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B.R.Ambedkar-वो भीमराव अम्बेडकर जिन्हें आप नहीं जानते होंगे-अम्बेडकर जयंति 2022 पर विशेष

B.R.Ambedkar-वो भीमराव अम्बेडकर जिन्हें आप नहीं जानते होंगे

      आज इस ब्लॉग में हम  बात रहे हैं हैं भारत का संविधान बनाने वाले बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की। उनकी ज़िंदगी से जुड़े कुछ अद्भुद किस्से हम आपके लिए इस ब्लॉग में लेकर आये हैं जिन्हें पढ़कर आपको पता चलेगा बाबा साहब इतने महान क्यों हैं ?

 

B.R.Ambedkar-वो भीमराव अम्बेडकर जिन्हें आप नहीं जानते होंगे

 

     यह एक दिलचस्प बात है कि भारत की दो महान शख्शियतों भीमराव अम्बेडकर और महात्मा गाँधी के बीच कभी नहीं बनीं। दोनों महान व्यक्तियों के बीच कई मुलाकाते हुईं लेकिन वो अपने मतभेदों को कभी दूर नहीं कर पाए। आज़ादी से दो दशक पहले अम्बेडकर ने अपने आपको अपने अनुयायियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से अलग-थलग कर लिया।

     अछूतों के प्रति गाँधी के अनुराग और उनकी तरफ से बोलने के उनके दावे को अम्बेडकर एक जोड़-तोड़ की रणनीति मानते थे। जब 14 अगस्त 1931 को गाँधी से अम्बेडकर की मुलाकात हुयी थी तो गाँधी ने उनसे कहा था —

      “मैं अछूतों की समस्याओं के बारे में तब से सोच रहा हूँ जब आप पैदा भी नहीं हुए थे, मुझे ताज्जुब है कि इसके बाबजूद आप मुझे उनका हितैषी नहीं मानते ?”

      धनंजय कीर अम्बेडकर की जीवनी लेखक  ‘डॉक्टर अम्बेडकर लाइफ एंड मिशन’ में लिखते हैं
“अम्बेडकर ने गाँधी से कहा अगर आप अछूतों के ख़ैरख़्वाह होते तो आपने कांग्रेस का सदस्य होने के लिए खादी पहनने की शर्त की बजाय अस्पृश्यता निवारण को पहली शर्त बनाया होता।  किसी भी व्यक्ति को जिसने अपने घर में कम से कम एक अछूत व्यक्ति या महिला को नौकरी नहीं दी हो या उसने एक अछूत व्यक्ति के पालन-पोषण का बीड़ा न उठाया हो या उसने काम से कम सप्ताह में एक बार किसी अछूत व्यक्ति के साथ खाना न खाया हो, तो उसे कांग्रेस का सदस्य बनने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए थी।”

      आगे अम्बेडकर  ने  कहा —

      “आपने कभी भी किसी जिला कांग्रेस पार्टी अध्यक्ष को पार्टी से निष्कासित नहीं किया जो मंदिरों में अछूतों के प्रवेश का विरोध करते देखा गया हो।”

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26 फरवरी 1955 में जब बीबीसी ने अम्बेडकर से गाँधी के बारे में उनकी राय जननी चाही तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा —-  

    “मुझे इस बात पर काफी हैरानी होती है कि पश्चिम गाँधी में इतनी दिलचस्पी क्यों लेता है ? जहाँ तक भारत की बात है देश के इतिहास का एक हिस्सा भर हैं, कोई  युग निर्माणकर्ता नहीं। गाँधी की यादें इस देश के लोगों के जहन से जा चुकी हैं।”

अम्बेडकर थे अपने ज़माने के सबसे अधिक पढ़े-लिखे भारतीय

          अम्बेडकर अपने जमाने में भारत के सम्भवतः सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। अम्बेडकर ने बम्बई के प्रसिद्ध एल्फिंस्टन कॉलेज से बीए. की डिग्री हासिल की। बाद में कोलंबिया विश्वविद्यालय लंदन स्कूल ऑफ़ इकनोमिक से पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। शुरू से ही उन्हें पढ़ने खेती-बागवानी करने और कुत्ते पालने का शौक़ था। उस ज़माने में उनके पास किताबों  में सबसे बेहतरीन संग्रह था। मशहूर पुस्तक ‘इनसाइड एशिया के लेखक जॉन गुंथेर ने लिखा है —

        “जब 1938 में मेरी राजगृह में अम्बेडकर से मुलाकात हुई थी तो उनके पास 8000 किताबें थीं। उनकी मृत्यु तक ये संख्या बढ़ कर 35000 हो चुकी थी।”


बाबा साहब अम्बेडकर के निकट सहयोगी रहे शंकरानंद शास्त्री अपनी पुस्तक ‘माय  एक्सपिरियंसेस एंड मेमोरीज ऑफ़ बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर’ में लिखते हैं —
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         “मैं रविवार 20 दिसम्बर, 1944 को दोपहर एक बजे अम्बेडकर से मिलने उनके घर गया। उन्होंने मुझे  अपने साथ जामा मस्जिद इलाके में चलने के लिए कहा। वो इन दिनों पुरानी किताबें खरीदने का अड्डा हुआ करता था। मैंने उनसे कहने की कोशिश की कि दिन के खाने का समय हो रहा है, लेकिन उन पर इसका कोई असर नहीं हुआ।”

       जमा मस्जिद में होने की खबर चारों तरफ फ़ैल गई और लोग उनके चारों ओर इकट्ठा होने लगे।  इस भीड़ में भी उन्हें विभिन्न विषयों पर करीब दो दर्जन किताबें खरीदी। वो अपनी किताबें किसी को भी पढ़ने के लिए उधार नहीं देते थे। वो कहा करते थे कि -‘अगर  किसी को उनकी किताबें पढ़नी हैं तो उनको उनके पुस्तकालय में आकर पढ़ना चाहिए।’ किताबों के प्रति उनका प्रेम इस हद तक था कि वह सुबह होने तक किताबों में ही लीन रहते थे।

अम्बेडकर के एक और अनुयायी नामदेव निमगड़े अपनी किताब ‘इन दी टाइगर शैडो – दी ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ एन अम्बेडकराइड’  में लिखते हैं —
‘रात में अम्बेडकर अपनी पढाई में इतने खो जाते थे कि उन्हें बहरी दुनिया का कोई ध्यान नहीं रहता था। एक बार देर रात मैं उनके स्टडी रूम में गया और उनके पैर छू लिए। किताबों में डूबे अम्बेडकर बोले ‘टॉमी ये मत करो,’ मैं थोड़ा अचम्भित हुआ। जब बाबा साहब ने अपनी आंख ऊपर उठाई तो मुझे देख कर वो झेंप गए। वो पढ़ने में इतने ध्यानमग्न थे कि उन्होंने मरे स्पर्श को कुत्ते का स्पर्श समझ लिया।’,


अम्बेडकर  की जीवनी लिखने वाले धनंजय कीर लिखते हैं
‘अम्बेडकर पूरी रात पढ़ने के बाद भौर में सोते थे। सिर्फ 2 घंटे सोने के बाद वो थोड़ी कसरत करते थे। उसके बाद वो नहाने के बाद नाश्ता किया करते थे। अख़बार पढ़ने के बाद अपनी कार से कोर्ट जाते थे। इस दौरान वो उन किताबों को पलट रहे होते थे जो उस दिन उनके पास डाक से आयी होती थीं। कोर्ट का काम समाप्त कर वो किताबों की दुकान का चक्कर लगाया करते थे। और जब वे शाम को घर लौटते थे तो उनके हाथ में नई किताबों का एक बंडल हुआ करता था।

        जहाँ तक बागवानी का प्रश्न है तो दिल्ली में उनसे अच्छा और दर्शनीय बगीचा किसी के पास नहीं था। एक बार ब्रिटिश अख़बार डेली मेल ने भी उनके गार्डन की तारीफ की थी। वो अपने कुत्तों को भी बहुत पसंद करते थे। एक बार अम्बेडकर ने बताया था कि किस तरह उनके पालतू कुत्ते की मौत हो जाने के बाद वो फूट-फुट कर रोये थे।

     कभी कभी छुट्टियों में बाबा साहब खुद खाना बनाया करते थे और लोगों को अपने साथ खाने के लिए आमंत्रित किया करते थे। अम्बेडकर के साथ काम कर चुके देवी दयाल लिखते हैं —

           “3 सितम्बर 1944 को उन्होंने अपने हाथ से खाना बनाया और सात पकवान बनाये, इसे बनाने में उन्हें तीन घंटे लगे। उन्होंने खाने पर ‘दक्षिण भारत अनुसूचित  फेडरेशन’ की प्रमुख मीनांबल सिवराज को बुलाया। वो ये सुनकर दंग रह गयीं कि भारत की एक्सक्यूटिव कौंसिल के लेबर सदस्य ने उनके लिए अपने हाथों से खाना बनाया है। बाबा साहब को मूली और सरसों का साग पकाने का बहुत शौक था।

       बाबा साहब अम्बेडकर को किसी तरह के नशे का शौक नहीं था और न ही वे धूम्रपान किया करते थे। एक बार जब उन्हें खांसी हो रही थी तो मैंने उन्हें पान खाने का सुझाव दिया। उन्होंने मेरे कहने से पान खाया तो जरूर पर अगले ही पल यह कहते हुए उसे थूक दिया कि -यह बहुत कड़वा है। वह बहुत साधारण खाना खाते थे। उनके भोजन में बाजरे की एक छोटी रोटी, थोड़ा चावल, दही और मछली के तीन टुकड़े हुआ करते थे।

       घर पर सुदामा को आंबेडकर के काम में मदद के लिए रखा गया था। एक दिन सुदामा जब देर रात फिल्म देखकर लौटे तो उन्होंने सोचा घर में घुसने पर बाबा साहब के काम में बाधा होगी जो कि उस समय पढ़ने में तल्लीन थे वो दरबाजे के बाहर ही जमीन पर सो गए। आधी रात के बाद जब अम्बेडकर ताज़ी हवा लेने बाहर निकले तो उन्होंने दरबाजे के बाहर सुदामा को सोते पाया वो बिना आवाज किये अंदर चले गए। जब अगले दिन सुदामा की नींद खुली तो उन्होंने पाया कि बाबा साहब ने उनके ऊपर अपना ओवरकोट दाल दिया है।

जब भगवद गीता की आलोचना करने पर जुगल किशोर बिड़ला विरोध करने अम्बेडकर के घर आये  

     31 मार्च 1950  मशहूर उद्योगपति घनश्यामदास बिड़ला के बड़े भाई जुगल किशोर बिड़ला  अम्बेडकर से मिलने उनके निवास स्थान पर आये। कुछ दिनों पहले बाबा साहब ने मद्रास में पेरियार की उपस्थिति में हज़ारों लोगों के सामने भागवद  गीता की आलोचना की थी। बाबा साहब के सहयोगी रहे शंकरानंद शास्त्री अपनी किताब ( पूर्वोक्त )  में लिखते हैं —

          “बिड़ला  ने उनसे सवाल किया कि आपने गीता की आलोचना क्यों की ? जो कि हिन्दुओं की सबसे बड़ी धार्मिक किताब है। उनको इसकी आलोचना  करने की बजाय हिन्दू धर्म को मजबूत करना चाहिए था। जहां तक छुआछूत को दूर करने की बात है तो वो इसके लिए दस लाख रूपये देने के लिए तैयार हैं।”


इसका जवाब देते हुए अम्बेडकर ने कहा था–“मैं अपने आपको किसी को बेचने के लिए पैदा नहीं हुआ हूँ। मैंने गीता की इसलिए आलोचना की थी, क्योंकि इसमें समाज को बाँटने की शिक्षा दी गई है।”

     बाबा साहब मौज-मस्ती के लिए कभी बाहर नहीं जाते थे।  उनके सहयोगी रहे देवी दयाल लिखते हैं —
हालाँकि वो जिमखान क्लब के सदस्य थे पर शायद ही वो कभी वहां गए हों। जब भी वो अपनी कार से अपने घर लौटते थे तो वो सीधे अपने पढ़ने की मेज पर जाते थे। उनके पास अपने कपड़े बदलने का बह समय नहीं रहता था।
एक बार वो एक फिल्म ‘ए टेल ऑफ टू सिटीज’ देखने गए। उसे देखते समय उनके मन में कोई विचार आया और वो फिल्म बीच में ही छोड़कर चले गए और घर लौटकर उन विचारों को लिखने लगे। वो घर के बाहर खाना नहीं पसंद करते थे। जब भी कोई उन्हें बाहर खाने पर ले जाना चाहता था तो बाबा साहब का जवाब होता था अगर मुझे दावत ही देनी है तो मेरे लिए घर पर ही खाना ले आओ, मैं घर से बाहर जाने वाला नहीं। बाहर जाने और बापस आने और व्यर्थ की बातों में मेरे कम-से कम एक घंटा बर्बाद होगा। इस समय इस का उपयोग मैं कुछ बेहतर काम के लिए करना चाहूंगा।

       अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में बाबा साहब ने वायलिन सीखना शुरू किया था। उनके सचिव रहे नानक चंद रत्तू किताब – ‘लास्ट फ्यू इयर्स ऑफ़ डॉ. अम्बेडकर’ में लिखते हैं —

        एक दिन मैंने उनके बंद कमरे में चुपके से झाँक कर एक अद्भुद नजारा देखा था। बाबा साहब दुनिया की चिंताओं से दूर अपने आप में मग्न कुर्सी पर बैठे वायलिन बजा रहे थे। मैंने जब ये बात घर में काम करने वाले लोगों को बताई तो सबने बारी-बारी से जाकर वो अद्भुद नज़ारा देखा हुए आनंद लिया।    


तो ये थे अम्बेडकर के जीवन से जुड़े कुछ प्रसिद्ध किस्से जो हम आपके लिए यहाँ लेकर आये। उम्मीद है आपको ये जरूर पसंद आये होंगे। अगर आपको ये पसंद आया हो तो अपने मित्रों के साथ इसे अवश्य शेयर कीजिये धन्यवाद। जयभीम जय भारत।  

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