मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएं: जीवनी, राजधानी परिवर्तन, दोआब में कर वृद्धि, सिक्कों का प्रचलन और साम्राज्य विस्तार, मृत्यु

मुहम्मद बिन तुगलक, जिसे आमतौर पर मुहम्मद तुगलक के नाम से जाना जाता है, तुगलक वंश से दिल्ली का सुल्तान था, जिसने 1325 से 1351 ईस्वी तक भारतीय उपमहाद्वीप में शासन किया था। वह अपनी महत्वाकांक्षी और विवादास्पद नीतियों के साथ-साथ अपने प्रशासनिक और सैन्य सुधारों के लिए जाना जाता है। मुहम्मद तुगलक अपने पिता, गयासुद्दीन तुगलक की मृत्यु के बाद सिंहासन पर बैठा, और शुरू में, उसने एक शासक के रूप में अपना शासन संभाला।

मुहम्मद बिन तुगलक की योजनाएं: जीवनी, राजधानी परिवर्तन, दोआब में कर वृद्धि, सिक्कों का प्रचलन और साम्राज्य विस्तार, मृत्यु

मुहम्मद बिन तुगलक

वह अपनी बुद्धि और खगोल विज्ञान, गणित और दर्शन सहित विभिन्न विज्ञानों के ज्ञान के लिए जाना जाता था। हालाँकि, उनके शासनकाल को महत्वाकांक्षी लेकिन अक्सर गलत नीतियों की एक श्रृंखला द्वारा चिह्नित किया गया था, जिसके महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए।

नाम मुहम्मद तुग़ल, दिल्ली का 18वें सुल्तान
जन्म 1290 ईस्वी
जन्मस्थान दिल्ली, भारत
मृत्यु 20 मार्च 1351 (आयु 60-61)
मृत्यु स्थान थट्टा, सिंध ( वर्तमान पाकिस्तान)
पिता गयासुद्दीन तुगलक
माता बेगम नूर जहाँ
शासन 1 फरवरी 1325 – 20 मार्च 1351
पूर्ववर्ती गयासुद्दीन तुगलक
उत्तरवर्ती फिरोज शाह तुगलक
दफ़न तुगलकाबाद , दिल्ली
राजवंश तुगलक वंश
धर्म इस्लाम

मुहम्मद तुगलक की सबसे विवादास्पद नीतियों में से एक दिल्ली सल्तनत की राजधानी का दिल्ली से दौलताबाद में स्थानांतरण था, जो अब वर्तमान महाराष्ट्र, भारत में है। यह निर्णय रणनीतिक विचारों से प्रेरित था, क्योंकि दौलताबाद को मध्य एशिया से संभावित मंगोल आक्रमणों से निपटने के लिए बेहतर स्थिति में माना जाता था। हालाँकि, राजधानी और इसकी आबादी को स्थानांतरित करने के बड़े उपक्रम को तार्किक चुनौतियों का सामना करना पड़ा और इसके परिणामस्वरूप भारी पीड़ा और जीवन की हानि हुई। अंतत: निर्णय को कुछ वर्षों के बाद उलट दिया गया और राजधानी को वापस दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया।

मुहम्मद तुगलक ने आर्थिक नीतियों को भी लागू किया, जैसे कि पीतल और तांबे से बनी एक सांकेतिक मुद्रा की शुरुआत, जो स्वीकृति प्राप्त करने में विफल रही और आर्थिक व्यवधानों का कारण बनी। उन्होंने माप और भूमि राजस्व सुधारों की एक प्रणाली को लागू करने का भी प्रयास किया, जिसे बड़प्पन और किसानों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

अपनी असफलताओं और विवादास्पद नीतियों के बावजूद, मुहम्मद तुगलक को कला, साहित्य और वास्तुकला का संरक्षक माना जाता था। उन्होंने विद्वानों, कवियों और संगीतकारों का समर्थन किया और उनका दरबार अपनी सांस्कृतिक जीवंतता के लिए जाना जाता था।

मुहम्मद तुगलक के शासनकाल को क्षेत्रीय राज्यों, विद्रोहों और बाहरी आक्रमणों के साथ संघर्षों द्वारा भी चिह्नित किया गया था। 1351 में, रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई, और उनके चचेरे भाई फिरोज शाह तुगलक ने उन्हें दिल्ली के सुल्तान के रूप में सफल बनाया।

गयासुद्दीन तुगलक के बाद उसका पुत्र राजकुमार जूना खाँ, जिसने मुहम्मद तुगलक की उपाधि ग्रहण की सुल्तान बना। मुहम्मद तुगलक के शासन काल के इतिहास के अध्ययन के लिए समकालीन फारसी ग्रंथों के अतिरिक्त दो नए स्रोत प्राप्त हुए हैं। इब्नबतूता को जो लगभग 1333 ईस्वी में भारत आया था और जिसका सुल्तान ने खूब स्वागत किया, दिल्ली का काजी नियुक्त किया गया तथा 1342 ईस्वी में सुल्तान के राजदूत की हैसियत से चीन भेजा गया। इस यात्री ने मुहम्मद तुगलक के समय की घटनाओं का अपनी पुस्तक ‘रेहला’ में उल्लेख किया है।

मुहम्मद तुगलक के विषय में ऐतिहासिक स्रोत

जियाउद्दीन बरनी(Zia-Ud-Din Barani)

फिरोजशाह तुगलक के समय में जियाउद्दीन बरनी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘तारीखे-फिरोज-शाही’ लिखी। वह दोआब में वरन (वर्तमान बुलन्दशहर) का निवासी था।

बरनी की तारीखे-फिरोज-शाही मध्यकालीन भारत के विषय में प्रमुख रचना है। हमें यह बताया जाता है कि अपनी पुस्तक लिखने से पहले बरनी ने यह निश्चय किया था कि वह केवल सच्ची बातों के अतिरिक्त अन्य किसी तत्व को लेखनीबद्ध नहीं करेगा। इसमें आश्चर्य नहीं कि उसका विवरण विश्वसनीय है। बरनी अलाउद्दीन की सफलताओं की प्रशंसा करता है व उसके निर्दयी दण्डों के लिए उसकी निंदा भी करता है। उसने तुगलक वंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक पर प्रशंसाओं की बौछार कर रखी है।

मुहम्मद तुगलक के शासन काल की विभिन्न घटनाओं की विस्तार के साथ व्याख्या की है। हमें उसने दोआब में कर वृद्धि, दिल्ली से दौलताबाद राजधानी का स्थानांतरण, सांकेतिक सिक्के का प्रचलन, मुहम्मद तुगलक की विजयी संबंधी अनेक योजनाओं, मुहम्मद तुगलक के चरित्र आदि के विषय में बहुत सामग्री दी है। तीरीखे-फिरोज-शाही के अतिरिक्त बरनी ने फ़तबाये-जहांदारी की भी रचना की।

इब्न बतूता ( Ibn-Batuta )

इब्न बतूता का जन्म सन 1304 ईस्वी में हुआ था। उसका असली नाम अबू अब्दुल्ला मुहम्मद बिन बतूता था। परंतु साधारण रूप से वह इब्न बतूता के नाम से प्रसिद्ध है। उसे यात्राओं का शौक था। 21 वर्ष की आयु में उसने अपनी यात्राएँ शुरू कीं। अफ्रीका व एशिया के देशो की सैर करने के बाद वह हिंदूकुश के पहाड़ी मार्गों से  होता हुआ भारत आ पहुंचा। वह 12 सितंबर 1333 ईo को ‘सिंध आ पहुंचा। फिर वह दिल्ली की ओर बढ़ा जहाँ उसका सहृदयता से स्वागत किया गया। 

इब्नबतूता 8 वर्ष भारत में रहा ( 1334 से 1342 )। इब्न बतूता ने अपनी पुस्तक तोहफत-उन-नुज्जरफ़ी गरायब-इल-अमसर  में अपनी यात्राओं को लिपिबद्ध किया। यह रचना 1355 ई० में पूर्ण हुई। 1377-78  में उसका देहान्त हो गया।

जियाउद्दीन बरनी व इब्न बतूता के विवरणों के अतिरिक्त हमें अन्य रचनाओं से भी मुहम्मद तुगलक के शासन के विषय में जानकारी मिलती है।- शमस-ए-सिराज अफीफ का तारीखे-फीरोजशाही, फीरोज शाह तुगलक का एक जीवन विवरण फतूहात-ए-फिरोजशाही, ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी का मुन्शते मैहरू, अमीर खुसरो का तुगलक नामा, याहिया-बिन-अहमद सरहिन्दी का तारीखे-मुबारक शाही प्रमुख हैं। 

मुहम्मद तुगलक का प्रारंभिक जीवन

राजकुमार जूना खाँ गयासुद्दीन तुगलक का ज्येष्ठ पुत्र था। उसका पालन पोषण एक सैनिक की भांति हुआ था और उसने उसी में अपने को प्रसिद्ध कर लिया। वह एक तीक्ष्ण-बुद्धि वाला बालक था। खुसरो शाह द्वारा उसे ‘तुरंगों का स्वामी’ नियुक्त किया गया था। परंतु जूना खॉं ने  अपने संरक्षक खुसरो शाह के विरुद्ध एक आंदोलन शुरू कर दिया और उसने खुसरो शाह को उलट फेंकने में अपने पिता की सहायता की।

जब 1320 ई० में उसका पिता सम्राट बन गया तो राजकुमार जूना खाँ की उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्ति हो गई और उसे ‘उलघ खां’ की उपाधि दी गई। उसने 1322 और 1323 में वारंगल में दो अभियानों का नेतृत्व किया। यद्यपि वह अपने प्रथम अभियान में असफल रहा तथापि दूसरे अभियान में सफल हुआ।

उसने 1325 ईस्वी में अपने पिता की मृत्यु के शीघ्र बाद ही अपने को गद्दी पर विराजमान किया। 40 दिन तक वह तुगलकाबाद में रहा। उसके बाद वह दिल्ली नगर की ओर बढ़ा और अपने को बलबन के लाल महल में रखा। उसने अपने मुकुटारोहण के समय सोने व चांदी के सिक्के लोगों में बांटे।

मुहम्मद तुगलक का शासन काल मध्य युग के इतिहास का एक महत्वपूर्ण युग माना जाता है। अपनी सुविधा के लिए हम इस शासनकाल को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं प्रथम 1325 से 1335 तक जब मुहम्मद तुगलक नए-नए प्रयोग करता रहा  तथा प्राय: शांति बनी रही। द्वितीय 1335 से 1351 तक जब उसकी नई योजनाएं तथा प्रयोग असफल दिखाई देने लगे समस्याएं बढ़ने लगी और अमीर तथा धर्माचार्य उसके विरुद्ध हो गए। 

मुहम्मद तुग़लक़ की योजनाएं

राजधानी का परिवर्तन 1326-27

एक बहुत महत्वपूर्ण प्रयोग जो सुल्तान ने किया वह दिल्ली से दौलताबाद (देवगिरी ) के लिए राजधानी का बदलना है। बरनी लिखता है कि दौलताबाद की केंद्रीय स्थिति थी और दिल्ली, गुजरात, लखनौती, तेलंगाना व अन्य प्रमुख स्थानों से लगभग 700 मील दूर थी। यह नई राजधानी सामरिक महत्व रखती थी। यह मंगोलों के आक्रमणों से सुरक्षित भी थी जो स्थाई रूप से दिल्ली को धमकी देते रहते थे।

सुल्तान ने दौलताबाद को अपने अधिकारियों व जनता के लिए उचित स्थान बनाने का पूरा प्रयत्न किया। उन सब को जिन्हें दौलताबाद के लिए प्रस्थान करना था यह सब सुविधाएं प्रस्तुत की गई। उनकी सुगमता के लिए एक विशाल सड़क बनवाई गई सड़क के दोनों और छायादार वृक्ष लगवाए गए। दिल्ली से दौलताबाद के बीच एक सुव्यवस्थित डाक व्यवस्था की स्थापना की गई।

दिल्ली के लोगों को सुल्तान द्वारा जबरन दौलताबाद के लिए प्रस्थान करने के लिए मजबूर किया गया। लोग  वेमन से दौलताबाद पहुंचे। परंतु वहां की जलवायु और वातावरण उन्हें रास नहीं आया परिणामस्वरूप बहुत से लोग वहां जाकर मरने शुरू हो गए। सुल्तान को अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने लोगों को वापस लौटने का आदेश दिया अतः जो लोग आते समय बच गए थे वह लौटते समय मर गए।

 दोआब में भू-राजस्व की वृद्धि 1326-27

 सुल्तान ने गंगा व यमुना के बीच दोआब में एक वित्तीय प्रयोग किया जिसका  परामर्श ठीक नहीं था। उसने केवल कर की दर ही नहीं बढ़ाई बल्कि उसनें कुछ अन्य उपकरों का भी पुनर्निर्धारण किया। लागू की गई वास्तविक धनराशि के विषय में समकालीन व आगामी  मुस्लिम लेखकों के विवरणों में कुछ अस्पष्टता ब विप्रीतताएं हैं।

बरनी कहता है कि करो को 10 से 20 गुना तक बढ़ा दिया गया था। किंतु दुर्भाग्य से जिस वर्ष यह वृद्धि की गई उसी वर्ष अकाल पड़ गया। उपज नहीं हो सकी भू-राजस्व अधिकारियों ने निश्चित राशि को निर्दयता से वसूलने का प्रयत्न किया। असहाय रियाया (जनता)  घबरा गई जबकि शक्तिशाली जमींदारों ने लगान देने से इंकार कर दिया। 

किसानों ने अपना काम बंद कर दिया। इतिहास में ऐसी स्थिति शायद ही पहले कभी रही हो जब लगान वसूली के समय अत्याचार किए गए। कईयों ने तो उपज को आग लगा दी। धीरे-धीरे स्थिति खराब होती गई दोआब के विद्रोह को शक्ति से दवाया गया। क्योंकि जो सुल्तान उलेमा वर्ग को उनकी गलतियों के लिए क्षमा नहीं कर सकता था जमीदारों के विद्रोह को कैसे सहन कर सकता था। इन विद्रोह का प्रभाव दूसरे प्रदेशों में भी हुआ तथा गड़बड़ी फैलनी शुरू हो गई। 

सांकेतिक मुद्रा का प्रचलन/ टकसाल का प्रयोग 1329-30-

एडवर्ड टामस ने मुहम्मद तुगलक को “धनवानों का राजकुमार” कहा है। एक नया सोने का सिक्का जिसका भार 200 दानों के तुल्य था और जिसे इब्न बतूता ने दीनार बताया मुहम्मद तुगलक ने निर्गत किया। उसने 175 दानों के तुल्य भार के सोने व चाँदी के पुराने सिक्कों को फिर से चालू किया जिनका भार 140 चांदी के दानों के बराबर था।

सम्भवतः यह परिवर्तन इसलिए था कि “चाँदी की अपेक्षा सोने का सापेक्ष महत्व गिर चुका था, और दक्षिण के अभियानों के कारण साम्राज्य का कोष पुरानी धातु के सिक्कों से विशाल मात्रा में भर चुका था।”

🔴  1329 और 1330 में सुल्तान ने ताँबे के सिक्कों में साँकेतिक सिक्कों की मुद्रा निर्गमित की।

🔴  चीन व फारस में पहले से ही इस प्रकार की मुद्रा का प्रचलन था।

🔴  चीन के मंगोल सम्राट कुबलाई खाँ ने तेरहवीं शताब्दी के अन्त के समय चीन में कागजी मुद्रा का प्रचलन किया था।

🔴  फारस के शासक गाई खाटू ने 1294 में ऐसा ही प्रयोग किया था।

इस प्रकार के उदाहरणों से प्रेरित होकर मुहम्मद तुगलक ने एक आदेश जारी किया जिसमें घोषित किया कि समस्त लेन-देन में सोने व चाँदी के सिक्कों के समान ही ताँबे के सिक्के भी विधिवत स्वीकार किये जायें।

बरनी के अनुसार “इस आदेश ने प्रत्येक हिन्दू के घर को टकसाल बना दिया।” लोगों ने अपने घरों में ही ताँबे के सिक्के ढालने शुरू कर दिये। परिणामस्वरूप थोड़े ही समय में दूर के देश केवल ताँबे के टंके ही को धातु स्वीकार करने लगे और उस स्थानों में जहाँ आदेश के प्रति सम्मान प्रचलित था सोने का टंका ताँबे के सौ टंको के मूल्य के बराबर हो गया।

प्रत्येक सुनार अपनी प्रयोगशाला में ताँबे के सिक्के ढालने लगा और राजकोष उनसे भर गया। जब सुल्तान को अपनी गलती का आभास हुआ तो क्रोधावेश में उसने सारे ताँबे के सिक्कों को राजकोष में जमा कर सोने व चाँदी के सिक्कों से बदलने का आदेश दिया।

नए कृषि विभाग की स्थापना-( दीवान-ए-कोही )

 सुल्तान ने कृषि को बढ़ाबा देने के उद्देश्य से एक नए कृषि विभाग की स्थापना की जिसे दीवाने कोही कहते थे।

🔴 60 वर्ग मील की भूमि का एक लम्बा टुकड़ा इस कार्य के लिए चुना गया। भूमि पर हेर-फेर कर विभिन्न फसलों को उगाया गया।

🔴 दो वर्षों में सुल्तान ने 70 लाख से ज्यादा व्यय किया।

🔴दुर्भाग्यवश यह प्रयोग भी असफल रहा क्योंकि प्रयोग के लिए चयनित भूमि अनुपजाऊ निकली।

खुरासान अभियान-  

 मुहम्मद तुगलक ने लगभग 370000 घुड़सवारों की एक विशाल सेना इकट्ठी की ताकि उसे खुरासान विजय के लिए भेजा जा सके। इस सेना में दोआब के राजपूत तथा कुछ मंगोल भी शामिल थे। यह अभियान तरमाशरीन के साथ मैत्री का परिणाम था। कहते हैं कि एक त्रि-मैत्री संगठन ( मुहम्मद तुगलक+तरमाशरीन+मिस्र के सुल्तान )  भी खुरासान के सुल्तान अबू सैयद के विरुद्ध बनाया गया था। किंतु जब भारतीय सेना तैयार हुई तो ट्रांस-आक्सियाना में राजनीतिक खलबली होने से तरमाशरीन को शासक पद से हटा दिया गया।

इस प्रकार यह अभियान कभी भी प्रारंभ ना हो सका। इब्ने बतूता तथा अरबी ग्रंथ मसालिक-उल-अबसार भी खुरासान के विरुद्ध किसी भी लड़ाई का उल्लेख नहीं करते। सुल्तान के समक्ष बड़ा प्रश्न यह है कि इस विशाल सेना का क्या किया जाए? यदि इसे पूर्णता हटाया जाता है तो यह सैनिक कानून-व्यवस्था भंग करके उत्पात मचा सकते थे। ऐसी स्थिति में सुल्तान ने यही बेहतर समझा के उत्तरी भारत की पर्वत श्रंखला में सीमाओं को दृढ़ करने के लिए भेजा जाए। 

कराचिल का सैन्य अभियान

कराचील की तुलना हिमाचल के कांगड़ा के पहाड़ी क्षेत्र से की जाती है। यह सल्तनत और चीन के बीच का क्षेत्र था। शुरुआती जीत के बाद तिब्बत की हाड़ कंपा देने वाली ठंड और तूफान में सभी सैनिक मारे गए। जो बच गए वे प्लेग से मर गए। इब्न बतूता केवल तीन सैनिकों के जीवित रहने की बात करता है और बरनी लगभग 10 सैनिकों की।

मुहम्मद तुग़लक़ की धार्मिक नीति

उनकी धार्मिक सहिष्णुता पर इतिहासकारों द्वारा व्यक्त किए गए परस्पर विरोधी विचार हैं। जबकि आगंतुक इब्न बतूता, नुनेज़ और फ़रिश्ता ने कहा कि मुहम्मद बिन तुगलक ने अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णुता दिखाई, इसके विपरीत, पीटर जैक्सन ने कहा कि मुहम्मद एकमात्र सुल्तान थे जिन्होंने हिंदू त्योहारों में भाग लिया।

इब्न बतूता ने उल्लेख किया कि किंवदंती है कि चीन के राजा (युआन सम्राट) ने संभल में एक क्षतिग्रस्त मंदिर के पुनर्निर्माण के लिए मुहम्मद को एक दूतावास भेजा था।

दूतों को हालांकि इस बयान से इनकार किया गया था कि केवल मुस्लिम क्षेत्र में रहने वाले लोग जो जजिया का भुगतान करते हैं उन्हें मंदिर को बहाल करने की अनुमति दी जा सकती है।

फिरोज शाह तुगलक ने दावा किया कि उसके शासन से पहले, मूर्ति-मंदिरों को शरीयत के विपरीत पुनर्निर्माण की अनुमति दी गई थी।

मुहम्मद बिन तुगलक की प्रशासन नीति

1325 से 1351 तक भारतीय उपमहाद्वीप में दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाले मुहम्मद बिन तुगलक को उनकी अनूठी और अक्सर विवादास्पद प्रशासनिक नीतियों के लिए जाना जाता है। उनके शासनकाल के दौरान उनकी कुछ प्रमुख नीतियों और कार्यों में शामिल हैं:

राजधानी का स्थानांतरण: मुहम्मद बिन तुगलक की सबसे उल्लेखनीय नीतियों में से एक दिल्ली सल्तनत की राजधानी को दिल्ली से दौलताबाद (अब महाराष्ट्र, भारत में) में स्थानांतरित करने का उनका निर्णय था। यह निर्णय रणनीतिक और प्रशासनिक विचारों से प्रेरित था, क्योंकि दौलताबाद को मंगोल आक्रमणों के खिलाफ अधिक रक्षात्मक स्थान के रूप में देखा गया था। हालाँकि, यह निर्णय अत्यधिक अलोकप्रिय साबित हुआ और महत्वपूर्ण तार्किक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप आम जनता के बीच व्यापक पीड़ा और आर्थिक व्यवधान हुआ।

मुद्रा सुधार: मुहम्मद बिन तुगलक ने दिल्ली सल्तनत में चांदी और सोने की कमी को दूर करने के लिए पीतल और तांबे से बनी सांकेतिक मुद्रा शुरू करने का प्रयास किया। हालाँकि, यह नीति लोगों द्वारा स्वीकृति की कमी के कारण विफल रही और इसके परिणामस्वरूप आर्थिक अराजकता और मुद्रा प्रणाली में विश्वास की हानि हुई।

अभियान और सैन्य अभियान: मुहम्मद बिन तुगलक ने अपने शासनकाल के दौरान कई सैन्य अभियानों का नेतृत्व किया, जिसमें दक्षिण भारत में मंगोलों और हिंदू राज्यों के खिलाफ अभियान शामिल थे। जबकि इनमें से कुछ अभियान सफल रहे, अन्य को असफलताओं का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप संसाधनों और जनशक्ति की हानि हुई।

कराधान और राजस्व सुधार: मुहम्मद बिन तुगलक ने नए करों और भूमि राजस्व प्रणालियों की शुरूआत सहित विभिन्न कराधान और राजस्व सुधारों को लागू किया। हालांकि, इन नीतियों को स्थानीय आबादी द्वारा हमेशा अच्छी तरह से प्राप्त नहीं किया गया, जिससे कुछ क्षेत्रों में अशांति और विद्रोह हुआ।

विद्वानों और कलाकारों का संरक्षण: मुहम्मद बिन तुगलक अपने विद्वानों, कवियों और कलाकारों के संरक्षण के लिए जाना जाता था, और उसका दरबार अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक जीवंतता के लिए जाना जाता था। उन्होंने दिल्ली में प्रसिद्ध मदरसा (इस्लामिक मदरसा) सहित कई शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की, जिसने इस्लामी दुनिया के विभिन्न हिस्सों के विद्वानों को आकर्षित किया।

कृषि सुधार: मुहम्मद बिन तुगलक ने कृषि उत्पादकता और सिंचाई प्रणाली में सुधार लाने के उद्देश्य से कृषि सुधारों को लागू किया। उन्होंने सिंचाई की सुविधा और कृषि विकास को बढ़ावा देने के लिए नहरों और बांधों के निर्माण का भी आदेश दिया।

प्रशासन का केंद्रीकरण: मुहम्मद बिन तुगलक ने सुल्तान की शक्ति को मजबूत करके और रईसों और स्थानीय राज्यपालों के प्रभाव को कम करके अपने प्रशासन में सत्ता को केंद्रीकृत करने का प्रयास किया। हालाँकि, इस नीति को क्षेत्रीय शक्तियों और स्थानीय अभिजात वर्ग के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप कभी-कभी राजनीतिक अस्थिरता हुई।

 एल्फ़िसटन का मानना है कि मोहम्मद तुगलक पर थोड़ा बहुत पागलपन का प्रभाव था।

मुहम्मद तुग़लक़ की मृत्यु

अपने शासनकाल के अंत में जब सुल्तान मुहम्मद तुगलक गुजरात में विद्रोह को कुचल कर तारगी को समाप्त करने के लिए सिंध की ओर बढ़ा, तो रास्ते में थट्टा के पास गोंडल पहुंचकर वह गंभीर रूप से बीमार हो गया। यहां 20 मार्च 1351 को सुल्तान की मृत्यु हो गई।

इतिहासकार बदाउनी ने उनकी मृत्यु पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि, “सुल्तान को अपनी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ति मिली।” इसामी ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक को इस्लाम का विरोधी बताया है।

इतिहासकार डॉ. ईश्वरी प्रसाद ने उनके बारे में कुछ इस प्रकार कहा है कि, “मुहम्मद तुगलक निस्संदेह मध्य युग में सुल्तान बनने वालों में एक योग्यतम व्यक्ति था। मुस्लिम शासन की स्थापना के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले शासकों में वह सबसे विद्वान और सुसंस्कृत शासक था।

उसने अपने सिक्कों पर “अल-सुल्तान जिल्ली अल्लाह”, “सुल्तान ईश्वर की छाया है”, “सुल्तान अल्लाह का सेवक है” शब्दों को अंकित किया। मुहम्मद बिन तुगलक एक शानदार कवि और संगीत का प्रेमी भी था।

मुहम्मद तुगलक ने बरनी से कहा “मेरा राज्य रोगी है और कोई भी औषधि उसे ठीक नहीं करती। वैद्य सिर का दर्द ठीक करता है परंतु ज्वर आ जाता है, वह ज्वर दूर करने की चेष्टा करता है तो कुछ अन्य रोग निकल पड़ता है।

इसलिए मेरे राज्य में अशांति फूट पड़ी है, यदि मैं एक स्थान पर उसे दबाता हूं वह दूसरे स्थान पर उठ जाती है, यदि मैं फिर उसे एक जिले में रोकता हूं तो दूसरे जिले में गड़बड़ हो जाती है। फिर मैं संदेह  या कल्पना पर उनके विद्रोहात्मक व प्रपंचात्मक कार्यों के विरुद्ध दंड देने के लिए आगे बढ़ता हूं और मैं छोटे-छोटे अपराध तक पर मृत्यु दंड देता हूं।

यह मैं तब तक करूंगा जब तक जीवित रहूंगा या जब तक लोग ईमानदारी से काम नहीं करते या विद्रोह व आज्ञोल्लंघन नहीं छोड़ देते। मेरे पास ऐसा कोई वजीर नहीं है जो मेरे निकलते हुए रक्त को दिखाने के लिए नियम बनायेगा।

मैं मनुष्यों को दंड देता हूं क्योंकि वे मेरे बिल्कुल विरोधी व शत्रु बन बैठे हैं। मैंने उनके बीच बड़ा धन वितरित  किया, किंतु वे फिर भी कर्तव्य-पारायण व मित्र ने हो सके। फिर विद्रोहों के लिए मेरा उपाय तलवार है।

मैं दंड देता हूं व तलवार का प्रयोग करता हूं जिससे कष्टों द्वारा सुधार हो सके। जितना अधिक लोग विरोध करते हैं उतना ही अधिक में दंड देता हूं।”

 अन्य महत्वपूर्ण जानकारी

  • मुहम्मद तुगलक होली के त्यौहार में भाग लेता था।
  • मुहम्मद तुगलक की मृत्यु 20 मार्च 1351 में सिंध अभियान के समय हुयी। उसकी मृत्यु पर इतिहासकार बदायूँनी ने कहा “सुल्लान को अपनी प्रजा से और प्रजा को अपने सुल्तान से मुक्ती मिल गई।”
  • 1342 में इब्नबतूता सुल्तान के राजदूत की हैसियत से चीनी शासक तोगन किमूर के दरबार में गया।
  •  मुहम्मद तुगलक ने इंशा-ए-महरु पुस्तक की रचना की ।
  •  मुहम्मद तुगलक ने जिल्ली अल्लाह अर्थात ईश्वर सुल्तान का समर्थक की उपाधि ग्रहण की।
  • मुहम्मद तुगलक अरबी एवं फारसी का ज्ञाता था,वह खगोलशास्त्र,गाणित, विज्ञान, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, दर्शन में पारंगत था।
  • तुगलक का साम्राज्य 23 प्रांतों में विभक्त था,कश्मीर एवं बलूचिस्तान को छोड़कर सम्पूर्ण भारत दिल्ली सल्तनत के नियन्त्रण में था।

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