वैदिककालीन भाषा और काव्य: Rigvedickalin Bhasha Aur Kavy

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भारतीय सामाजिक परम्पराओं और साहित्य का प्रारम्भ वैदिककाल से ही माना जाता है। यद्यपि भारतीय सभ्यता का प्रारम्भ हड़प्पा सभ्यता से माना जाता है लेकिन आर्यों ने उनके स्थान पर जिस सभ्यता और संस्कृति को स्थापित किया वही आगे चलकर भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अंग बन गयी। क्या वैदिककाल की भाषा संस्कृत थी या कोई अन्य ? इसी प्रश्न का हल इस ब्लॉग के माध्यम से खोजने का प्रयास किया गया है।  

वैदिककालीन भाषा और काव्य: Rigvedickalin Bhasha Aur Kavy

 

वैदिककालीन भाषा और काव्य

 ऋग्वेद –

 शौनक की अनुक्रमणी के अनुसार ऋग्वेद में 10414 मन्त्र, 153826 शब्द, 432000 अक्षर हैं।  ऋचाओं की संख्या गिनने पर उन्हें 10467 पाया गया। ऋग्वेद का विभाजन दो प्रकार से किया गया है – एक में मण्डल, सूक्त और ऋचा के क्रम को रखा गया है। ऋग्वेद में 10 मण्डल, 1017 सूक्त और 10414 मन्त्र हैं। अष्टक, अध्याय और सूक्त के अनुसार दूसरी गणना होती है, जिसके अनुसार ऋग्वेद में 8 अष्टक, 64 अध्याय और 1017 सूक्त हैं।  मण्डल, अनुवाक और वर्ग के अनुसार गणना करने पर ऋग्वेद में 10 मण्डल, 84 अनुवाक और 2008 वर्ग ( बालखिल्य के 16 सूक्तों को छोड़कर ) पाए जाते हैं। वर्तमान समय में सबसे प्रचलित गणना मण्डल, सूक्त और ऋचा  के क्रम में है। 

1. ऋग्वेद के मंडलों की भाषा 

भिन्न-भिन्न मंडलों की भाषा देखने से पता लगता है, कि सभी की भाषा एक समान नहीं है। यह सर्वविदित है कि ऋग्वैदिक आर्य हिन्दू-यूरोपीय वंश की उस शाखा के अंतर्गत आते हैं, जिसमें ईरानी और शक-स्लाव आते हैं, और जिसे शतम-शाखा कहा जाता है। शतम शाखा की कोई भी जाति ‘टवर्ग’ नहीं बोल सकती। इसलिए सप्तसिंधु में आने वाले आर्य ‘टवर्ग’ (मूर्धन्यवर्ण ) नहीं बोल सकते थे, यह निश्चित है।

ऋग्वेद में टवर्गीय अक्षर रखने वाला कोई शब्द नहीं मिलता, पर मूर्धन्य वर्णों ((retroflex consonant) का  जरूर मिलता है। यह टवर्ग कब से आर्यों में प्रचलित हुआ ? निश्चय ही सप्तसिंधु की प्राचीन जाति के घनिष्ठ सम्पर्क से ही उच्चारण में यह परिवर्तन आया। आज भी द्रविड़ भाषा में टवर्ग की प्रचुरता उत्तरी भारत के कानों में खटकती है। 

सप्तसिंधु में आने के तीन सौ वर्ष बाद ऋग्वेद के महान ऋषि हुए। वह टवर्ग बोलते थे, यह कहना आसान नहीं है क्योंकि शताब्दियों तक ऋचाएं लिपिबद्ध नहीं हों कंठस्थ रखी गई थीं। मूल पालि त्रिपिटक (बुद्ध के सूक्त ) मागधी,-कोसली भाषा में रहे, जिसमें ‘ल’ और ‘श’ अक्षरों का प्राचुर्य और ‘र’ तथा ‘स’ अक्षरों का आभाव पाया गया है। पर वर्तमान पालि त्रिपिटिक में मागधी के इन विशेष अक्षरों का बायकाट सा देखा जाता है-‘श’ का तो बिलकुल ही प्रयोग नहीं होता।

इस परिवर्तन का कारण यही था, कि शतब्दियों तक बुद्ध के सूक्त मागधी भाषियों के नहीं, बल्कि पश्चिमी भाषियों –विशेषकर लाट गुजरात से गए उपनिवेशकों — के बोलचाल में रहे, जिनके कारण यह परिवर्तन हुआ। अतः यह देखकर हम नहीं कह सकते, कि ऋचाओं के रचने और उनके लिपिबद्ध होने के समय के बीच में अक्षरों का परिवर्तन नहीं हुआ होगा। 

वैदिक भाषा के प्रकांड विद्वान् डॉ० बटेकृष्ण घोष ने ऋग्वेद के अक्षरों और उनके उच्चारण पर गहन विवेचन किया है। मूर्धन्य वर्णों का प्रचार आर्यों की भाषा में भारत आने पर हुआ। डॉ० घोष ‘र’ की अपेक्षा ‘ल’ की प्रचुरता को आर्यों के भारत में पूर्व की और बढ़ने का प्रभाव बतलाते हैं। पर, ‘र’  की जगह ‘ल’ के प्रयोग स्लाव भाषा में भी बहुत आते हैं। इसलिए हमें स्वीकार करना होगा, कि जहाँ तक ‘र’ ‘ल’ के प्राचुर्य का प्रश्न है वह शतम- वंश की दूसरी शाखाओं में भी दृष्टिगोचर होता है। 

डॉ० घोष इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि जहाँ तक भाषा का  प्रश्न है, ऋग्वेद के पहले नौ मंडलों की भाषा एक सी है।  दसवें मंडल की भाषा  में जरूर परिवर्तन हैं।  दसवें मंडल में भी कितनी ही ऋचाओं और सूक्तों की भाषा पुरानी दिखाई पड़ती है, साथ ही बाकी मंडलों में कितनों ही की भाषा में नवीनता पाई जाती है।  तो भी यह मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए, कि पहले नौ मंडलों की भाषा प्रायः पुरानी है। 

इन नौ मंडलों में भी यदि ऋषियों के काल-क्रम को देखें तो पहले भारद्वाज का मंडल ( छठा ), फिर वशिष्ठ का ( सातवां ), फिर विश्वामित्र का ( तीसरा ), फिर वामदेव का ( चौथा ) आता है। यह भाषा-भेद भरद्वाज ( 6| 1| 1, 2 ) और रक्षोहा की ऋचाओं ( 10 | 162  | 1-2 ) की तुलना से  ज्ञात  हो सकता है। 

वेद की भाषा अपेक्षाकृत बहुत पुरानी, ताम्र- समाज की भाषा है, विकास में वह वहां नहीं पहुंची थी, जहाँ कि पालि, प्राकृत, अपभ्रंश और हमारी भाषा में आधुनिक काल में पहुंची। इस प्रकार उसे अपरिचित और दुरूह शब्दों वाली भाषा कहा जा सकता है, लेकिन जहाँ तक भाषा की प्रकृति का संबंध है, उसे सरल होना चाहिये।किन्हीं-किन्हीं बातों में वह सरल है भी उसे हम पाणिनीय संस्कृत की पृष्ठभूमि में रखकर पढ़ना चाहते हैं, इसलिए हरेक पाणिनीय नियम के अपवादों की संख्या देखकर हम समझते हैं, कि वैदिक भाषा की प्रकृति अधिक क्लिष्ट है। 

यदि वेद की भाषा को वैदिक उदाहरणों अर्थात वैदिक पाठशालाओं के सहारे  पढ़ा जाये, तो वह जरूर सरल मालूम होगी। भाषा के ज्यादा सरल होने का अर्थ संदिग्ध होना भी है।  चीनी भाषा दुनियां की अत्यंत  सरल भाषा है –यहां हमें उसकी लिपि से कोई मतलब नहीं, जो निश्चय ही अत्यंत कठिन है। चीनी भाषा के पूर्ण व्याकरण के लिखने के लिए शायद पांच-छ पृष्ठों की भी आवश्यकता नहीं होगी, पर इसके कारण संदेह होने की भी गुंजाइश है। क्रियाओं में वचन और काल पुरुष का कोई पता नहीं। बोलते वक़्त स्वरों के आरोवहारोह से संदिग्ध बनाने की कोशिश की जाती है।

वैदिक भाषा में एक ही क्रिया के काल को न निश्चित करके पाठक को मजबूर किया जाता है, कि वह प्रकरण से उसका अर्थ निकाले। भवाति का अर्थ है और होवे दोनों हो सकता है। वैदिक भाषा के ऐसे अनिश्चित और अपवादपूर्ण क्रिया पदों को लेट् लकार में जमा कर दिया गया है। इस प्रकार वैदिक भाषा की कठिनाई से इंकार नहीं क्या जा सकता। पर, यदि संस्कृत के द्वारा नहीं, बल्कि ऋचाओं में आये  व्याकरण और उसके प्रयोगों द्वारा सीखाया जाए तो यह भाषा इतनी कठिन प्रतीत नहीं होगी। 

जहां तक शब्दों का संबंध है ऋग्वेद में कितने ही शब्द दूसरे अर्थों में प्रयुक्त होते हैं कारू काम करने वाले को कहना चाहिए, लेकिन ऋग्वेद में कारू  कवि को कहते हैं, जो ऋचाएं बनाता है। इसी तरह के दूसरे भी शब्द वहां मिलते हैं।

संधियों के नियमों को भी वेद में उतना पालन नहीं किया गया, स्वर के बाद स्वर आने पर भी उसे ज्यों का त्यों रहने दिया जाता है। 

 2. छंद

 ऋक् का अर्थ ही है पद्य। सारा ऋग्वेद पद्य-बद्ध है सात छंद प्रसिद्ध माने जाते हैं, पर छंदों की संख्या और अधिक है। यज्ञ ऋषि की रचना ऋचाओं (10|130 |3-5) में गायत्री, उष्टिणक, अनुष्टुप, बृहती, विराट्, त्रिष्टुप, जगति इन सात छंदों का उल्लेख है। यही मूल छन्द भी हैं यह हम बता चुके हैं, कि गाने के लिए गायत्री छंद सबसे अधिक प्रचलित था।

सोमपान के समय हरेक पीने वाले का कंठ खुल जाता था, जैसे आज भी मद्य पीते समय देखा जाता है। ऋग्वेद का नवा मंडल सोम मंडल है, जिसमें 100 से ऊपर ऋषियों ने सोम के गुणों का गान किया है। इस मंडल की बहुत अधिक ऋचायें गायत्री छंद में हैं गायत्री छंद के गाने को गायत्र साम कहा जाता है।

ऋग्वेद के 10414 मन्त्रों में छन्द हैं–

गायत्री
2467
उष्णिक
341
अनुष्टुप
855
वृहती
181
त्रिष्टुप
4253
पांक्ति
312
जगती
1348
अतिजगती
17
शाक्वरी
19
अतिशाक्वरी
9
अष्टि
6
अत्यष्टि
84
धृति
2
अतिधृति
1
एकपादवाले
6
दोपादवाले
17
प्रगाथ बार्हत
194
ककुभ
55
महाबार्हत
257

इनके देखने से ज्ञात होता है की 300 से अधिक बार आने वाले छंद गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, पंक्ति, त्रुष्टुप और जगती हैं।  इनमें भी सबसे अधिक उपयुक्त होने वाला छंद त्रुष्टुप  है,  जिसके बाद दूसरा नंबर गायत्री का, तीसरा जगती का और चौथा अनुष्टुप का। पीछे अनुष्टुप संस्कृत में  बहुत प्रयुक्त हुआ है गायत्री में गान के लिए अंतिम पाद को दोहराना आवश्यक था, इस प्रकार वह भी अनुष्टुप बन जाता था। दोनों को एक कर देने पर अनुष्टुपों की संख्या 2323 हो जाती है।

   3. रचना

    1-वाणी– पद्यबद्ध रचना को कहते थे, जैसा कि वासिष्ठ (7|31) ने कहा है—

    ” सबके राजा निष्क्रोध इंद्र की वाणियां शत्रुओं को  निरस्त्र करने के लिए हैं ||12||” 

     2 .सूक्त–  वशिष्ठ ने  सूक्त का भी उल्लेख किया है (7|29)—

“हे मघवन इन्द्र, जिन  सूक्तों द्वारा हम तुम्हारी स्तुति करते हैं, सो तुम्हारा अलंकार है  ||3||”

(7|58|6)—“मरुत इस सूक्त का सेवन करें।”

 3.श्लोक–श्लोक का भी उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है, लेकिन इसका अर्थ वही है, जो पुण्यश्लोक में आता है, अर्थात् श्लोक का अर्थ प्रशंसा या कीर्ति है। कण्व ने कहा है (1|38|14)—

“मुख में श्लोक बनाओ, मेघ की तरह फैलाओ उक्थ्य गायत्र को गाओ।”

4.साम–साम गीति को कहते थे। ऋग्वेद की ही बहुत सी ऋचाओं का गान के साथ जो संग्रह है, उसी को सामवेद कहते हैं। सारे सामवेद में सौ से कम ही ऐसे मन्त्र हैं जो ऋग्वेद में नहीं अये  हैं। कुत्स ऋषि साम से विश्वेदेवों की स्तुति का उल्लेख करते हैं (1|107)—

“सामों द्वारा स्तुति किये जाते देव (अपनी) रक्षा के साथ हमारे पास आयें ||2||”

गृत्समद ऋषि त्रिष्टुप और गायत्री साम की बात करते हैं (2|43)–

“और त्रैष्टुप को जैसे सामगायक, वैसे ही दोनों वाणियों को बोलते वह अनुरंजन करता है ||1||”

 कण्व-गोत्री कुसीदि ऋषि कहते हैं (8 | 70 ) 

“इंद्र, गीयमान साम को सुनै, उसका स्तुतिगान करै, वह अन्न से हमारे ऊपर कृपा करै ||5||”

5. स्तोम– स्तुति या स्तोत्र को उस समय स्तोम कहते थे। कुत्स आंगिरस इंद्र-अग्नि के लिए  कहते हैं (1 | 09 )–

        “हे इंद्रअग्नि, सुना है, तुम दामाद और साले से भी ज्यादा देनेवाले हो। इसलिए सोम के प्रदान के समय तुम्हारे लिए मैं नवीन स्तोम बनाता हूँ ||2||”

4. काव्य 

नदी-सूक्त –(3 | 33 | 1-13 ) पुरुरवा-उर्वशी सूक्त (10 | ) को देखने से मालूम होता है, कि कविता की मनोहारिनी शैली ऋग्वेदिक आर्यों में मौजूद थी। लेकिन ऋषियों की ऋचाओं को  कविता की दृष्टि से नहीं सुरक्षित किया गया। उनका उद्देश्य देवताओं को प्रसन्न करना था। बिलकुल सम्भव है, उस समय मधुर लोकगीत और पंवाडे प्रचलित थे, जिनकी उस समय काफी कदर थी। 

उपमा– 

कविता को सजाने में अलंकारों का उपयोग भी ऋषि करते हैं। अलंकार में सबसे अधिक उपयोग उपमा का ही देखा जाता है, जिसके लिए इव या उसी के अर्थ में न का प्रयोग बहुत हुआ है। गुत्समद ने एक सूक्त ( 2 | 36 | 1,8 ) की हरेक पंक्ति में इसका प्रयोग और अधिक बार किया है —

“अश्विद्वय पत्थर की तरह……. शत्रु को बाधा दो, गिद्ध की तरह निधियुक्त वृक्ष को प्राप्त करो। ब्रह्मा की तरह यज्ञ में उक्थ ( गीत ) गानेवाले हो, दूत की तरह बहुतों के लिए पुकारने लायक हो ||1||”

इस सूक्त में और उपमायें दी गई हैं — रथी, अजा (बकरी ), स्त्री, दम्पति, सींग, शफ ( खुर ), चक्रवाक, नव, युग (धुरा ), नाभि, उपधि, प्रदि, श्वान, खल, वर्म, बात, नदी, हाथ, पाद, ओष्ठ, स्तन, नासा, कारण, हैं पृथ्वी, शान, तापवार। सात त्रिष्टुप ऋचाओं के भीतर इतनी उपमायें दी गई हैं, और सबके साथ इव का प्रयोग है। अंत में ऋषि कहते (2 | 39 |-8 )—

“हे अश्विद्वय गुत्समदों ने तुम्हारे बधावे में मन्त्र और स्तोम बनाये। हे नरो, उनका सेवन करते ( हमारे ) पास आओ। यज्ञ में सुन्दर वीर्य वाले हो हम बहुत कहैं ||8||”

वाज्मभर-पुत्र सप्ति ने क्रिया की उपमा इव के साथ दी है ( 10 | 79 )—-

“हे सुनहले अग्नि, क्या देवों  के ऊपर तुमने क्रोध किया, अनजान होने से मैं तुमसे पूछता हूँ। खेलते न खेलते तुम वैसे ही छिन्न-भिन्न कर डालते हो, जैसे गाय को तलवार पोर-पोर करके काटती है ||6||”

विश्वामित्र ने सुन्दर काव्य नदी-सूक्त ( 3 | 35 ) में व्यास और सतलुज की उपमायें इव के साथ निम्न वस्तुओं से दी हैं– अश्व, गौ, रथी, वत्स, योषा ( मां ), मर्य ( पति ), 

न के साथ उपमा भी ऋग्वेद में आती है, जिसका प्रयोग पीछे नहीं होता। न नहीं के अर्थ में भी आता है, इसलिए संदिग्ध होने के कारण उपमार्थ न के प्रयोग को छोड़ दिया गया।  भरद्वाज कहते हैं ( 6 | 2 )—

“हे अग्नि तुम दीप्तिमान हो, तुम्हारा उज्वल धूम विस्तृत द्योलोक में फैला है।  हे पावक, कृपालु हो अपनी द्युति से सूर्य की तरह ( सुरो न ) प्रकाशमान होते हो ||6||”

“प्रजा में तुम पूज्य हमारे प्रिय अतिथि हो, पुर में हितकी तरह आश्रय लेने लायक, सुन की तरह ( सुनुर्न ) पालनीय हो ||7|| 

“हे अग्नि तुम घर्षण करके द्रोण में प्रकाशित होते हो, अश्व की तरह वाजी न कार्यकारी हो। सर्वत्रगामी वायु की तरह स्वयं जानेवाले हो, घोड़े की तरह ( अत्यो न ) कुटिलगामी शिशु हो ||8|| 

अगले सूक्त ( 6| 3 | 4-8 ) में भरद्वाज ने न-वाली उपमा अश्व, द्रवि ( दर्बी ), परशु, अयस, पक्षी, रेभ ( शब्दकारक ), द्यौ, घृणा, विद्युत् और ऋभु से दी है। 

5. कवि 

1- वशिष्ठ  

 वशिष्ठ के ऋग्वेद के कुछ काव्यमय सूक्तों का परिचय हम दे चुके हैं। वशिष्ठ ने एक सूक्त (7 | 75 ) में उषा का सुन्दर वर्णन किया —

      “दिविजा उषा ने प्रकाश किया। (वह ) सत्य से अपनी महिमा का अविष्कार करती आई। उसने तुमको दूर किया, प्राणी के श्रेष्ठतम पथ को आलोकित किया ||1||”

     “उषा की यह दर्शनीय विचित्र अमृत किरणें आईं । ( वह ) दिव्य व्रतों को उत्पन्न करती अंतरिक्ष को भरती अवस्थित हुईं ||3||”

     “यह वह उषा द्यौ की दुहिता, भुवन की रक्षिका, जनों के ज्ञान को अवलोकन करती तुरंत पांचो जनों के चारों ओर पहुँचती है ||4||”

     “अन्न वाली विचित्र धन-युक्त सूर्य की पत्नी ( उषा ) धन के लिए वसुओं के धन पर शासन करती है। जीर्ण करती ऋषियों से प्रशंसित धनिक यजमानों द्वारा स्तुति की जाती उषा प्रकाशित होती है ||5||”

    “प्रकाशमान उषा को वहन  करते विचित्र अश्व दिखाई दे रहे हैं। शुभ्र नाना रूपों वाली वह रथ से जाती है, सेवक जनों को रत्न देती है ||6||”

    “वह सत्या सत्यों के साथ, महती महान डिवॉन के साथ, यजनीया यजनकर्ता के साथ दृढ अंधकार को  करती, गौओं को चरा देती है। गायें उषा की कामना करती हैं ||7||”

   “हे उषा, हमें तुम गो-युक्त, वीरों-युक्त रत्न-अश्व-युक्त  भोज दो।  पुरुषों के सामने हमारे यज्ञ की निंदा न करो। तुम सदा स्वस्ति के साथ हमारी रक्षा करो ||8||”

2. विश्वामित्र —  

      विश्वामित्र ने भी कई सूक्त उषा की प्रशंसा में रचे हैं, जिनमें एक ( 3 | 61 ) की कुछ ऋचाएं निम्न प्रकार हैं —

   “अन्न से अन्न वाली, ज्ञान वाली मघोनी हे उषा, स्तुति-कर्ता के स्रोत ( स्तुति ) को ग्रहण करो। वह स्तोत्र वाली सबके लिए वर्णीय है प्राचीन युवती देवि, व्रत के लिए अनुगमन करो ||1||”

    “हे उषा देवि, सुनहले रथ-युक्त मिठबोली मधुर भाषण करती प्रकाशित हो, सुवर्णवर्णा तुम्हें वे बहुत बलशाली सुशिक्षित अश्व ले जायें ||2||”

  “हे उषा, तुम अमृत  ध्वजा हो, भुवनों के ऊपर सन्मुख सरे अवस्थित हो। हे नवीना, एकसे रथ पर विचरण करती चक्की तरह तुम पुनः पुनः घूमों|| 3||”

3. वामदेव– 

      सभी प्रधान ऋषियों ने उषा की महिमा गाई है।  फिर वामदेव कैसे पीछे रह सकते थे ? वह कहते हैं ( 4 | 51 ) —-

     “अंधकार के बीच से यह वह अतिविशाल ज्योति सामने उठी।  जनों के लिये निश्चय गमन किया करती द्यो की दुहितायें प्रकाशित हो रहीं हैं ||1||”

    “यज्ञों में यूपों की तरह पूर्व में विचित्र उषायें उठकर अवस्थित हुईं। बाधक अंधकार के द्वार को खोलती वह दीप्त पवित्र प्रकाशित होटी हैं ||2||”

    “मघोनी ( धनवती ), तमनाशिका उषायें भोजन दान के लिये अन्नदान के लिये भिजों को चेताती हैं।  पणि लोग अंधकार के मध्य में न जाग बेहोश हो सोयें ||3||”

      “हे देवियों, सत्य में  साथ तुम तुरंत भुवनों में चारों ओर जाती हो।  उषायें जीवन वितरण के लिए सोयें दोपायों-चौपायों को जगाती तुरंत भुवनों के चरों ओर जाती हैं ||5||”

     “जिसके लिये ऋभुओं ने विधान बनाये, वह उषा कहाँ, कितनी पुरानी है? जब शुभ्र उषाएँ शुभ विचरण करती हैं, तो ( वह कभी ) न पुरानी होने वाली  एक सी पहचानी नहीं जातीं ||6||”

    फिर दूसरे सूक्त ( 4 |52 ) में वामदेव सर्वप्रिय गायत्री छंद में उषा का गान करते हैं —

    “अन्धकारनाशिनी बहिन ( रात्रि ) को हटाने वाली वह प्रशंसित सुनायिका रमणी, द्यौ की दिखाई पड़ी ||1||”

     “अश्व की तरह विचित्र चमकीली, गायों की माता,  यज्ञ वाली उषा अश्वि-द्वय सखी हुई ||2||”

     “चाहे अश्विद्वय की तू सखी है, चाहे गायों ( किरणों ) की, माता है, उषा तुम धन ईश्वरी हो ||3||”

    “मधुरभाषिणी ( तुम ) शत्रुओं को हटाओ, ज्ञान दो। हम स्तोमों ( स्तुतियों ) द्वारा  तुम्हें प्रबोधित करते हैं ||४||”

    “वर्षा की धरा की तरह भद्र  दिखाई पड़ीं।  उषा ने अपने विस्तृत तेज से ( विश्व को ) भर दिया ||5||”

     “हे पूरयित्री विभावरि प्रकाशवती, अपनी ज्योति से तम को दूर करो। हे उषा, अन्न की रक्षा करो ||6||”

     “हे उषा ( तुम ) अपनी किरणों से द्यौ  को,विशाल प्रिय अंतरिक्ष को व्याप्त  करती हो, अपनी शुक्र ( उज्ज्वल )  किरणों से व्याप्त करती हो ||7||”

      ऋषि अपनी कृतियों को काव्य कहते थे, यह वामदेव के एक सूक्त ( 10 | 55 ) से मालूम होता है।  सूक्त का ऋषि यद्यपि वामदेव-पुत्र वृहदुक्थ बतलाया गया है, पर संभव है यह वृहद उक्थ ( महान गान ) वामदेव की मानस  संतान हों।  वह इंद्र की प्रशंसा करते कहते हैं —-

      “बहुतों के युद्ध में शत्रु युवा होने पर भी जिसके भय से भागते हैं, वह श्वेतकेश हो गया। देव के महत्वपूर्ण काव्य को देखो, जो कल जीवित था, वह आज मर गया ||5||”

4. भौम — 

अत्रि की संतान भौम पर्जन्य ( मेघ ) स्तुति ( 5 | 83 ) भी बहुत सुन्दर है —-

      “हे इन वाणियों से पर्जन्य के बल की प्रशंसा करो, नमस्कार करते पर्जन्य स्तुति करो। जलवर्धक दानशील गरजता पर्जन्य औषधियों में वीर्य धारण करता है ||1||”

      “वह वृक्षों को नष्ट करता है, राक्षसों को नष्ट करता है महाबध से सारे भुवन को डराता है। उस वृष्टि वाले  निरपराध भी भागते हैं, क्योंकि पर्जन्य शब्द करते दुष्टों को मारते हैं ||2||”

      “रथी की तरह चाबुक से घोड़ों को हाँकते, दूतों भटों को प्रकट करते से वर्षा को प्रेरित करता है।  जब पर्जन्य नभ को वर्षा युक्त करता है, तो दूर से सिंह के गर्जन की तरह गरजता है ||3||”

     “वायु जोर से बहते हैं, बिजलियाँ गिरती हैं, औषधियां बढ़ती हैं, आकाश भर जाता है।  सारे भुवन के लिए पृथ्वी समर्थ होती है, जबकि पर्जन्य पृथ्वी को वीर्य से रक्षा करते हैं ||4||”

     “जिसके व्रत (कर्म से) पृथ्वी नम्र होती है, जिसके व्रत से खुरों वाले ( पशु ) पोसे जाते हैं, जिसके व्रत से औषधियां नाना रूप की,  वह पर्जन्य हमें महासुख प्रदान करै ||5||”

     “हे मरुतों, द्यौ से हमें वृष्टि प्रदान करो। वर्षा करने वाले अश्वमेध की धाराओं वर्षाओं को वरसाओ। इस कड़क के साथ हे पर्जन्य, आओ हमारे पिता असुर (तुम ) हमारा सेचन करो ||6||”

    “आवाज करो, चिल्लाओ, जल  वाले रथ से गर्भ धारण करो, ( तुम्हारे द्वारा ) उभड़-खाबड़ प्रदेश समतल होवैं ||7||”

    “महाकोश मेघ को ऊपर से नीचे सींचो, बंधन-मुक्त कुल्याएँ ( नदियां ) पूर्व की ओर बहें। जल से द्यौ और पृथ्वी को भिगो दो। धेनु गौओं के लिए सुन्दर प्याऊ हो ||८||”

निष्कर्ष 

 इस प्रकार ऋग्वेद में जहां-तहाँ सुन्दर काव्य की जो छटा मिलती है उससे ज्ञात होता  कि ऋग्वैदिक आर्य साहित्य और कविता के प्रेमी थे। उनके मोरंजन के लिए सुन्दर कविताओं की रचना की जाती थी। उनके गाने का तरीका  क्या था, यह साम गान से ज्ञात हो जाता है। इससे भी अधिक वास्तविकता के समीप हम तब पहुंचेंगे, यदि हमारे लोकगीतों के तुलनात्मक अध्ययन ( विशेषकर हिमालय की पिछड़ी जातियों के लोकगीतों के तुलनात्मक अध्ययन ) से किसी निष्कर्ष पर पहुंचें।

लोकगीतों के वाक्य-विन्यास चाहे चिरजीव नहीं होते, पर उनके लय या गाने के ढंग शताब्दियों और सहस्राब्दियों तक बने रहते हैं; इसलिए यदि हमारे देश और कितने ही पश्चिमी देशों के साथ साम गान की तुलना की जाये, तो सप्तसिंधु के आर्यों के गाने की शैली को जाना जा सकता है।


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