ऐतिहासिक रूप से मथुरा कला शैली की प्रमुख विशेषताएं

ऐतिहासिक रूप से मथुरा कला शैली की प्रमुख विशेषताएं


     भारत में कुषाणकालीन शासकों ने कला को बहुत प्रोत्साहन दिया। कुषाण काल में मथुरा कला एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। मथुरा में उस काल में अनेक स्तूपों, विहारों, एवं मूर्तियों का निर्माण करवाया गया। कुषाण काल में मथुरा के शिल्पकार विश्वभर में प्रसिद्ध हो चुके थे। 

                                                                                                                   कुषाण काल में निर्मित बौद्ध विहार और मूर्तियों को ब्राह्मणों ने या तो नष्ट कर दिया अथवा उन्हें हिन्दू धर्म जो जोड़कर उनका रूप बदल दिया।  दुर्भाग्यवश आज वहां एक भी विहार शेष नहीं बचा है। लेकिन खुदाई में हमें अनेक हिन्दू, बौद्ध एवं जैन मूर्तियां प्राप्त हुयी हैं। यहां से प्राप्त मूर्तियां अधिकांश कुषाण काल की हैं।

                                                   

  • मथुरा कला का सबसे ज्यादा विकास कुषाण शासक कनिष्क, हुविष्क तथा वासुदेव के समय में हुआ। 
  •  प्रारम्भ में यह माना जाता था कि मथुरा की बौद्ध मूर्तियां यूनानी कला से प्रेरित हैं और उनकी नकल हैं। 
  •  लेकिन नवीन शोध यह सिद्ध करते हैं कि मथुरा कला शैली गंधार कला शैली से पूर्णतया भिन्न एक स्वतंत्र शैली है। 
  •  मथुरा कला शैली पूर्णतया भारतीय आधार पर आधारित है।


यक्षिणी- मथुरा चित्रकला
यक्षिणी- मथुरा चित्रकला-फोटो स्रोत विकिपीडिया 

       ‘वासुदेव शरण अग्रवाल के अनुसार सर्वप्रथम मथुरा में ही बुद्ध मूर्तियों का निर्माण किया गया जहाँ इसके लिए पर्याप्त धार्मिक उपलब्ध था।”

  • इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में सर्वप्रथम बुद्ध की मूर्तियां जिस शैली में निर्मित हुईं उसे मथुरा कला शैली के नाम से जाना जाता है ।
  • ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में मथुरा भक्ति कला का प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित हुआ।
  • कनिष्क  शासनकाल में बौद्ध धर्म की महायान शाखा को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया।
  • महायान सम्प्रदाय बुद्ध को देवता मानकर उसकी पूजा करते थे लेकिन अब बौद्धों ने उनकी मूर्ति बनाकर पूजा प्रारम्भ कर दी।
  • मथुरा से मिली कुछ मूर्तियों पर कनिष्क सम्वत की प्रारम्भिक तिथियों के लेख खुदे पाए गए हैं।
  • मथुरा की बुद्ध प्रतिमाएं यक्ष प्रतिमाओं ( विशेषकर परखम यक्ष जैसी बड़ी प्रतिमाओं ) से प्रेरित हैं।
  • मथुरा से बुद्ध की बैठी तथा खड़ी दोनों प्रतिमाएं मिली हैं जिनमें बुद्धा का व्यक्तित्व चक्रवर्ती तथा योगी रूप में दीखता है।
  • बुद्ध मूर्तियों में कटरा से प्राप्त बुद्ध मूर्ति का विशेष महत्व है जिसे चौकी पर उत्कीर्ण लेख में बोधिसत्व की संज्ञा दी गयी है। इसमें बुद्ध को भिक्षु वेश  धारण किये दिखाया गया है।      
  • “कटरा से प्राप्त इस बौद्ध मूर्ति की विशेषता है कि बौद्ध को बोधिवृक्ष के नीचे सिंहासन पर विराजमान यानि बैठा हुआ दिखाया गया है। इस मूर्ति में बुद्ध का दांया हाथ अभय मुद्रा में ऊपर उठा  हुआ है। उनकी हथेली तथा तलवों पर धर्मचक्र तथा त्रिरत्न के चिन्ह बनाये गए हैं।बुद्ध के दोनों ओर चामर लिए हुए पुरुष है तथा ऊपर से देवता बुद्ध के ऊपर पुष्पवर्षा कर रहे हैं”

  • मथुरा से जो मूर्तियां प्राप्त हुईं हैं उनके निर्माण में सफ़ेद, चित्तीदार, लाल एवं रवादार पत्थर का प्रयोग हुआ है जिसके कारण ये बेहद आकर्षक दिखाई देती हैं। 
  • गंधार मूर्तियों के विपरीत मथुरा साहिली की मूर्तियां आध्यात्मिकता एवं भावना प्रधान हैं। 
  • वेदिका स्तम्भों परअनेक मूर्तियों को उकेरा गया है। इसके अतिरिक्त बुद्ध के पूर्व जन्म  से संबंधित कथाओं को भी स्तम्भों पर उकेरा गया है। मथुरा कला के कुशल कलाकारों द्वारा बुद्ध के जीवन से जुड़े विभिन्न प्रसंगों यथा -जन्म, अभिषेक, महाभिनिष्क्रमण, सम्बोधि, धर्म-चक्रप्रवर्तन, महापरिनिर्वाण आदि को बेहद मनमोहक तरिके से दर्शाया गया है। 
  • मथुरा की कुछ मूर्तियों में गंधार मूर्तियों के लक्षण दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि मथुरा कला के कारीगरों ने ईरानी तथा यूनानी कला के कुछ प्रतीकों को ग्रहण किया था। जैसे बुद्ध की कुछ मूर्तिओं में उन्हें चप्पल पहने तहा मूंछ के साथ दर्शाया गया है। 
  • कुछ मूर्तियां महाभारत के प्रसंगों से जुडी दिखाई  हैं तो कुछ बुद्ध के उपासकों से भी जुडी हैं। 
  • कनिष्क की एक सिर रहित मूर्ति भी मथुरा से प्राप्त हुई है जिससे कनिष्क की ऐतिहासिकता प्रमाणित होती है। 
  •  “कनिष्क की मूर्ति पर ‘महाराजा देवपुत्रों कनिष्कों’ अंकित है” 
  • कनिष्क की मूर्ति की विशेषताएं हैं – यह 5 फुट 7 इंच ऊँची, कनिष्क ने घुटनों तक कोट पहना है, पैरों में भरी जूते हैं, दांया हाथ गदा पर रखा हुआ है।बाएं हाथ में कनिष्क ने तलवार थामा हुआ है। 
  • मथुरा कला शैली के कलाकारों ने सिर्फ बौद्ध मूर्तियों का  नहीं किया बल्कि जैन और हिन्दू धर्म -विष्णु, सूर्य, शिव, कुबेर, नाग, यक्ष, तथा जैन तीर्थांकरों की मूर्तियां भी मिलती हैं। 
  • जैन मूर्तियां दो प्रकार की मुद्रा में मिली हैं –खड़ी कयोतसर्ग मुद्रा तथा बैठी हुयी पद्मासन मुद्रा में। 
  • तीर्थंकर की मुद्राओं पर वक्षस्थल पर ‘श्रीवत्स’ अंकित है। 
  • मथुरा कला शैली धर्मनिरपेक्ष थी। 

  •        “”कुषाणों के अधीन मथुरा कला भृहुत और सांची की पुरानी भारतीय कला की सीधी निरंतरता थी।”.” B. N. Puri -India under the Kushans page – 197

  • सारनाथ से मिली एक बौद्ध मूर्ति पर कनिष्क संवत 3 की तिथि अंकित है। 

     इस प्रकार मथुरा कला शैली ने बौद्ध धर्म के अतिरिक्त हिन्दू  और जैन धर्म से जुड़े पात्रों की भी मूर्तियां बनाई। मथुरा कला, धर्म और शिक्षा के केंद्र के रूप में स्थापित हुआ।  दुर्भाग्यवश धर्मांध लोगों ने बुद्ध से जुड़े विभिन्न ऐतिहासिक प्रतीकों को नष्ट कर भारत की प्राचीन धरोहर को नष्ट किया।


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