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1859-60 के नील विद्रोह के कारणों की विवेचना कीजिए

1859-60 के नील विद्रोह के कारणों की विवेचना कीजिए

     भारत में उपनिवेशवादी सरकार के शोषण और उसकी आर्थिक नीतियों ने भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था जो प्राचीनकाल से ही आत्मनिर्भर थी, की कमर तोड़ दी थी। भू:राजस्व की नई कीमतों , बढ़ती मंहगाई और कृषि के घटते उत्पादन ने इस देश के ग्रामीण समुदाय विशेषकर किसानों की कमर तोड़ दी थी।

नील विद्रोह - 1859-60
नील फैक्ट्री का एक सांकेतिक चित्र – फोटो स्रोत-विकिपीडिया


        किसानों और मजदूरों ने शोषण के इस क्रम को तोड़ने की कई बार असफल कोशिशें की। बहुत से ग्रामीण मजबूरन अपराध की तरफ मुड़ गए।

नील आंदोलन १९५९-६० / नील आंदोलन कब और कहाँ हुआ ?


     अपनी आर्थिक स्थिति से परेशान बंगाल के किसानों ने अंग्रेज सरकार के विरुद्ध नील आंदोलन चलाया। शोषण के विरुद्ध किसानों की, ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध यह सीधी लड़ाई थी।
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नील आंदोलन का क्या कारण था


      इस आंदोलन का मुख्य कारण यह था कि ब्रिटिश नील उत्पादक ठेकेदार वर्षों से किसानों को नील की खेती के लिए मजबूर कर रहे थे। इसके विपरीत किसान सिर्फ अपनी उपजाऊ जमीन पर चावल की फसल उगाना चाहते थे जिसकी  उन्हें अच्छी कीमत मिलती थी। अधिकांश नील-उत्पादक ( ठेकेदार ) यूरपीय थे और ग्रामीण ( मुफ्सिल ) इलाकों में उनके कारखाने थे, जहाँ वे नील का शोधन करते थे। प्रारम्भ से ही नील की खेती करने वाले किसानों का भारी शोषण होता रहा। नील उत्पादक मामूली सी अग्रिम धनराशि देकर किसानों से एग्रीमेंट लिखवा लेते थे।

     इस करार में धोके से नील की बहुत कम कीमत लिखी जाती थी जो बाजार मूल्य से बहुत कम होती थी।
       इस धोकेबाजी के संबंध में बंगाल के गवर्नर ने स्वयं टिप्पणी की थी —  

           “सारे झगड़े की जड़ यह है कि नील-उत्पादक बिना पैसा दिए ही ‘रैयतों’ ( किसानों ) को नील की खेती करने पर मजबूर करते हैं।”

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      किसान चाहकर भी इस करार को तोड़ नहीं पाते थे। नील-उत्पादकों के कारिंदे भी किसानों से नियमित रूप से रिश्वत लेते थे।

         बढ़ते अदालती दांव-पेचों से बचने के लिए नील उत्पादकों ने अब करार करने की बजाय अपने लठैतों के माध्यम से किसानों का अपहरण कर उनके साथ मारपीट करके, उनके बच्चों और औरतों  के साथ पिटाई की जाती, लूटपाट करके उनके घरों में आग लगा दी जाती थी मजबूरन किसान नील की खेती करते थे।
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       न्यायपालिका में यूरोपीय न्यायाधीश अक्सर नील उत्पादकों के पक्ष में ही फैसले देते थे। न्यायपालिका की हालत यह थी कि 1857 में 29 नील उत्पादकों ( ब्रिटिश नागरिक ) और एक जमींदार को ‘ऑनरेरी मजिस्ट्रेट’ नियुक्त किया गया था। तभी से लोग यह कहने लगे कि ‘जो रक्षक, वही भक्षक।’

  नील आंदोलन 1959 / नील विद्रोह” के नेता थे ?

1959 के मध्य  में बंगाल के नील-किसानों को जब यह लगा कि इस मामले में सरकार शायद अब उनका साथ देनेवाली है तो उनके असंतोष में उबाल आ गया। हुआ यह था कि क्लारोवा के डिप्टी मजिस्ट्रेट हेम चंद्राकर से एक सरकारी आदेश पढ़ने में जरा-सी चूक हो गई और उन्होंने १७ अगस्त 1859 को पुलिस के नाम फरमान जारी कर दिया कि —-
        “नील उगानेवाले ‘रैयतों’ का कब्जा बरक़रार रहेगा और वे उस पर अपनी मर्जी की फसल ऊगा सकेंगे। पुलिस  की यह जिम्मेदारी है कि कोई नील-उत्पादक या अन्य कोई व्यक्ति ‘रैयतों’ के मामले में हस्तक्षेप न करने पाए।”

        चंद्राकर की यह घोषणा सारे बंगाल में आग की तरह फ़ैल गई। किसानों को लगा कि अरसे से चले आ रहे शोषण के खात्मे का वक़्त आ गया है। उन्होंने में शुरू में शांतिपूर्ण तरीकों से संघर्ष चलाया। इस आंदोलन का कोई घोषित नेता नहीं था।
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नील आंदोलन का प्रारम्भ / नील आंदोलन कब शुरू हुआ ?

       ब्रिटिश अधिकारीयों के पास कई अर्जियां भेजी गईं  प्रदर्शन किये गए। लेकिन जब इसका कोई असर नहीं पड़ा, तो सितम्बर 1959 में उनका गुस्सा भड़क उठा।
      शुरुआत नादिया जिले के गोविंदपुर गांव से हुई। एक नील-उत्पादक के दो भूतपूर्व कर्मचारियों — दिगंबर विश्वास और विष्णु विश्वास के नेतृत्व में वहां के किसान एकजुट हुए और उन्होंने नील की खेती बंद कर दी। 13 सितम्बर को नील-उत्पादक ने करीब सौ लठैतों को गोविंदपुर भेजा। इन लठैतों ने गांव पर हमला कर दिया। लाठियां और भालों से लैस किसानों ने इस हमले को नाकाम कर दिया।

        आंदोलन की यह आग शीघ्र ही दूसरे इलाकों में भी फ़ैल गई  किसानों ने कई जगह अग्रिम धनराशि लेकर  करार करने से स्पष्ट इंकार कर दिया और नील उगाने से इंकार कर दिया। 1860 की बसंत ऋतु आते-आते यह आंदोलन बंगाल के उन सभी इलाकों में फ़ैल गया जहाँ-जहाँ खेती होती थी।

        किसानों के एकजुट संगठनों ने गांव-गांव से लठैतों ( नील उत्पादकों के हथियारबंद लोग ) के आतंक को खत्म कर दिया। इसके अतिरिक्त नील के कारखानों पर भी हमला किया गया। यहाँ तक कि कई बार पुलिस और आंदोलनकारियों में सीधी मुठभेड़ हुई। किसानों ने कई पुलिस चौकियों को नष्ट कर दिया।

      किसानों के बढ़ते विरोध  आंदोलन से घबराकर नील उत्पादकों ने किसानों को धमकी दी कि वे अपने ‘जमींदारी’ अधिकारों का प्रयोग कर उनकी जमीन छीन लेंगे। इसका जवाब किसानों ने लगान न चुकाकर दिया। अब तक रैयतों ( किसानों ) ने अपने अधिकारों के लिए क़ानूनी ढंग से भी लड़ना सीख लिया था।
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  किसानों और नील उत्पादकों ने एकदूसरे के विरुद्ध  मुकद्ने दायर कर दिए। किसानों और उनके साथ गांव के लोगों ने उन लोगों का सामाजिक  वहिष्कार शुरू कर दिया जो नील उत्पादकों के यहाँ नौकरी करते थे।

  नील आंदोलन का परिणाम


किसानों के एकजुट विरोध का यह प्रतिफल हुआ कि 1860 तक बंगाल के सभी नील कारखाने बंद जो गए। नील की खेती पूरी तरह बंद करदी गई।

नील आंदोलन की सफलता का कारण


रैयतों का अनुशासन

नील आंदोलन की सफलता का सबसे बड़ा कारण था किसानो ने पूर्ण अनुशासन, एकजुटता और सहयोग से यह लड़ाई लड़ी। हिन्दू और मुसललमानों ने कंधे से कन्धा मिलाकर एक दूसरे का सहयोग किया। किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले आर्थिक रूप से सम्पन्न किसान थे। कहीं- कहीं छोटे जमींदारों, महाजनों और उत्पादकों ने भी आंदोलनकारियों को समर्थन दिया। 

 

बुद्धिजीवी वर्ग और समाचार पत्रों का समर्थन


     ‘नील आंदोलन’ (indigo movement )की सफलता में बंगाल के बुद्दिजीवियों और अख़बारों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ‘हिन्दू पैट्रियट’ के सम्पादक हरिश्चंद्र मुखर्जी ने बहुत अच्छा काम किया।  उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से किसानों की समस्याओं को अख़बार में रोज छापा। नील आंदोलन के ऐतिहासिक और राजनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए 1860 में उन्होंने लिखा —

       “बंगाल को अपने किसानों पर गर्व होना चाहिए। शक्ति, धन, राजनीतिक शिक्षा और यहाँ तक कि नेतृत्व के आभाव के बाबजूद बंगाल के किसानों ने आंदोलन चलाया है, वह अब तक दुनिया के सामाजिक इतिहास में किसी भी आंदोलन से किसी मायने में कम  कमतर नहीं है। सरकार किसानों के खिलाफ है, कानून उनके खिलाफ है, ट्रिब्यूनल उनके खिलाफ है, प्रेस उनके खिलाफ है और इसके बाबजूद उनकी यह उपलब्धि रही है। जिसका लाभ हमारे देश की आगे आने वाली पीढ़ियों को हर स्तर पर मिलेगा।”


    दीनबंधु मित्र के नाटक ‘नील दर्पण’ का उल्लेख भी करना उचित होगा, जिसमें किसानों के शोषण को बारीकी से उभारा गया था। 

   
        इस आंदोलन की सफलता ने के नए बुद्धिजीवी वर्ग को जन्म दिया जिसने आगे चलकर राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  ईसाई मिशनरियों की भूमिका / नील आयोग का अध्यक्ष कौन था ?

ईसाई मिशनरियों ने इस आंदोलन में किसानों का समर्थन किया। सरकार का रवैया काफी संतुलित रहा। सरकार ने बहुत ज्यादा कड़ा रुख नहीं अपनाया। बुद्धिजीवियों और मिशनरियों ने नील किसानों की समस्या की जाँच के लिए आयोग नियुक्त ( neel aayog)किया। नील विद्रोह की व्यापकता को देखते हुए ब्रिटिश सरकार ने एक नील आयोग का (1860) गठन किया। जिसका अध्यक्ष बंगाल का सचिव सीटनंकर को नियुक्त किया गया था। इस  आयोग ने किसानों की मांग को सही ठहराया और सरकार ने किसानों के पक्ष में फैसला सुनाया। इस आयोग की रिपोर्ट आने बाद साबित  हुआ कि नील की खेती के पीछे भ्रष्टाचार और उत्पीड़न का एक पूरा तंत्र काम कर रहा है

      इसके बाद 1860  में अधिसूचना जारी कर जबरन नील की खेती के लिए मजबूर करने पर रोक लगा दी गयी। सभी ,मामलों के निपटारे के लिए क़ानूनी ढंग अपनाने को कहा गया। इसके बार नील उत्पादकों ने खुद ही अपने कारखाने समेटने शुरू कर दिए। इस प्रकार यह आंदोलन सफल हुआ।


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