक सोने का सिक्का जिसका भार 200 दानों के बजन बराबर था, जिसे इब्न बतूता ने दीनार बताया है उसे मुहम्मद तुग़लक़ ने निर्गमित कर दिया। उसने 175 दानों के तुल्य बजन के सोने व चांदी के पुराने सिक्कों की जगह असली सिक्कों के पुनः शुरू कर दिया जिसका भार 140 चाँदी दानों के बराबर था। इस परिवर्तन का कारण था “चाँदी की अपेक्षा सोने का सापेक्ष महत्व नीचे आ गया था, और दक्षिण के अभियानों के कारण साम्राज्य का कोष पुरनी धातु के सिक्कों से बड़ी संख्या में भरा हुआ था।

सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन 1329-30 ईस्वी

1329 और 1330 ईस्वी में सुल्तान ने सांकेतिक मुद्रा जारी की। इस प्रकार की मुद्रा का चलन चीन और फारस मेंब पहले से ही था।

“तेरहवी शताब्दी के अंत में चीन के शासक कुबलाई खां ने चीन में कागजी मुद्रा शुरू की।” फारस के शासक गाई खाटू ने 1294 में ऐसा ही प्रयोग किया।

मुहम्मद तुग़लक़ ने आदेश दिया कि सोने और चाँदी के सिक्कों के समान तांबे के सिक्के भी कानूनी रूप से मान्य होंगे।

बरनी के अनुसार “इस आदेश ने प्रत्येक हिन्दू के घर में टकसाल लगा दी।”

लोगों करोड़ों के संख्या में तांबे के सिक्के बना डाले। इनका मूल्य पत्थर और मिटटी के समान हो गया। सोने का टंका तांबे के 100 टंकों के मूल्य के बराबर था। प्रत्यके सुनार तांबे के सिक्के ढालने लगा। व्यापार जब वाधित हुआ तो सुल्तान ने तांबे के सिक्कों को चांदी के सिक्कों से बदलने का आदेश दिया। दिल्ली के तुग़लकाबाद में सिक्कों के पहाड़ बन गये।

  • मुहम्मद तुग़लक़ एक उदार शासक था उसने उलेमाओं के आदेश मानने से इंकार कर दिया।
  • सती प्रथा को रोकने का प्रयास किया।
  • राजपूत रियासतों में हस्क्षेप नहीं किया।

मोहम्मद बिन तुगलक की मृत्यु कब और कहां हुई थी?

तगी ने सिन्ध में शरण ली थी और मुहम्मद तुग़लक ने उसके विरुद्ध बढ़ने का निश्चय किया था। परन्तु मार्ग में सुल्तान बीमार पड़ गया और इसलिए गोंडल पर कुछ समय के लिए रुकने पर विवश हो गया। कुछ दशा सुधरने पर वह सिन्ध में थट्टा की ओर बढ़ा। उस स्थान से ३ या ४ दिन तक बढ़ते ही उसकी दशा गम्भीर हो गई और २० मार्च १३५१ को उसका देहान्त हो गया। बदायूनी इस प्रकार कहता है : “और इस प्रकार राजा को अपनी जनता से व जनता को अपने राजा से मुक्ति मिल गई।”

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मुहम्मद तुग़लक़ की विदेश नीति (Foreign Policy) –

(१) मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल में दिल्ली सल्तनत संकटों से ही घिरी रही। १३२८-२९ में तरमाशीरी खाँ (Taramashirin Khan), जो ट्रांसोक्सियाना का चुगताई सरदार था, ने भारत पर आक्रमण किया । उसने मुल्तान और लाहौर से लेकर दिल्ली के बाहरी भाग तक छापा मारा।

ऐसा पता चलता है कि दिल्ली से दौलताबाद के लिए राजधानी का स्थानांतरण और मुहम्मद तुगलक द्वारा उत्तरी सीमाओं की रक्षा के प्रति उदा- सीनता ने मंगोलों को भारत पर आक्रमण करने की प्रेरणा दी।

इन बहरी आक्रमणों के उदय के विषय में लेखकों के बीच मतभेद है। याहिया-बिन-अहमद व बदायूनी यह बताते है कि मुहम्मद तुगलक ने मंगोलों को हराया और उन्हें देश के बाहर निकाल दिया । परन्तु फरिश्ता का मत है कि मुहम्मद तुगलक ने श्राक्रमणकारियों को रिश्वत देकर लौट जाने योग्य बना दिया । आक्रमणकारियों को सुल्तान द्वारा दिये गए सोने व रत्नों को “राज्य का मूल्य” समझा गया है। चाहे कुछ भी सच हो, “आक्रमण केवल एक छापे की तरह था और तरमाशीरीं अचानक ऐसे अदृश्य हो गया जैसे आया था।”

(२) खुरासान व ईराक विजय की योजना – मुहम्मद तुगलक का विचार विश्व विजय का था। उसने खुरासान व ईराक जीतने का निश्चय किया और इस काम के लिए एक बड़ी सेना का संगठन भी किया। ऐसा करने में उसे उन खुरासानी कुलीनों से प्रेरणा मिली थी जिन्होंने उसके दरबार में शरण ली। इसमें उनके अपने निजी स्वार्थ भी थे।

जियाउद्दीन बरनी हमें बताता है कि लगभग ३,७०,००० मनुष्य दीवाने-अर्ज या भर्ती कार्यालय में प्रविष्ट किए गए थे। पूरे एक वर्ष तक उनको इसका वेतन दिया गया था। यह इन्कार नहीं किया जा सकता कि खुरासान में अबू सईद के बदनाम शासन के कारण अव्यवस्था थी और मुहम्मद तुगलक निश्चय ही उसका लाभ उठा सकता था। परन्तु यह भूला नहीं जा सकता कि मुहम्मद तुगलक की स्थिति स्वयं भारत में स्थायी नहीं थी और इसलिए विदेशी भूमि को जीतने का विचार तक उसके लिए एक मूर्ख कार्य था।

इसके अतिरिक्त उसने यातायात की समस्या पर कोई ध्यान नहीं दिया । भौगोलिक कठिनाइयों के प्रति भी उदासीनता बरती गई। यह बात पूर्णतया भुला दी गई कि हिमालय व हिन्दूकुश के पहाड़ी भागों से होकर ऐसी विशाल सेना का निकालना भी एक कठिन कार्य था और उस सेना का भोजन व ऐसे दूर के देश में जीवन की अन्य आवश्यकताओं का प्रबन्ध करना भी कोई सरल काय नही था।

इसके अतिरिक्त भारत के मुस्लिम सैनिक मध्य एशिया के कठोर योद्धाओं के सामने कोई जोड़ नहीं हो सकते थे। मुहम्मद तुगलक मिस्र के सुल्तान तरमाशीरी खाँ की सहायता पर निर्भर नहीं रह सकता था। मुहम्मद तुग़लक़ को सहायता देने की अपेक्षा उसके कुछ अपने भी स्वार्थ थे।

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यह ठीक कहा गया है कि प्रत्येक दृष्टिकोण से यह योजना पूर्ण रूप से अदूरदर्शितापूर्ण थी और इसमें कोई श्राश्चर्य नहीं कि उसे यह त्यागनी पड़े। जियाउद्दीन बरनी यह विचार प्रकट करता है कि “वे देश प्राप्त न किए जा सके जिनका मोह था…… और उसका कोष जो राजनैतिक शक्ति का सच्चा स्रोत था व्यय कर दिया गया।”

(३) नगरकोट अभियान- नगरकोट का किला पंजाब में कांगड़ा जिले में एक पहाड़ी पर स्थित था। इसने महमूद गजनी के समय से प्रत्येक तुर्की सेना को परास्त किया था। यह अलाउद्दीन खलजी के शासन काल में जीतने से रह गया था। १३३७ में मुहम्मद तुगलक ने नगरकोट के विरुद्ध श्राक्रमण की तैयारी की। हिन्दू राजा ने विरोध किया परन्तु हार गया । सुल्तान ने उसे दुर्ग वापस कर दिया ।

(४) फरिश्ता की अध्यक्षता में अनुसरण करते हुए भारतीय इतिहास के बहुत से लेखकों ने यह गलत विचार दिया है कि मुहम्मद तुगलक ने चीन के विरुद्ध आक्रमण-सेना भेजी। परन्तु जियाउद्दीन बरनी तथा इब्न बतूता द्वारा यह स्पष्ट रूप से बताया जाता है कि मुहम्मद तुगलक ने कराजल का पहाड़ जीतने का इरादा किया जो भारत व चीन के प्रदेशों के बीच स्थित है।

इब्न बतूता हमें बताता है कि कराजल पहाड़ दिल्ली से १० मील दूरी पर स्थित था। ऐसा पता चलता है कि अभियान कमायूं गढ़वाल क्षेत्र के कुछ पहाड़ी लोगों को दिल्ली सल्तनत के आधिपत्य में लाने के लिए किया गया था। इस काम के लिए १३३७-३८ में एक बड़ी सेना भेजी गई थी ।

प्रथम आक्रमण सफल रहा, परन्तु जब वर्षा ऋतु आई तो आक्रमणकारियों को बड़ी कठिनाई उठानी पड़ी। सेना का सारा सामान पहाड़ियों ने लूट लिया । जिया-उद्दीन बरनी के अनुसार १० घुड़सवार ही संहार की कथा सुनाने वापस लौटे।

परंतु इब्न बतूता के अनुसार यह संख्या ३ थी। इस असफलता के होते हुए भी, अभियान का उद्देश्य पूरा हो गया। पहाड़ी लोगों ने विरोध की मूर्खता का आभास कर लिया और सुल्तान को सम्मान देने के विचार से सहमत होते हुए अच्छे सम्बन्ध बना लिए ।

(५) बंगाल दिल्ली सल्तनत के प्रति कमी वफादार नहीं रहा था। फखरुद्दीन (Fakhar-ud-Din), बहराम खाँ के लौहकोट-घारक और पूर्वी बंगाल के शासक, ने अपने स्वामी का वध कर दिया और १३३६-३७ में उसका प्रदेश छीन लिया। लखनौती का शासक कदर खाँ (Qadr Khan) उसके विरुद्ध बढ़ा और स्वयं मारा गया ।

फखरुद्दीन ने मुहम्मद तुगलक की कठिनाइयों से लाभ उठाया और अपने को बंगाल का स्वतन्त्र शासक घोषित कर दिया। उसने अपने नाम के सिक्के तक निकलवा दिए। लवा दिए । भोज्य पदार्थों व जीवन की अन्य आवश्यकताओं का मूल्य इतना कम था कि फारस के लोग बंगाल को “सब अच्छी वस्तुओं से भरा हुआा नरक” कहते थे ।

(६) ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी (An-ul-Mulk Multani) अवध का शासक था। वह एक वफ़दार अधिकारी, एक महान् सैनिक व एक सुशिक्षित विद्वान् था । वह कारा के निजाम मईन के विद्रोह को दबाने के लिए उत्तरदायी था।

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जब अवध में अकाल पड़ा उसने दानों के मूल्य के ७० से ८० लाख तक के टंके भेजे। इन सेवाओं के होते हुए भी १३४०-४१ में उसे दौलताबाद जाकर वहाँ के उपद्रव दबाने का आदेश दिया गया।

ऐन-उल-मुल्क से यह सोचा कि ऐसे कार्य का आशय अवध में उसके सम्मान का पतन तथा कूटनीतिक यातायात द्वारा उसकी शक्ति का घटाना है। उसने सुल्तान से यह प्रार्थना की कि उसे दक्षिण न भेजा जावे, परन्तु जब सुल्तान ने आग्रह बनाए रक्खा तो उसने उपद्रव मचा दिया। वह पराजित हुआ और बन्दी बना लिया गया। उसे पद से निष्कासित कर दिया गया और बहुत अपमान के साथ उसे रक्खा गया।

चूंकि सुल्तान यह जानता था कि ऐन-उल-मुल्क एक कमजोर दिल वाला बिद्रोही था, अतः उसे मुक्त कर दिया गया और उसे दिल्ली के राजसी उद्यानों का संरक्षक नियुक्त कर दिया गया ।

(७) राज्य के अस्थायित्व से लाभ उठाते हुए सिंध में लूटमारी ने बोलबाला पैदा कर लिया । मुहम्मद तुगलक स्वयं अपनी सेना के साथ वहाँ पहुंचा। लुटेरे तितर-बितर हो गए और उनके नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और इस्लाम धर्म स्वीकार करने पर बाध्य किया गया ।

(८) १३३६ में एक उत्साही हिन्दू नेता हरिहर ने विजयनगर के हिन्दू राज्य की स्थापना की। उसने कृष्णा नायक, प्रतापरुद्र काकतीय के पुत्र की सहायता भी की जबकि उसने १३४३-४४ में मुहम्मद तुग़लक के विरुद्ध विद्रोह किया ।

बल्लाल द्वितीय ने वारंगल पर अधिकार जमा लिया और उसका मुस्लिम शासक इमाद-उल- मुल्क दौलताबाद भाग गया। फरिश्ता के अनुसार, बल्लाल देव व कृष्णा नायक दोनों ‘ने अपनी सेनाए मिला लीं और माबर व द्वार-समुद्र को मुस्लिम नियन्त्रण से मुक्त कराया। सब दिशाओं में युद्ध व विद्रोह की लपटें भड़क उठीं और दूर के प्रदेशों में सुल्तान के पास सिवाय गुजरात व देवगिरि के कुछ न बचा ।”

(६) कुतलग खाँ (Qutlugh Khan) दौलताबाद का प्रान्ताध्यक्ष था। उसके आधीन अधिकारियों ने बहुत सा सार्वजनिक घन गबन कर लिया था और इसलिए मुहम्मद तुगलक ने ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी को दौलताबाद भेजने का निश्चय किया ।

ऐन -उल-मुल्क के विद्रोह के बाद भी यह काम न हो सका। इसके होते हुए भी, कुतलग खाँ दौलताबाद से वापस बुला लिया गया और अलीम-उद्दीन-उल मुल्क को दौलताबाद का प्रान्ताध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। फिर भी स्थिति में सुधार न हो सका । फरिश्ता के अनुसार, “कुतलग खाँ के हटने पर लोग अप्रसन्न हो गए और नए शासन प्रबन्ध द्वारा प्रदर्शित असामर्थ्य भाव ने सब ओर विद्रोहों को जन्म दिया । परिणाम यह हुआ कि देश निर्जन व नष्ट हो गया।”

(१०) अजीज खुम्मर (Aziz Khummar) मुहम्मद तुगलक द्वारा मालवा व घार का शासक नियुक्त किया गया था। उसका व्यवहार कुलीन सरदारों के प्रति आपत्तिजनक था और इसलिए उन्होंने विद्रोह कर दिया। शासक ने ऐसे ८० सरदार पकड़वा लिये और दूसरों को आतंक में लाने के लिए उन्हें अपने महल के सामने कत्ल करा दिया । यह बहत ज्यादा अत्याचार था और इसलिए हर जगह संकट उठ खड़ा हुआ। अजीज खुम्मर पकड़ लिया गया और उसकी अपमानजनक मृत्यु की गई।

(११) सुल्तान अपनी शक्ति का उल्लंघन सहन न कर सका और फलस्वरूप वह एक सेना के साथ गुजरात की ओर बढ़ा और अपने हाथ आने वाली प्रत्येक वस्तु का उसने संहार कर दिया। उसी समय उसे देवगिरि में विद्रोह का समाचार मिला और इसलिए उसने देवगिरि की ओर प्रस्थान किया। वहाँ हिन्दुओं, अफगानों व तुर्कों ने मिलकर सुल्तान के विरुद्ध सिर उठाया था, परन्तु सुलतान ने विद्रोहियों से दौलताबाद वापस ले लिया।

जब वह दौलताबाद में था, मुहम्मद तुग़लक को गुजरात में एक दूसरे विद्रोह का समाचार मिला। वहाँ विद्रोह का नेता सरदार तगी (Taghi) था जो कि एक साधारण जूता बनाने वाला तथा मुस्लिम कुलीनों का एक दास था। वह समस्त असंतुष्ट तत्त्वों को अपने आधीन लाने में सफल रहा।

उसने सफलता के साथ नहवाला, कैम्बे व भड़ोच के स्थानों को लूट लिया और उन्हें अपने अधिकार में कर लिया। फिर भी मुहम्मद तुगलक तगी को गुजरात से भगाने तथा उसे सिन्ध में शरण लेने योग्य बनाने में सफल रहा। गुजरात का वातावरण शान्त हो गया ।

(१२) जब मुहम्मद तुगलक गुजरात में था, तो विदेशी अमीरों ने अपनी स्थिति पुनः प्राप्त करने की प्रभावशाली योजनाएँ बनाईं और उन्होंने देवगिरि का किला घेर लिया । उस पर पुनः प्रभाव जमाने के लिए साम्राज्यवादियों की सारी योजनाएँ असफल रहीं।

हसन गंगू ने इमाद-उल-मुल्क को हरा दिया और विद्रोहियों ने दौलतताबाद पर कब्जा कर लिया। इस्माईल मुल्क, जिसे विद्रोहियों ने अपना राजा चुन लिया था, ने “ऐच्छिक एवं प्रसन्न रूप से” हसन गंगू के पक्ष में त्यागपत्र दे दिया । अगस्त १३४७ में हसन ने अलाउद्दीन बहह्मन शाह की उपाधि ग्रहण कर ली और बहमनी राज्य की नींव डाली ।

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मुहम्मद तुग़लक़ की असफलता के कारण

डा० ईश्वरीप्रसाद के अनुसार, “उन अमीरों की ओर जो उसके डेरे में भीड़ लगाए रहते थे, वह अपनी डगमगाती हुई शक्ति को रोकने के लिए सहायता के हेतु देखता था, किन्तु वे सब बिना किसी योजना या नीति के अल्पबुद्धि वाले थे और उसे केवल बहुत थोड़ी सी सहायता दे सकते थे।

जिस वस्तु ने उसे गम्भीरता के साथ रोका वह चीज उन योग्य शासकों व अधिकारियों की कमी थी जो उसकी योजनाओं को लागू कर सकते । मुख्य स्थान पर मनुष्य की अकुशला के तत्त्व को इस सीमा तक महत्वष्ट प्रदान किया कि गड़बड़ वाले क्षेत्रों में व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुल्तान की उपस्थिति आवश्यक हो गई ।

निरन्तर विरोध व कुप्रबन्धों से प्रभावित स्थानीय शासन प्रबन्ध उन विद्रोहियों के सामने न ठहर सके जिनकी शक्ति रोज बढ़ रही थी। प्रशान्ति की शक्तियों पर प्रतिबन्ध लगाने में गुजरात या देवगिरि कहीं का भी स्थानीय शासन प्रबन्ध कोई उत्साह न दिखा सका।

केवल सुल्तान ही को आक्रमणों की मुख्य चोट का मुकाबला करना पड़ा। राजसी सेना भी कोई विशेष कुशलता न दिखा सकी। शायद सुल्तान की असाधारण कठोर- ताओं ने उसका सन्तोष समाप्त कर दिया था और उसका उत्साह ठंडा कर दिया था ।” (Qaraunah Turks, p. 247)

मुहम्मद तुगलक का चरित्र व मूल्यांकन (Character and Estimate)-

मुहम्मद तुग़लक के चरित्र व सफलताओं के विषय में बहुत विवाद है।

एल्फिसटन का यह मत है कि मुहम्मद तुगलक पर थोड़ा बहुत पागलपन का प्रभाव था। कुछ लेखक जैसे हेवल, एडवर्ड टामस और स्मिथ उसी के इस विचार का अनुसरण करते हैं ।

गार्डिनर ब्राउन (Gardiner Brown) ने मुहम्मद तुगलक के जीवन के बुरे पहलू को बिल्कुल छोड़ दिया है और उसे ‘पागल’, ‘खून का प्यासा’ या ‘स्वप्न देखने वाला’ होने से मुक्त किया है।

जियाउद्दीन बरनी व इब्न बतूता मुहम्मद तुगलक के व्यक्तित्व में गुणों व दोषों के विषय में विपरीत मत रखते हैं। यह विवाद हमेशा से ऐसा ही जीवित रहा है।

मुहम्मद तुगलक अपने समय के योग्य एवं होनहार विद्वानों में से एक था और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि उसके समकालीन लोगों ने उसकी प्रशंसा की है।

वह एक तीक्ष्ण बुद्धि व आश्चर्यजनक स्मरण शक्ति रखता था। वह तर्कशास्त्र, दर्शन- शास्त्र, गणितशास्त्र, ज्योतिष व भौतिक विज्ञान जानता था। वह रचना व शैली का पूर्ण स्वामी था। वह एक योग्य व सुन्दर लेखक था।

उसे फारसी कविता का बहुत अच्छा ज्ञान था और अपने पत्रों में फारसी कविताओं के कुछ भाग लिखने में उसे बड़ा आनन्द आता था ।

उसे औषधियों का ज्ञान था और वह वाद-विवादों में बहुत कुशल था । उपमाओं व अलंकारों के प्रयोग में वह बहुत दक्ष था। जियाउद्दीन बरनी उसे एक योग्य विद्वान बताता है और सृष्टि का ऐसा महान् आश्चर्य समझता है जिसकी योग्यताएँ अरस्तु व आसफ जैसे मनुष्य को आश्चर्य में डाल सकती थीं।

वह उदार स्वभाव का था। वह उन सब को बहुत उपहार देता था जो हर समय उसके द्वारों पर भीड़ लगाए रहते थे। उसकी आदतें साधारण थीं। वह अपने समय की प्रचलित बुराइयों से मुक्त था । इब्न बतूता ने उसे “सबसे ज्यादा नम्र व ऐसा मनुष्य जो सदा ठीक व सच्चा काम करने के लिए तत्पर व उत्सुक रहने वाला था’ बताया है।

बरनी, याहिया-बिन-अहमद सरहिन्दी, बदायूनी, निजामुद्दीन अहमद व फरिश्ता ने यह गलत बताया है कि मुहम्मद तुगलक एक धार्मिक व्यक्ति न था और वह पवित्र तथा योग्य मनुष्यों के हत्याकांड के लिए उत्तरदायी भी था ।

इब्न बतूता प्रत्यक्षतः यह स्वीकार करता है कि “वह (मुहम्मद तुगलक) निष्ठा के साथ धार्मिक सिद्धांत का अनुसरण करता है। स्वयं प्रार्थनाएँ करता है और उन मनुष्यों को दण्ड देता है जो पूजा से उदासीन रहते हैं।

दो अन्य समकालीन लेखक शहाबुद्दीन अहमद और उन बदरे छाछ भी इब्न बतूता के मत की पुष्टि करते हैं। यह पता चलता है कि मुहम्मद तुगलक की एकमात्र गलती यह थी कि “उसने उस परम्परागत नियम” के प्रति उदासीनता की जिसकी व्याख्या काजी व अन्य मुस्लिम उलेमा करते थे और उसने बही किया जिसे स्वयं ठीक न्यायसंगत समझा ।

मुहम्मद तुगलक की कल्पना शक्ति बहुत तीव्र थी किन्तु उसके पास व्यावहारिक न्याय व सामान्य बुद्धि का अभाव था। वह तेज काम करने वाला व गरम स्वभाव का था। वह किसी ओर से विरोध सहन नहीं कर सकता था और उन सब को दण्ड देने के लिए तैयार रहता था जो उसकी भाज्ञा का उल्लंघन करने या उससे असहमत होने का साहस करते थे।

जियाउद्दीन बरनी के अनुसार, “उसने जो कुछ सोचा, उसने अच्छा सोचा, परन्तु अपनी योजना को लागू करने में उसने प्रदेशों तक को खो दिया, अपनी जनता को असन्तुष्ट कर दिया और अपना कोष खाली कर दिया। विस्मय के बाद विस्मय आया और इसलिए गड़बड़ चरम सीमा पर पहुंच गई। लोगों की कुभावनाओं ने विद्रोह के फूटने को जन्म दिया।

शाही योजनाओं को लागू करने में नियम दिन प्रति दिन अधिक शोषणात्मक होने लगे। बहुत दूर के देशों व प्रान्तों के कर जाते रहे और बहुत से सैनिक व नौकर तितर-बितर हो गए तथा दूर के स्थानों में छोड़ दिए गए।

कोष में अभाव दिखाई देने लगा। सुल्तान के मस्तिष्क का संतुलन खत्म हो गया । अपने स्वभाव की चरम दुर्बलता व कठोरता में आकर उसने अपने को अत्याचार के प्रति समर्पित कर दिया। जब उसने देखा कि उसके आदेश ठीक नहीं चल रहे हैं, जैसा कि वह चाहता था, तो वह अपनी जनता के प्रति और भी अधिक रुष्ट हो गया।”

मुहम्मद तुगलक ने बरनी से कहा, “मेरा राज्य रोगी है और कोई भी औषधि उसे ठीक नहीं करती। वैद्य सिर का दर्द ठीक करता है परन्तु ज्वर आ जाता है; वह ज्वर दूर करने की चेष्टा करता है तो कुछ अन्य रोग निकल पड़ता है। इसलिए मेरे राज्य में अशान्ति फूट पड़ी है; यदि में एक स्थान पर उसे दबाता हूँ वह दूसरे स्थान पर उठ जाती है; यदि में फिर, उसे एक जिले में रोकता हूँ, तो दूसरे जिले में गड़बड़ हो जाती है।

फिर मैं सन्देह या कल्पना पर उनके विद्रोहात्मक व प्रपंचात्मक कार्यों के विरुद्ध दण्ड देने के लिए आगे बढ़ता हूँ और में छोटे-छोटे अपराध तक पर मृत्यु दण्ड देता हूँ। यह में तब तक करूगा जब तक जीवित रहूँगा या जब तक लोग ईमानदारी से काम नहीं करते या विद्रोह व आज्ञोल्लंघन नहीं छोड़ देते।

मेरे पास ऐसा कोई वजीर नहीं है जो मेरे निकलते हुए रक्त को दिखाने के लिए नियम बनावेगा । में मनष्यों को दण्ड देता हूँ क्योंकि वे मेरे बिल्कुल विरोधी व शत्रु बन बैठे हैं। मैंने उनके बीच बड़ा धन वितरित किया है, किन्तु वे फिर भी कर्तव्य परायण व भित्र न हो सके ।” फिर विद्रोहों के लिए मेरा उपाय तलवार है। में दण्ड देता हूँ व तलवार का प्रयोग करता हूँ जिससे कष्टों द्वारा सुधार हो सके । जितना अधिक लोग विरोध करते हैं; उतना ही अधिक में दण्ड देता हूँ।”

मुहम्मद तुगलक को “विपरीतताओं का मिश्रण” (a mixture of opposites) बताया गया है। यदि उसके अपने गुण थे, तो कुछ दोष भी थे। जहाँ वह उदार, दयालु व नम्र था वहीं बहुत क्रूर भी था। जहाँ वह अपने पास आने वाले सब लोगों को उपहार देटा था, वहाँ बहुतों की मृत्यु के लिए उत्तरदायी भी था।

सुल्तान का स्वभाव ऐसा था कि कोई विश्वास के साथ यह नहीं कह सकता था कि उसे क्या मिलेगा । यह संभव था कि उसे दान के रूप में कुछ मिल जाये। यह भी उतना ही सम्भव था कि उसको फाँसी मिल जावे । वह लोगों की भावनाओं की चिन्ता नहीं करता था । उसके पास मस्तिष्क का सन्तुलन या सन्तोष नहीं था ।

मुहम्मद तुगलक को विपरीतताओं का विचित्र मिश्रण (an amazing compound of contradictions) मी कहा गया है।

डा० ईश्वरी प्रसाद का मत है कि उस पर खून का प्यासा व पागल होने के दोष अधिकतर निराधार हैं। किसी भी समकालीन लेखक ने ऐसा कोई विवरण नहीं दिया है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि मुहम्मद तुगलक विक्षिप्त या पागल था।

यह सम्भव है कि ऐल्फिस्टन व अन्य यूरोपीय लेखक इब्न बतूता के इस विवरण को गलत समझ बैठे कि कुछ मृतक शरीर सुल्तान के महल के बाहर सदा पड़े रहते थे। यदि वह छोटे से अपराध पर मृत्यु दण्ड का आदेश देता था तो इसका कारण यह था कि उसे अनुपात का कोई ज्ञान नहीं था और इसलिए भी कि उस समय योरुप व एशिया में ऐसा रिवाज प्रच- लित था।

धार्मिक वर्ग के सदस्यों ही ने उस पर खून का प्यासा होने का दोष लगाया है। बरनी मी सुल्तान की इस बुद्धि की निन्दा करता है। वह उसकी दार्शनिक कल्पनाओं की बहुत तीव्र भाषा में आलोचना करता है।

ऐसी कोई वस्तु देखने में नहीं आती कि सुल्तान को मनुष्य जाति के संहार करने या संगठित मनुष्यों का शिकार करने में आनन्द आता था। डा० ईश्वरी प्रसाद के अनुसार—-

“सत्य यह है कि तुल्तान ने अपने कमजोर स्वभाव व प्रशासकीय सुधारों के पूर्वगामी आदर्शों का मिश्रण कर दिया, और जब लोगों ने उसकी इच्छाओं के अनुसार कार्य करने में असमर्थता प्रकट की, तो उसका क्रोध भयानक हो गया। उसका असन्तोष लोक-उदासीनता का फल था, जिस प्रकार लोक उदासीनता उसकी विस्मयात्मक नवीनताओं का परिणाम थी।” (Medieval India, p. 272) ।

गाडिनर ब्राउन के अनुसार, “वह पागल था, यह ऐसा विचार है कि जिसका समकालीन लोग कोई संकेत नहीं देते हैं। यह कि वह एक स्वप्न-दर्शक था तो उसका बहुरूपी व्यावहारिक व तेजपूर्ण चरित्र हमें ऐसा विश्वास करने से रोकता है। उसे एक निरंकुश शासक मानना सच हो सकता है, परन्तु मध्य युग में और किसी प्रकार तुगलक वंश का शासन कल्पना-योग्य भी नहीं था।

इस शब्द का इस प्रकार प्रयोग करना जैसे कि वह किसी बीमारी या बुराई का नाम है तो उसका आशय उस तत्त्व को भूल जाना है कि एक निरंकुश राजकुमार जो नए विचारों तक पहुंच सकता है या जो सुधार के उपाय करता है, वह ऐसे युग में अपने मनुष्यों की समृद्धि के लिए बहुत कुछ कर सकता है जबकि शिक्षा की इतनी कम प्रगति हुई हो और रूढ़िवाद इतना गहरा हो।

ऐसे शासक को फिर भी, अपने समय में मुकाबला करने के लिए गम्भीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है: स्वार्थी हितों की अनिवार्य उथल-पुथल, स्थापित परम्परा के लिए सहज लगाव उसके लिए अगणित शत्रुओं की उत्पत्ति करते हैं। अलोक- प्रिय सुधारों को लागू करने वाले अधिकारी स्वामी के आदेशों का बहाना कर अपनी जान बचा लेते हैं।

यदि उसकी योजनाओं पर बिना वजह आपत्ति आ पड़े, या बुरे व अकुशल अधिकारी अपने स्वार्थों के लिए भ्रष्ट हो जाएँ, तो वह सब इस कारण है कि वह एक निरंकुश शासक है और इसलिए उसे यह दोष अपने जिम्मे लेना चाहिए। यदि वह एक योद्धा रहा है और मृत्यु उसका बरण करती है जबकि वह थट्टा की दीवारों के नीचे मुहम्मद बिन तुगलक की माँति किसी छोटे से संग्राम में फंसा हुआ है, तो स्वर्ग का निर्णय उस लोकप्रिय निर्णय की पुष्टि करता हुआ मालूम होता है और साहित्य यह कहता है :-

उसने ऐसा नाम छोड़ा जिस पर विश्व पीला पड़ गया,
एक शिक्षा देने या कहानी सजाने के वास्ते ।

लेन-पूल के अनुसार, “मुहम्मद तुगलक मध्य युग का सब से अधिक विलक्षण जीव था । वह ऐसा मनुष्य था जिसके विचार अपने समय से बहुत आगे थे । अपने शासन की समस्याओं का भार उठाने के लिए अलाउद्दीन के पास एक तेजस्वी किन्तु बन्द मस्तिष्क था; मुहम्मद तुगलक अपनी योजनाओं में अधिक साहसी था, परन्तु वे विचार एक प्रशिक्षित बुद्धि तथा शिक्षित कल्पना वाले मनुष्य के आदर्श थे।

वह अपने समय की मान्यताओं में पूर्ण, फारसी कविता का योग्य विद्यार्थी, भारतीय शिक्षा की लातीनी शैली का उस्ताद; अलंकार के युग में सर्वश्रेष्ठ रूप से अभिभावक, यूनानी तर्कशास्त्र व वेदान्तशास्त्र में प्रशिक्षण-प्राप्त था जिससे विद्वान् विवाद करते डरते थे।

वह गणित तथा विज्ञान का प्रेमी था। समकालीन लेखक उसकी रचना तथा विचित्र सुन्दर-लिपि की अगाध प्रशंसा करते हैं। उसकी सुन्दर मुद्रा यह प्रमाणित करती है कि अरब के चरित्र को अपनाने की कला में उसका समालोचनात्मक चाव था, जिसे वह पढ़ता व समझता था हालांकि वह भाषा को तेजी के साथ बोल सकता था।”

“संक्षेप में, वह उस सब में सम्पूर्ण था जो उस युग व उस देश में संस्कृति द्वारा प्राप्त हो सकता था, और उसने अपने प्रशिक्षण की सफाई में मौलिक विचार का एक प्राकृतिक ज्ञान, एक आश्चर्यजनक स्मरण शक्ति और एक अडिग इच्छा का योग कर दिया ।

उसका केन्द्रीय राजधानी का विचार, उसकी सांकेतिक सिक्के की योजना, उसकी अन्य बहुत सी योजनाओं की माँति अच्छी थी। परन्तु उसने अपनी नवीनताओं के लिए देशी नापसन्दी पर कोई ध्यान नहीं दिया ।

उसने बिना सन्तोष के अपने नए उपायों को लागू करने पर कोई बात नहीं कि लोग उसे धीरे-धीरे अपना सके, और जब वे असन्तुष्ट हो गए जारी कर उन्होंने विद्रोह किया तो उसने निर्देयता के साथ उनको सजा दी।

उसे जो अच्छा प्रतीत हुआ, उसे फौरन किया जाने का आदेश मिला और जब वह असफल या असंभव जताता हुआ, तो उसकी निराशा रोष की सीमा पर पहुंच गई और उसने अपना क्रोध बिना कोई भेदभाव किए उन अप्रसन्न अपराधियों पर उतारा जो उसकी कल्पना के साथ न चल सके। अतः अपने सर्वोत्तम संकल्पों, उत्तम विचारों एवं सन्तोष के संतुलन बिना, अनुपात का कोई ध्यान न करते हुए, मुहम्मद तुगलक को सम्पूर्ण विफलता प्राप्त हुई।

उसका शासन ऐसा था जिसमें विद्रोहों का एक लम्बा सिलसिला चलता रहा जिन्हें उसने बर्बरतापूर्वक दबाया । उसकी प्रजा, जिसे वह लाम पहुंचाना चाहता था और जिस पर उसने अपना कोष लुटाया, उससे अप्रसन्न होने लगी, उसकी सारी योजनाएँ निरर्थक हो गईं और जब सिन्ध नदी के किनारे २६ वर्ष बाद उसका देहान्त हुआ, तो उसने एक टूटा-फूटा साम्राज्य और एक लुटी हुई व विद्रोही प्रजा छोड़ी।” (Medieval India, PP. 86-87)

सर वुल्जले हेग के अनुसार, “मुहम्मद तुगलक जैसे विषम व प्रतिकूल चरित्र को अंकित करना कोई सरल कार्य नहीं है। वह उन असाधारण राजाओं में से था जो कभी गद्दी पर बैठे । अपनी बहुत अपव्ययी उदारता में उसने विद्रोहह्मयी तथा अविवेकपूर्ण निर्दयता का संयोग कर दिया; उसने इस्लाम के कानून द्वारा निर्धारित रीति व संस्कारों को स्वीकार किया परन्तु समस्त सार्वजनिक मामलों में उनका बिल्कुल पालन नहीं किया, उसने उन सब के लिए एक अन्धविश्वासी सम्मान दिया जिनकी जाति या जिनकी पवित्रता का आदर किया जाता था, परन्तु जब उसका रोष जाग्रत हो जाता था तब वह व्यक्तिगत पावनता या पुरोहित (उल्मा) के रक्त तक का सम्मान न करता था।

उसके कुछ प्रशासकीय व अन्य सैनिक उपाय उसकी सर्वश्रेष्ठ योग्यता का प्रमाण देते हैं, शेष कार्य किसी पागल जैसे मनुष्य केहैं । उसका संरक्षणाषीन विद्वान जियाउद्दीन बरनी, इतिहासकार, जिसके साथ उसने काफी सीमा तक घनिष्ठता स्वीकार की और जिससे उसने प्रायः परामर्श लिया, वह बहुत से ऐसे अत्याचारों का वर्णन करता है जिनकी स्वीकृति या जिनके आदेश सुल्तान ने १२ दुष्ट परामर्शदाताओं के कुप्रभाव के कारण जारी किए, वह सुल्तान को ‘दयनीय’, ‘अभिशप्त’, या सबसे ‘अधिक अभिशप्त’ से दोषारोपित करता है, जिसको मुसलमानों का रक्त प्रवाहित करने में श्रानन्द श्राता था ।

परन्तु मुहम्मद तुगलक कोई दुर्बल व्यक्ति नहीं था, और अपने परामर्श- दाताओं के हाथ में कभी कठपुतली बन कर नहीं रहा। यदि उसके परामर्शदाता दूषित व रक्त के प्यासे थे तो वही उनका चुनाव करता था, और यदि वह बुरे वरामर्शों का अनुसरण करता था, तो वह इसलिए करता था क्योंकि वे उसके द्वारा प्रषांसित होते रहते ।

इसी तरह बरनी बताता है कि आदि काल में अपना सम्पर्क साद काफिर, तर्काचार्य उबैद, अभक्तिपूर्ण कवि अलीमुद्दीन दार्शनिक से रखने के कारण प्रशासकीय व दण्ड सम्बन्धी कार्यों में वह इस्लाम के कानून के प्रति उदासीनता रख लेता था, किन्तु यह केवल विशेष दलील है।

उसके इन स्वतन्त्र विचार वालों के साथ सम्पर्क ने इस्लाम में उसके विश्वास को कम नहीं किया, और इससे अन्य क्षेत्रों में कानूनों के प्रति उसके ज्ञानपूर्ण सम्मान या उसकी परम्परायों के बादर में कोई कमी न था सकी।

यह तर्काचायों, कवियों या दार्शनिकों का दोष नहीं है कि उसने अपनी अभिरुचि को स्पष्ट रूप से विना खोले हुए सांसारिक विषयों में दैवी स्पष्टीकरण के क्षेत्र में मानवीय विवेक को जान बूझकर पसन्द किया और इस प्रकार रूढ़िवाद को ठुकरा दिया।

उसके निजी निर्णय ने उसको गलत मार्ग दिखाया, परन्तु यह उसकी प्रवृत्ति के कारण था। एक न्यायकर्ता व प्रशासक के नाते उसका विशेष दोष यह था कि उसमें अपरिमित गवं था जिसने उसे अपराधों के बीच अस्तर निका- लने की शक्ति से वंचित कर रखा था।

उसके सारे प्रदेश पवित्र होते थे और एक अव्यावहारिक निर्देश से तनिक मी हटाव और विद्रोह या आज्ञा न मानने का गम्भीर अपराध सभी का एक दण्ड था-निर्देयता के साथ मृत्यु दण्ड। इस नीति ने राजा तथा प्रजाँ पर सामूहिक रूप से प्रभाव डाला व साथ ही उसकी प्रतिक्रिया भी चलती रही। अपने सार्वभौम शासक की बर्बरता से तंग आकर वे और भी अधिक प्रति क्रियावादी बन गए । उनकी आज्ञावहेलना से चिढ़ कर वह और भी रुष्ट हो गया ।

उसके शासन काल में उसका विशाल साम्राज्य बहुत कम समयों पर उपद्रवों से मुक्त रहा, और उसकी मृत्यु पर सारा राज्य उथल-पुथल में फंसा।

“बरनी, उसके उपकारों व भयों का विचार न किए हुए, आश्चर्य के साथ ऐसा विवरण देता है। वह कहता है कि सुल्तान का गर्व इतना अपरिमित था कि वह यह सुनना सहन नहीं कर सकता था कि इस पृथ्वी का कोई कोना, यहाँ तक कि श्राकाश तक का कोई कोना, उसकी सत्ता के आधीन नहीं है।

एक ही समय पर वह सुलेमान व सिकन्दर दोनों ही था; वह केवल राजपद ही से संतुष्ट नहीं था, क्योंकि वह धार्मिक पुरोहित का पद प्राप्त करने का भी इच्छुक था। उसकी यह श्राकांक्षा थी कि संसार की सब वस्तुनों को वह अपना दास बना ले और बरनी उसके इस गर्व को उन फरोन राजाओं व निमरोद के समान समझता है जो राजपद व दैवी-पद दोनों ही का दावा करते थे, किन्तु विधि के प्रति उसके चिन्ताजनक सम्मान तथा इस्लाम धर्म में उसके दृढ़ विश्वास ने उसके माथे से नास्तिकता तथा अनिष्ठा का कलंक हटा दिया।

वह उसकी तुलना बुस्ताम के बयाजिद और मन्सूर-उल-हल्लाज के पुत्र, हुसेन से करता जिन्होंने अपने मक्ति के आनन्द में रत होकर यह विश्वास किया कि वे ईश्वर में अपने को मिला चुके हैं, परन्तु उसकी बर्बरतापूर्ण निर्देयता ने किसी भी पवित्रता को उसके ऐसे दावों से वंचित कर दिया।” (The Cambridge History of India, Vol. III, pp. 136-37)


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