साम्राज्यवाद और उसके सिद्धांत-Part 2

साम्राज्यवाद एक राजनीतिक और सामाजिक तांत्रिक विचार है जो एक व्यक्ति, समूह, या राष्ट्र की आपातकालीन शक्ति और प्राधिकार को समर्थित करता है, जिसका उद्देश्य बाकी सभी को नियंत्रित करने वाले शासक या साम्राज्य की स्थापना करना होता है। साम्राज्यवाद धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक प्रकारों में विभिन्न हो सकता है और इतिहास में अनेक विभिन्न प्रकार के साम्राज्यवादी सिद्धांत और आदर्श हुए हैं।

साम्राज्यवाद और उसके सिद्धांत-Part 2

 

साम्राज्यवाद और उसके सिद्धांत

साम्राज्यवाद के मुख्य तत्व शक्ति, प्राधिकार और नियंत्रण हैं, जो एक व्यक्ति, समूह या राष्ट्र की आपातकालीन या विशिष्ट प्रकार की शासन पद्धति की आपूर्ति को समर्थित करते हैं। साम्राज्यवाद धर्म, राजनीति, समाज और आर्थिक प्रकारों में अनेक विचारधाराओं को समर्थित कर सकता है, जो अलग-अलग साम्राज्यवादी सिद्धांतों और आदर्शों पर निर्भर करेगा।

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पूंजीवाद का प्रतिस्पर्धात्मक स्वरूप-Competitive nature of capitalism 

प्रतिस्पर्धात्मक पूंजीवाद से इन नवीन एकाधिकारिक पूंजीवाद की दिशा में जो परिवर्तन हुआ उसका संकेत कई प्रवृत्तियों से मिलने लगा था। शेयर बाजार अब शेयरों की कीमत आंकने का इतना महत्व मापदंड नहीं रहा। अब इस भूमिका को एक हद तक बैंकों ने निभाना शुरू कर दिया। प्रतिस्पर्धात्मक पूंजीवाद के आर्थिक नियमों पर अनिवार्यतः एकाधिकार स्थितियों का अंकुश था।

अत: पहले मुद्रा-पूंजी तथा औद्योगिकरण या उत्पादक पूंजी के बीच जो अलगाव की स्थिति थी उसमें परिवर्तन आना शुरू हो गया। उद्यमी को अब उत्पादन शुरू करने के लिए मुद्रा उधार लेने को साहूकार के पास नहीं जाना पड़ता था क्योंकि अब तो वह स्वयं ही एकाधिकारी था। इस प्रकार एकाधिकारिक पूंजीवाद के अंतर्गत बैंकिंग तथा औद्योगिक पूंजी दोनों मिलकर एक हो गए।

पहले पूंजीपति मुख्यतः वस्तुओं के निर्यात में व्यस्त थे, किंतु इस नए चरण में एकाधिकार या इजारेदार पूंजी के निर्यात में दिलचस्पी रखते थे। अतिशय लाभ से प्राप्त अधिशेष के इस्तेमाल का और तरीका ही क्या था? इसमें शक नहीं कि कुछ अन्य संभावनाएं भी थीं। वे स्वयं अपनी अर्थव्यवस्था के पिछड़े हुए क्षेत्रों, जैसे कृषि-क्षेत्र में विकास ला सकते थे। वे लोकोपयोगी कार्यों तथा सामाजिक कल्याण के साधनों में व्यापक सुधार ला सकते थे।

दूसरे शब्दों में पूरे समाज को संपन्न एवं विकसित करने में इन बढ़ते हुए मुनाफों का सार्थक ढंग से उपयोग किया जा सकता था जिससे असमानताएं कम हो और न्याय तथा सुख शांति की वृद्धि हो। किंतु पूंजीवाद यदि यह सब कुछ करता तो वह पूंजीवाद ही न रहता। इसके शासन के अंतर्गत तो यह बहुत जरूरी है कि अधिशेष (surplus) पूंजी का निवेश इस रूप में किया जाए जिससे और ज्यादा पूंजी का संचयन हो।

भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विभिन्न चरण

साम्राज्यवादी देश की बैंक-शाखाओं के जरिए वित्तीय पूंजी उपनिवेशों को हस्तांतरित कर दी गई। जब देशीय लोगों ने इन बैंकों से ऋण लिया तो यह ऋण इसी शर्त पर दिया गया कि वे मशीनें या कल-पुर्जे ऋणदाता देश से ही खरीदें। उपनिवेशों से प्राप्त मुनाफा भी इन्हीं बैंकों के जरिए जाता था। इस प्रकार इस काल में औद्योगिक तथा वित्तीय प्रक्रियाएं बहुत स्पष्ट रूप से एक ही बिंदु पर मिल रही थीं।

इस मुकाम पर इजारेदारों में परस्पर समझौता हुआ और उन्होंने अपनी गतिविधियों के लिए देशीय बाजार को ही नहीं वरन् अंतर्राष्ट्रीय बाजार को भी आपस में बांट लिया। इस स्थिति का नियंत्रण पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय एकाधिकार संघों और अंतरराष्ट्रीय उत्पादक संघों या सिंडिकेटों ( जो आधुनिक बहुराष्ट्रीय निगमों के पूर्वगामी हैं) का उदय हुआ।

 आपसी समझौते के बावजूद भी विभिन्न इजारेदारों ने अपने प्रभाव-क्षेत्रों को सुरक्षित तथा सुदृढ़ करने की आवश्यकता महसूस की, अतः इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने अपने-अपने देशों को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वे जहां भी संभव हो वहां अपना पूर्ण नियंत्रण स्थापित करें। इस प्रकार 1880 से लेकर 1914 तक का काल एक ऐसा युग था जब पूरे भूमंडल के विभिन्न क्षेत्रों पर कब्जा जमाने के लिए महाशक्तियों के बीच संघर्ष चला। अफ्रीका में यह संघर्ष काफी तीव्र रहा जबकि एशिया में बंटवारे की इस प्रक्रिया को व्यवस्थित रूप दिया गया।

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