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     ब्रिटिश सरकार ने भारत छोड़ो आंदोलन 1942 के दौरान कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया। द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों की सफलता से भी भारतीय जनमानस में निराशा का माहौल था। परन्तु शिमला कॉन्फ्रेंस के आरम्भ के समय नेताओं की रिहाई और नेहरू तथा पटेल द्वारा उनकी गिरफ्तारी के परिणामस्वरूप आरम्भ किये गए जन-आंदोलन के पक्ष में दिए गए बयानों ने उनमें फिर से आशा का संचार किया। अपने बयानों में इन नेताओं ने जनता की कुर्बानियों की प्रशंसा करते हुए लोगों द्वारा की गई हिंसा को भी उचित ठहराया था, जिससे लोग प्रसन्न थे।  अब कांग्रेस फिर से लोकप्रिय होने लगी थी।

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photo credit-news18hindi.com

इंग्लैंड में सत्ता परिवर्तन और भारत के प्रति ब्रिटिश नीति में परिवर्तन


तत्कालीन परिस्थिति ने भी भारत के पक्ष में सकारात्मक माहौल पैदा किया।  इसी बीच इंग्लैंड में भी कुछ परिवर्तन हुए जिनका प्रभाव भारतीय राजनीति पर भी पड़ा।  

         “20 अक्टूबर, 1943 को वाइसराय लिनलिथगो के सेवा-निवृत्त  होने पर उनके स्थान पर लार्ड वेवेल भारत के नए वाइसराय नियुक्त हुए। उन्होंने सभी दलों की एक कॉन्फ्रेंस बुलाई जो विफल रही।”

    युद्ध काल की संयुक्त सरकार में दरारें पड़ जाने के कारण और युद्ध में विजय से प्राप्त लोकप्रियता का लाभ उठाने के लिए प्रधानमंत्री चर्चिल ने 1945 के मध्य आम चुनाव कराये जिसमें उन्हें अप्रत्याशित रूप से हार का सामना करना पड़ा।
       इस प्रकार इंग्लैंड में लेबर पार्टी  सरकार सत्ता में आ गई। नए प्रधानमंत्री एटली ने जुलाई 1945 में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और भारत मंत्री ( भारत सचिव ) एमरी का स्थान पैथिक लॉरेंस  ने ले लिया। अब सरकार के सामने दो विकल्प थे —
पहला – भारत को शक्ति के बल पर अपने अधीन रखा जाये तथा
दूसरा – भारत को स्वतंत्र कर दिया जाये। 

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आज़ाद हिन्द फ़ौज ( INA ) और नौ-सैनिकों ( R.I.N. ) का विरोध

        यद्यपि चर्चिल पहले विकल्प  के पक्ष में  थे, एटली का अत्यंत स्पष्ट मत था कि ब्रिटेन को भारत की आज़ादी की माँग को स्वीकार कर लेना चाहिए।
       “ज्ञात हो कि एटली अथवा ब्रिटिश सरकार के इस निर्णय का कारण युद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फ़ौज ( INA ) और नौ-सैनिकों ( R.I.N. ) का विरोध था।”

      अब अंग्रेजों  को लगने लगा था कि अब  भारतीय सैनिकों की सहायता और वफादारी पर निर्भर रहकर इस देश को अपने अधीन रखना अब संभव नहीं है। इन आंदोलनों ने भारतीय समस्याओं को अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की निगाह में स्थान दे दिया था। आज़ाद हिन्द फ़ौज के अफसरों पर मुकदमें और रॉयल इंडियन नेवी द्वारा विद्रोह के समय भारतीयों को ब्रिटिश-विरोधी भावना में अत्यधिक वृद्धि हो गई थी।  इसके अतिरिक्त, जैसा कि हम परिचित हैं दूसरे महायुद्ध के दौरान ब्रिटेन आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से अत्यधिक कमजोर हो गया था। वह अब दूसरे अथवा तीसरे दर्जे की ही शक्ति रह गया था। इन सब घटनाओं को दृष्टिगत रखते हुए ब्रिटिश सरकार ने भारत में कैबिनेट मिशन भेजने के विषय में सोचा। कांग्रेस वर्किंग कमेटी की एक सभा 21 से 23 सितम्बर, 1945 को बम्बई में हुई जिसमें यह प्रस्ताव पास किया कि आने वाले चुनाव में भाग लिया जाये। 

 

ब्रिटिश संसद में एटली के महत्वपूर्ण बयान

      15 मार्च, 1946 को प्रधानमंत्री एटली ने हॉउस ऑफ़ कॉमन्स के समक्ष एक बयान दिया जो कि अत्यंत महत्वपूर्ण था। 

      “एटली ने अपने इस बयान में भारतीयों के लिए आत्मनिर्णय ( Self-Determination ) के और संविधान निर्माण के सिद्धांत को स्वीकार कर लिया गया।”

       इसके अतिरिक्त भारत के कॉमनवेल्थ से अलग होने का अधिकार भी स्वीकार कर लिया गया।  इस बयान में एटली ने जो सबसे महत्वपूर्ण बात कही वह अल्पसंख्यकों को लेकर थी।—

       अपने इस बयान में एटली ने कहा-“हम अल्पसंख्यकों के अधिकारों के बारे में सजग हैं…… परन्तु हम अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों पर निषेधाधिकार ( veto ) नहीं दे सकते।”

      इस बयान से कांग्रेस को बड़ी तसल्ली हुई। 15 मार्च को ही यह घोषणा की गई कि ब्रिटिश सरकार भारत के राजनैतिक गतिरोध को हल करने के लिए एक कैबिनेट मिशन को भारत भेज रही है। 

      कैबिनेट मिशन में कौन-कौन सदस्य थे 

     एटली द्वारा नियुक्त इस कैबिनेट मिशन में तीन सदस्य थे और ये उनकी कैबिनेट के महत्वपूर्ण सदस्य थे जिमें —भारत मंत्री पैथिक लॉरेंस, सर स्टैफोर्ड क्रिप्स और ए. वी. अलेक्जेंडर। 

कैबिनेट मिशन भारत कब पहुंचा 

    कैबिनेट मिशन भारत में 23 मार्च 1946 को पहुंचा। 

1946  के आम चुनाव कांग्रेस और मुस्लिम लीग में मतभेद 

भारत में 1946 के आरम्भ में कांग्रेस और लीग दोनों दलों को शानदार सफलता प्राप्त हुई। परन्तु दोनों दलों में मतभेद होने के कारण किसी अस्थायी सरकार ( provisional goverment ) की स्थापना नहीं हो सकीय थी। कांग्रेस अस्थायी सरकार की स्थापना के लिए हिन्दुओं और मुसलमानों में बराबरी ( parity ) के सिद्धांत को मानने के लिए तैयार न थी। संविधान सभा के लिए कांग्रेस का यह सुझाव था कि प्रांतीय विधानपालिकाओं को निर्वाचक मंडल मान लिया जाये और देशी राज्यों को प्रजा मंडलों द्वारा चुना जाए। परन्तु जिन्ना पाकिस्तान की मांग पर जोर देते रहे। 

कैबिनेट मिशन की सिफारिशें क्या थीं 

    कैबिनेट मिशन कांग्रेस, मुस्लिम लीग के साथ अन्य दलों से बात की।  182 बैठकों में 742 भारतीय नेताओं से साक्षात्कार किया गया और उसके बाद शिमला में एक कॉन्फ्रेंस बुलाई गई। परन्तु क्योंकि कांग्रेस और लीग कोई भी समझौता न कर सकीं, इसलिए यह कॉन्फ्रेंस असफल रही।  कैबिनेट मिशन योजना में निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातें कही गईं थीं :—

1- कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार ब्रिटिश भारत और भारतीय राजाओं ( देशी राजाओं ) को मिलाकर एक भारतीय संघ का निर्माण किया जायेगा जिसके पास विदेश विभाग, रक्षा और संचार रहेंगे और जिसे इन विभागों के लिए धन एकत्र करने का अधिकार होगा। शेष शक्तियां और विषय राज्यों के पास रहेंगे।  इसी प्रकार दोनों क्षेत्रों के प्रतिनिधियों द्वारा कार्यपालिका और विधान पालिका की रचना की जाएगी। 

2- प्रांतों को पृथक-पृथक कार्यपालिका और विधानपालिका के साथ ग्रुप बनाने का अधिकार होगा और प्रत्येक ग्रुप को अपने-अपने अधीन रखे जाने वाले प्रांतीय विषयों का निर्णय करने का अधिकार होगा। 

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      संविधान-सभा के निर्माण के लिए प्रत्येक प्रान्त को 10 लाख लोगों के लिए एक प्रतिनिधि के अनुपात में जनसंख्या के साम्प्रदायिक आधार पर स्थान दिए जायेंगे।  मतदाताओं के केवल तीन वर्ग माने गए —साधारण, मुस्लिम और सिक्ख ( केवल पंजाब ) . इस सिद्धांत के अनुसार ब्रिटिश भारतीय प्रांतों से 292 सदस्य संविधान सभा में चुने जाने थे। भारतीय राज्यों के प्रतिनिधियों के चुनाव का निर्णय परामर्श से किया जाना था। 

3- केंद्रीय संविधान सभा और इंग्लैंड में सत्ता हस्तांतरण से उत्पन्न बातों के निर्णय के लिए एक संधि के सन्दर्भ में बातचीत आवश्यक थी। 

4- सभी दलों की सहायता से शीघ्र ही एक अंतरिम सरकार की स्थापना की जाएगी जिसमें सभी विभाग भारतीय नेताओं के पास रहेंगे। 

5- सत्ता हस्तांतरण के पश्चात् भारतीय राज्यों से संमबद्ध सर्वोच्च शक्ति न ब्रिटेन के पास रहेगी और न भारत के पास। इसका सीधा अर्थ था कि देशी राजा पूर्णतय स्वतंत्र होंगे। 

कैबिनेट मिशन योजना का मुख्य बिंदु क्या क्या था ?

   पाकिस्तान की मांग को अस्वीकृत करना :- कैबिनेट मिशन ने मुस्लिम लीग की मुख्य माँग ( अलग पाकिस्तान ) को अस्वीकार कर दिया और इसके पीछे तर्क दिया कि —-

प्रथम – पाकिस्तान की स्थापना साम्प्रदायिकता की समस्या को हल न कर सकेगी क्योंकि शेष भारत में मुस्लमान फिर भी बचे रह जायेंगे। 

दूसरा – पंजाब और बंगाल का विभाजन करना होगा जो कि अधिकतर लोगों की इच्छा के प्रतिकूल होगा। 

तीसरा – विभाजन से पंजाब के सिक्ख दो भागों में बंट जायेंगे अथवा उन्हें विस्थापित होना होगा। 

चौथा – पाकिस्तान के पश्चिम और पूर्वी भागों में सैकड़ों मील का अंतर होगा जिससे संचार में और युद्ध के समय असुविधा होगी। 

पांचवा – भारतीय राज्य को एक या दूसरा संघ चुनने में असुविधा होगी। 

 

कैबिनेट मिशन योजना के गुणऔर दोष 

कांग्रेस के दृष्टिकोण से कैबिनेट मिशन योजना का सबसे पहला गुण यह था कि इसके द्वारा पाकिस्तान की माँग को नहीं माना गया था। चूँकि कांग्रेस प्रारम्भ से ही विभाजन के खिलाफ थी और एक अखंड भारत के पक्ष में थी, इसलिए मिशन ने उसकी इस मांग को एक कमजोर केंद्र के साथ मान लिया था। 

     दूसरी तरफ इस मिशन योजना के द्वारा प्रांतों को साम्प्रदायिक आधार पर ग्रुपों में बांटने वाली शर्त रखकर मुस्लिम लीग को पाकिस्तान की झलक दिखलाकर प्रसन्न करने का प्रयत्न किया। दूसरे, संविधान-सभा के लिए भारतीय राज्यों को उनकी जनसँख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व दिया गया था। 

    इसके अतिरिक्त केवल तीन प्रकार के साम्प्रदायिक ग्रुपों को ही मान्यता दी गई थी। – सामान्य, मुस्लिम और सिक्ख, और शेष यूरोपीयों और ईसाईयों आदि को छोड़ दिया गया था। 

साथ ही इस योजना में प्रथम बार भारतीय राज्यों को अपने भाग्य का निर्णय करने का अधिकार दिया गया था। . 

इसके अतिरिक्त संविधान-सभा के सभी सदस्य भारतीय होने थे। अंतरिम सरकार में सारे विभाग भारतीयों को दिए जाने थे और उन्हें दिन-प्रतिदिन के प्रशासन में काफी शक्तियां दी जानी थीं। इस प्रकार स्पष्ट शब्दों में भारतीयों को पहली बार अपने संविधान निर्माण में पूरी छूट और कॉमनवेल्थ छोड़ने का अधिकार दिया गया था। 

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कांग्रेस ने क्यों स्वीकार किया कैबिनेट मिशन की सिफारिशों को 

    कांग्रेस ने संविधान सभा के पूर्ण रूप से प्रभुत्वसंपन्न न होने की शिकायत करते हुए 25 जून 1946 को योजना को स्वीकार कर लिया था। मुसलिम लीग ने पहले 6 जून को पाकिस्तान की मांग न माने जाने के प्रति रोष प्रकट करते हुए स्वीकृति दे दी थी। 

सिक्खों द्वारा अलग स्वतंत्र सिक्ख राज्य की मांग

     1942 में सिक्ख प्रतिनिधिमंडल द्वारा क्रिप्स से मिलने के पश्चात् १९४५ में फिर जब पाकिस्तान की माँग की चर्चा हो रही थी, मास्टर तारासिंह और दूसरे सिक्ख नेताओं ने इस प्रकार बयान जारी करने आरम्भ कर दिए कि वे एक संयुक्त भारत के पक्ष में हैं परन्तु यदि पाकिस्तान की माँग को स्वीकार किया जाता है तो वे भी सिक्खों के लिए पृथक राज्य की स्थापना चाहेंगे। इन दिनों पंजाब कांग्रेस और पंजाब का साम्प्रदायिक हिन्दू नेतृत्व सिक्खों की इस माँग का अप्रत्यक्ष रूप से समर्थन यह सोचकर कर रहा था कि सिक्ख राज्य की मांग पाकिस्तान की माँग के प्रतिसंतुलन ( COUNTERWEIGHT )का कार्य करेगी। 

     कैबिनेट मिशन योजना द्वारा पाकिस्तान की मांग को अप्रत्यक्ष रूपमें स्वीकार किया जाने के कारण सिक्ख बहुत चिंतित थे। वे पाकिस्तान का विरोध करते हुए कह रहे थे कि यदि पाकिस्तान की मांग मानी जाती है तो वे स्वतंत्र सिक्ख राज्य लेकर रहेंगे। सिक्ख नेता इस बात से क्रोधित थे कि योजना द्वारा पूर्ण रूप से मुसलमानों की दया पर छोड़ दिया गया था और उन्हें वे अधिकार भी नहीं दिए गए जो योजना के भाग 15 (2) और 19 (7) द्वारा क्रमशः मुसलमानों और हिन्दुओं को दिए गए थे। किन्तु कांग्रेस कार्य समिति के विश्वास दिलाने पर कि उनके हितों की अंततः रक्षा की जाएगी, सिक्खों ने कैबिनेट मिशन योजना को स्वीकृति दे दी। 

अकालियों द्वारा पाकिस्तान की बजाय हिंदुस्तान में शामिल होने का सबसे महत्वपूर्ण कारण हिन्दुओं के साथ सिक्खों सामाजिक-सांस्कृतिक संबंध अथवा सामान्य विरासत का होना था। इस बात में कोई संदेह नहीं है। 

    मशहूर अंग्रेज इतिहासकार पी. ई. रॉबर्ट्स के अनुसार –“सिक्ख हिन्दुओं से अलग नस्ल नहीं है बल्कि एक समुदाय है।”

खुशवंत सिंह ने भी महाराजा रणजीतसिंह के जीवन वृतांत में लिखा है कि महाराजा ने केवल एक अपराध के लिए मृत्युदंड रखा हुआ था और वह था गौ-हत्या। इसी प्रकार महाराजा ने शाहशुजा की सहायता इस शर्त पर की थी कि वह अफगानिस्तान का सिंहासन प्राप्त करने के पश्चात् गौ-हत्या बंद करवायेगा। यूरोपियों को महाराजा इस शर्त पर नौकरी में रखते थे कि वे गाय का मांस खाना बंद कर देंगे। 

 

   यह सत्य है कि 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने, 19वीं शताब्दी में आर्यसमाज आंदोलन ने और 20वीं शताब्दी में सिंह-सभा आंदोलन ने हिन्दुओं और सिक्खों में किसी सीमा तक फूट दाल दी थी। 6 जुलाई, 1946 को कलकत्ता में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवाहरलाल नेहरू ने ने यहाँ तक कह दिया था कि भारत के उत्तर में सिक्खों को एक अलग राज्य दिए जाने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं होगी जहाँ से वे भी स्वतन्त्रता का आनंद ले सकें। हिन्दू महासभा ने योजना के प्रति अपनी प्रतिक्रिया में भविष्य में पाकिस्तान की स्थापना का भय व्यक्त किया। साम्यवादी दल को योजना में साम्प्रदायिक उपबंधों के प्रति आपत्ति थी। 

कैबिनेट मिशन योजना के अनुसार संविधान-सभा के चुनाव 

योजना को स्वीकार किये जाने बाद संविधान-सभा के लिए चुनाव कराए गए जिसमें कांग्रेस ने 210 में 199 सामान्य स्थान प्राप्त किये। ब्रिटिश भारत के 296 स्थानों में से कांग्रेस ने 211 स्थान और मुस्लिम लीग ने 73 स्थान प्राप्त किये। जिन्ना चुना के परिणाम से खुश थे और कांग्रेस के अंध बहुमत ( brute majority ) से चिंतित थे। उन्होंने एक पृथक संविधान-सभा की मांग आरम्भ कर दिया और मिशन के समक्ष यह दोहराना आरम्भ कर दिया कि हिन्दू और मुसलमानो को एक राष्ट्र नहीं समझा जा सकता। कैबिनेट मिशन द्वारा प्रोत्साहित न किये जाने पर लीग ने मुसलिम विधायकों की एक सभा का आयोजन किया जिसमें दिए भाषणों में हिंसा की खुली धमकी दी गई। 

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 कैबिनेट मिशन योजना क्यों असफल रही 

    29 जून, 1946 को लीग ने कैबिनेट योजना को रद्द कर दिया और ‘सीधी कार्रवाई’ ( डायरेक्ट एक्शन ) की धमकी दी जिसका अर्थ दंगे-फसाद करवाना था। यह कार्रवाई सरकार के विपरीत न होकर हिन्दुओं और सिक्खों के विपरीत थी जिसके परिणामस्वरूप पंजाब और बंगाल से जान-माल की बड़ी हानि हुई थी। इसके अतिरिक्त मिशन द्वारा प्रारम्भ की गई अंतरिम सरकार के निर्माण की बात विफल हो गई थे और सरकार का निर्माण न हो सका था। इस प्रकार कैबिनेट मिशन विफल हो गया था। इस विफलता का एक कारण यह भी माना जाता है कि मिशन के सदयों में कांग्रेस और लीग की भूमिका के बारे में विचारों का मतभेद था और वे दोनों में से किसी एक को भी प्रसन्न न कर सके थे। इसलिए 29 जून 1946 को मिशन के सदस्य इंग्लैंड रवाना हो गए। 

अंतरिम सरकार के गठन के प्रयास 

     कैबिनेट मिशन ने गवर्नर-जनरल को शीघ्र ही भारतीय राजनैतिक दलों को बुलाकर एक अंतरिम सरकार के निर्माण की शक्ति दे दी थी। कांग्रेस ने लार्ड वेवेल की इस पेशकश को इसलिए ठुकरा दिया कि मिशन ने अपने बयान में सरकार के निर्माण में हिन्दुओं और मुसलमानोंमें बराबरी ( parity ) की बात कही थी।  चूँकि हिन्दुओं में हरिजन भी शामिल थे ( कांग्रेस शायद हरिजनों को राजनैतिक भागीदारी नहीं देना चाहती थी ), इसलिए पेशकश वेवेल योजना से भी से भी घटिया थी। इसी प्रकार वेवेल ने 16 जून 1946 को मुसलमानों को छोड़कर कांग्रेस सरकार बनाने का प्रयत्न किया क्योंकि लीग अपने को उनका ( मुसलमानों ) प्रतिनिधि मानती थी जिसे कांग्रेस ने रद्द कर दिया। 

      इस समय लीग ने कांग्रेस को छोड़कर दूसरे दलों के साथ सरकार बनाने का प्रयत्न किया परन्तु सरकार इसके लिए सहमत न थी। अब वाइसराय ने अंतरिम सरकार के गठन के लिए कांग्रेस को निरमंत्रित करने का निर्णय किया और मुस्लिम लीग को शामिल करने की बात भविष्य की घटनाओं पर छोड़ दी। 

 मुस्लिम लीग द्वारा सीधी कार्यवाही दिवस  6 अगस्त 1946

जिन्ना ने नेहरू के साथ सहयोग  करने से इंकार कर दिया और 6 अगस्त को ‘सीधी कार्रवाई’ दिवस घोषित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप जो दंगे हुए विशेष रूप से कलकत्ता में हज़ारों लोग मारे गए। 

       लॉर्ड पैट्रिक लॉरेंस के अनुसार, कोलकाता में 5000 लोगों की मौत हुई और 15 हजार लोग गंभीर रूप से घायल हुए। 

     लार्ड वेवेल ने अब लीग को शामिल कर एक संयुक्त सरकार बनाने का सुझाब दिया।  लीग 3 अक्टूबर 1946 को पांच सदस्यों के साथ सरकार में शामिल हो गई। कांग्रेस टीम के सदस्यों – शरत चंद्र बोस, शफात अहमद खान और सैयद अली जहीर को सरकार में मुस्लिम लीग के पांच प्रतिनिधियों को शामिल करने के लिए अपना स्थान छोड़ना पड़ा। परन्तु संविधान सभा में शामिल होने का वचन न दिया। पत्रोत्तर से पता चलता है कि तीनों पक्ष भ्रमित थे। कांग्रेस का मत था कि इस प्रकार वह लीग को सहयोग के लिए मना लेगी, दूसरी ओर लीग का मत था कि उसके लिए पाकिस्तान के लिए लड़ना आसान हो जायेगा और वेवेल को यह आशा थी कि दोनों को उन पर निर्भर रहना होगा। 

निष्कर्ष 

  अंततः मुस्लिम लीग का रोष यह जानकर भड़क उठा कि वाइसराय ने 9 दिसंबर 1946 को संविधान सभा बुलाने का निश्चय किया है।  कांग्रेस ने यह मांग प्रस्तुत की कि या तो लीग कैबिनेट मिशन को स्वीकृत कर संविधान सभा में शामिल हो जाये अथवा वह अंतरिम सरकार से निकल जाये। जिन्ना ने संविधान सभा में शामिल होने से इंकार कर दिया। इसलिए भारत सचिव ने दोनों दलों को वाइसराय सहित 3 से 6 दिसंबर 1946 के बीच बातचीत के लिए लन्दन बुलाया परन्तु बातचीत विफल हो गई। गृह सर्कार ने मुसलिम लीग की यह माँग, कि पहले देश का बंटवारा होना चाहिए, मान ली परन्तु कांग्रेस को यह शर्त मंजूर न थी।  निर्धारित तिथि के अनुसार संविधान सभा का अधिवेशन 9 दिसंबर 1946 को हुआ परन्तु लीग के 73 सदस्य इसमें शामिल नहीं हुए। जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को लीग के सदस्यों से त्याग-पत्र मांग लिए जिसके परिणामस्वरूप दंगे हुए और अराजकता की सी स्थिति उत्पन्न हो गई।   

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