मध्यकालीन भारतीय इतिहास - 𝓗𝓲𝓼𝓽𝓸𝓻𝔂 𝓘𝓷 𝓗𝓲𝓷𝓭𝓲

अकबर का सम्पूर्ण इतिहास 1542-1605 : प्रारम्भिक जीवन और कठिनाइयाँ, साम्राज्य विस्तार, सामाजिक और धार्मिक नीति, मृत्यु और विरासत

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना ने भारतीय समाज और संस्कृति में एक अलग छाप छोड़ी है। मुग़लों के शासन को वर्तमान में घृणा की दृष्टि से देखा जाता है। भारत में एक ऐसा वर्ग है जो समझता है की मुग़लों का शासन की मुस्लिम साम्राज्य था और वे गुलाम वंश से लेकर लोदी वंश तक को मुग़लों के साथ ही जोड़ देते हैं। जबकि मुग़ल साम्राज्य 1526 से शुरू होकर ब्रिटिश शासन की स्थापना तक है। लगभग 350 साल तक मुग़लों का शासन रहा। आज इस लेख में हम मुग़ल साम्राज्य के तीसरे और सबसे प्रसिद्ध शासक अकबर महान के विषय में सम्पूर्ण इतिहास जानेंगे। लेख को अंत तक अवश्य पढ़े।

अकबर का सम्पूर्ण इतिहास 1542-1605 : प्रारम्भिक जीवन और कठिनाइयाँ, साम्राज्य विस्तार, सामाजिक और धार्मिक नीति, मृत्यु और विरासत

अकबर का सम्पूर्ण इतिहास:


अकबर का संछिप्त परिचय

जन्म का दिनांक 15 अक्टूबर, 1542 ई० में
जन्म का स्थान अमरकोट (सिन्ध) में
पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर
पिता हुमायूं
माता हमीदा बानो बेगम
प्रथम विवाह हिन्दाल की पुत्री रुकैया बेगम से 1551
राज्याभिषेक 14 फरवरी 1556 ई० कालानौर (गुरुदासप
संतान तीन पुत्र व तीन पुत्रिया
तीन पुत्र सलीम, मुराद व दानियाल इसमें सलीम का जन्म अम्बर का राजा बिहारी मल की पुत्री जोधाबाई के गर्भ से हुआ था। मुराद व दानियाल का जन्म अकबर की दो भिन्न उपपत्नियों से हुआ था।
तीन पुत्रियाँ खानम सुल्तान शुकुन निशा बेगम व आराम बानो बेगम
उत्तराधिकारी सलीम (जहांगीर), जबकि दो पुत्रों में मुराद की मृत्यु 1599 ई० में तथा दानियाल की मृत्यु 1604 ई० में अतिशय मदिरापान के कारण हुई।
अकबर की मृत्यु 25-26 अक्टूबर, 1605 ई०

 

अकबर का प्रारम्भिक जीवन-


अकबर जिसका पूरा नाम जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर था। वह हुमायूँ और हमीदा बानो बेगम (मरियम मकानी) की संतान था। अकबर का जन्म 15 अक्टूबर, 1542 ई० को अमरकोट (सिंध) में राणा बीरसाल नामक एक राजपूत सरदार के घर में हुआ था। उस समय हुमायूँ दिल्ली की सत्ता से बेदखल होने के बाद राणा बीरसाल के यहां शरण पाया था।

अकबर के जन्म के समय हुमायूँ अमरकोट से दूर शाह हुसैन अरगून के विरुद्ध थट्टा और भक्खर अभियान पर था। उसी समय तारदी बेग खान नामक उसके एक घुड़सवार ने उसे पुत्र जन्म का शुभ समाचार सुनाया। पुत्र के जन्म का समाचार सुनकर हुमायूँ ने ईश्वर को धन्यवाद दिया तथा अपने साथियों के बीच कस्तूरी बांट कर उत्सव मनाया। किन्तु दुर्भाग्यवश किसी बात पर मतभेद हो जाने के कारण राजपूत सैनिकों ने मुगलों का साथ छोड़ दिया। इसी बीच हुमायूँ व शाह हुसैन अरगून के मध्य संधि हो गयी जिसके अनुसार हुमायूँ ने सिंघ छोड़ने का वचन दिया बदले में शाह हुसैन अरगून ने हुमायूँ को कुछ आर्थिक सहायता प्रदान की।

11 जुलाई, 1543 ई० को हुमायूँ अपने नवजात शिशु अकबर, पत्नी हमीदा बानू और कुछ साथियों के साथ सिन्ध नदी पार कर कन्धार की ओर प्रस्थान किया। वह कंधार की सीमा पर स्थित मस्तंग पहुंचा जहां काबुल के शासक कामरान की तरफ से उसका छोटा भाई अस्करी शासन कर रहा था। कामरान ने अस्करी से हुमायूँ को बन्दी बनाने का आदेश दिया। अतः अस्करी हुमायूँ पर आक्रमण करने की योजना बनाने लगा।

हुमायूँ को इसकी सूचना मिल गयी किन्तु वह अपने भाइयों से युद्ध करना नहीं चाहता था। अतः मस्तंग में ही उसने अपने शिशु अकबर को ‘जीजी अनगा’ व ‘माहम अनगा’ नामक दो धायों के संरक्षण में छोड़ कर पत्नी हमीदा बानों व अन्य साथियों के साथ कन्धार से ईरान की ओर प्रस्थान किया। अस्करी ने बालक अकबर के साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया तथा उसकी देख-रेख अपनी पत्नी सुल्तान बेगम को सौंपा।

1545 ई० में जब हुमायूँ ने कन्धार पर आक्रमण किया तब अस्करी ने अकबर को काबुल भेज दिया जहां बाबर की बहन खानजामा बेगम ने उसका पालन-पोषण किया। 1546 ई० में बालक अकबर अपने माता-पिता से मिला। यहीं पर उसका खतना संस्कार हुआ और उसका नाम जलालुद्दीन मुहम्मद अकबर रखा गया।

कुछ समय पश्चात् हुमायूँ बदक्शां पहुंचा और अस्वस्थ हो गया। कामरान ने अवसर का लाभ उठा कर काबुल पर अधिकार कर लिया तथा अकबर को अपने संरक्षण में ले लिया। जब हुमायूँ को यह पता चला तो उसने काबुल के दुर्ग का घेरा डाला। उसकी तोपें दुर्ग की दीवारों पर गोला बरसाने लगी। इसी समय कामरान ने बालक अकबर को दुर्ग की दीवार से लटका दिया था। शहजादे को पहचान कर हुमायूँ ने अपने तोपों की दिशा बदल दी जिससे अकबर बच गया शीघ्र ही हुमायूँ ने काबुल पर विजय प्राप्त कर लिया, तत्पश्चात् अकबर को अपने माता-पिता का संरक्षण प्राप्त हुआ।

अकबर की प्रारम्भिक शिक्षा


जब अकबर पांच वर्ष का था तो हुमायूँ ने उसकी शिक्षा-दीक्षा का उचित प्रबंध किया। उसके लिए दो शिक्षक पीर मोहम्मद तथा बैरम खां को नियुक्त किया गया। किन्तु अकबर को शिक्षा प्राप्त करने में कोई रूचि नहीं थी। उसकी अभिरुचि शिकार, घुड़सवारी, तीरंदाजी व तलवार चलाने आदि में थी। यद्यपि उसकी बुद्धि अत्यन्त ही तीव्र थी। उसने स्वेच्छा से प्रसिद्ध सूफी कवि हाफिज एवं जलालुद्दीन रूमी की रहस्यवादी कविताओं को कंठस्थ कर लिया था।

जब अकबर ने पढ़ाई के तरफ कोई ध्यान नहीं दिया तो हुमायूँ ने आरम्भ से ही उसे राज-काज में लगाना आरम्भ किया। जब वह मात्र नौ वर्ष का था तो 1551 ई० गजनी के राज्यपाल के रूप में पहली बार उसे औपचारिक दायित्व सौंप गया। अकबर ने यहां अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। लगभग इसी समय उसके चाचा हिन्दाल की पुत्री रुकैया बेगम के साथ उसका विवाह हुआ।

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