पृथ्वीराज चौहान जिसने मुहम्मद गौरी को 17 बार हराया-पृथ्वीराज चौहान की वीरता के अद्भुद किस्से।

वॉलीबुड पहले से ही ऐतिहासिक घटनाओं और पात्रों को लेकर फिल्म बना चुका है। अब इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए वॉलीबुड के मशहूर कलाकार अक्षय कुमार की फिल्म ,पृथ्वीराज’ इस शुक्रवार को पर्दे पर आ रही है। यह फिल्म पृथ्वीराज चौहान की वीरता को दर्शाने के लिए बनाई गई है।पृथ्वीराज चौहान जिसने मुहम्मद गौरी को 17 बार हराया-पृथ्वीराज चौहान की वीरता के अद्भुद किस्से।

पृथ्वीराज चौहान जिसने मुहम्मद गौरी को 17 बार हराया-पृथ्वीराज चौहान की वीरता के अद्भुद किस्से।
IMAGE CREDIT-https://navbharattimes.indiatimes.com

अगर आप इस फिल्म को देखना चाहते हैं तो उसे पहले हम इस लेख में आपको पृथ्वीराज चौहान की वीरता से जुड़े अद्भुद किस्से बताने जा रहे हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि अपनी ऑंखें खो देने के बाद भी सम्राट चौहान ने मुहम्मद गौरी की जान ली थी।पृथ्वीराज चौहान जिसने मुहम्मद गौरी को 17 बार हराया-पृथ्वीराज चौहान की वीरता के अद्भुद किस्से।

पृथ्वीराज चौहान जिसने मुहम्मद गौरी को 17 बार हराया-पृथ्वीराज चौहान की वीरता के अद्भुद किस्से।

सम्राट पृथ्वीराज चौहान परिचय

सम्राट पृथ्वीराज चौहान चौहान अथवा चहमान वंश के हिन्दू क्षत्रिय शासक थे जो दिल्ली और अजमेर पर शासन करते थे। सम्राट पृथ्वीराज चौहान का जन्म 1166 ईस्वी में अजमेर के शासक सोमेश्वर चौहान के घर हुआ था। पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही बहुत प्रतिभाशाली थे। पृथ्वीराज चौहान की मां का नाम कर्पूरी देवी था जो दिल्ली के शासक अनंगपाल द्वितीय की एकमात्र बेटी थीं। पृथ्वी पृथ्वीराज चौहान ने मात्र 13 वर्ष की आयु में खुदको अजमेर के राजगढ़ की गद्दी पर पाया जब उनके पिता की मृत्यु हो गई।

बचपन से ही थे कुशल योद्धा

पृथ्वीराज चौहान में बचपन से ही अदम्य साहस था और उन्होंने युद्ध कला खुदको पारंगत कर लिया था। बचपन से ही प्रतिभा के धनी पृथ्वीराज ने खुदको एक योद्धा के रूप में विकसित कर लिया था। पृथ्वीराज चौहान में योद्धा और शासक के सभी गुण मौजूद थे जिन्हें सुनकर दिल्ली के शासक और उनके नाना अनंगपाल बहुत प्रभावित हुए। इस प्रकार दिल्ली की गद्दी के लिए पृथ्वीराज चौहान को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया गया। पृथ्वीराज की वीरता के किस्सों कहानी भी प्रचलित है कि उन्होंने एक बार निहत्थे शेर को मार डाला था।

दिल्ली के सम्राट के रूप में पृथ्वीराज चौहान

दिल्ली शासक बनने के बाद उन्होंने राय पिथौरा की उपाधि ग्रहण की और राय पिथौरा के किले का निर्माण काराया। पृथ्वीराज चौहान गुजरात शक्तिशाली शासक भीम देव को मात्र 13 वर्ष की आयु में पराजित कर दिया था। पृथ्वीराज चौहान सिर्फ योद्धा ही नहीं बल्कि विद्वान भी थे, उन्हें छः भाषाओँ का ज्ञान था –संस्कृत, प्राकृत, मागधी, पैशाची, शौरसेनी और अपभ्रंश। इसके अतिरिक्त वे मीमांसा, वेदांत, गणित, इतिहास, सैन्य विज्ञान चिकित्साशास्त्र के भी ज्ञाता थे।

पृथ्वीराज चौहान की सेना

पृथ्वीराज चौहान के पास एक शक्तिशाली सेना थी। इतिहासकारो के अनुसार उनकी सेना में 300 हाथी तथा 3,00,000 पुरुषों की सेना थी। उनकी सेना में घुसवारों की संख्या भी काफी थी। मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित शक्तिशाली सम्राट पृथ्वीराज चौहान का साम्राज्य दिल्ली राजस्थान और हरियाणा तक फैला हुआ था। पृथ्वीराज चौहान बचपन से ही तीरंदाजी और युद्ध कौशल में प्रवीण थे।

पृथ्वीराज चौहान और संयोगिता का किस्सा

पृथ्वीराज चौहान को कन्नौज के शासक जयचंद की बेटी संयोगिता से प्यार हो गया। जिसके कारण कन्नौज और दिल्ली के बीच शत्रुता पनप गई।

जयचंद ने संयोगिता का स्वयंवर आयोजित किया पृथ्वीराज चौहान को आमन्त्रित नहीं किया। परिणामस्वरूप पृथ्वीराज चौहान ने स्वयंवर से ही संयोगिता अपहरण कर लिया और गंधर्भ विवाह किया। इसके बाद जयचंद और पृथ्वीराज के बीच दुश्मनी और ज्यादा कठोर हो गई।

पृथ्वीराज और चंदबरदाई

कहा जाता है कि पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई बचपन के मित्र थे। आगे चलकर चंदबरदाई एक कवि और लेखक के रूप में प्रसिद्द हुए। पृथ्वीराज चौहान की वीरता को चंदबरदाई ने अपने ग्रन्थ ‘पृथ्वीराज रासो’ में वर्णित किया।

पृथ्वी राज चौहान और मुहम्मद गौरी

पृथ्वी राज चौहान और मुहम्मद गौरी गौरी के बीच 1191 ईस्वी में तरायन का प्रथम युद्ध हुआ जिसमें मुहम्मद गौरी बुरी तरह पराजित हुआ। पृथ्वीराज चौहान और मुहम्मद गौरी का युद्ध के दौरान 17 बार आमना-सामना हुआ और हर बार गौरी को पराजय झेलनी पड़ी। कई मौकों पर पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी की जान बख्स दी थी।

तरायन का दूसरा युद्ध 1192

निरंतर पराजयों से बिचलित मुहम्मद गौरी को कन्नौज के शासक जयचंद का सहारा मिला और 1192 में तराइन के दूसरे युद्ध में पृथ्वीराज पर विजय प्राप्त करने में सफलता हासिल की। पृथ्वीराज चौहान को कैद करके गजनी ले जाया गया उसके साथ चंदबरदाई को भी कैद कर लिया गया। मुहम्मद गौरी ने गर्म लोहे की सलाखों से पृथ्वीराज चौहान की दोनों आँखों को फोड़ दिया।

पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई को मुहम्मद गौरी के सामने दरबार में लाया गया जहाँ गौरी ने पृथ्वीराज से उसकी अंतिम इच्छा पूछी। चंदबरदाई ने मुहम्मद गौरी से कहा की मेरे स्वामी तीरंदाजी में बहुत प्रवीण हैं और अपनी कला प्रदर्शन करना चाहते हैं। मुहम्मद गौरी ने इज़ाजत दे दी।

जिस स्थान पर पृथ्वीराज चौहान को अपनी कला का प्रदर्शन करना था उस समय वहां मुहम्मद गौरी भी उपस्थित था। चंदरबरदाई और पृथ्वीराज चौहान पहले ही एक गुप्त योजना तैयार कर चुके थे ताकि मुहम्मद गौरी को मार सकें। जब पूरी महफ़िल इकट्ठी हो गई तब पृथ्वीराज चौहान ने एक दोहा कहना शुरू किया कि ‘चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण, ता ऊपर सुल्तान है मत चूक रे चौहान’।

    पृथ्वीराज चौहान इस दोहे का अर्थ समझ गया। इस दोहे को सुनकर मुहम्मद गौरी के मुंह से वाह -वाह शाब्बास निकला। मुहम्मद गौरी को ये नहीं पता था कि पृथ्वीराज चौहान बिना आँखों के भी सटीक निशाना लगाने में माहिर था। देखते ही देखते पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी की छाती में तीर घुसेड़ दिया।

इसके बाद पृथ्वीराज चौहान और चंदबरदाई ने एकदूसरे को चाकू मारकर अपने प्राण त्याग दिए ताकी दुश्मनों के द्वारा होने वाली दुर्गति से बचा जा सके। पृथ्वीराज चौहान की मृत्यु की खबर सुनकर संयोगिता ने भी अपने प्राण त्याग दिए।

    हम यह बात भी स्पष्ट करना चाहते हैं कि ऐतिहासिक रूप से इस घटना की पुष्टि नहीं होती, क्योंकि इतिहास की किताबों में स्पष्ट रूप से मुहम्मद गौरी की मृत्यु का वर्ष 1206 है। लेकिन फिर भी इस घटना की किवदंती से स्पष्ट है कि पृथ्वीराज चौहान एक बहादुर और शक्तिशाली शासक था।

RAD THIS ARTICLE IN ENGLISH- Prithviraj Chauhan who defeated Muhammad Ghori 17 times – Amazing tales of Prithviraj Chauhan’s valor.

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