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हड़प्पा सभ्यता: सामाजिक और आर्थिक जीवन, महत्वपूर्ण स्थल और पतन के कारण

प्राचीन दुनिया में जब लोगों को ठीक से रहना भी नहीं आता था, उस समय भारत में एक पूर्ण विकसित सभ्यता अस्तित्व में थी। इस सभ्यता को हड़प्पा अथवा सिंधु सभ्यता के नाम से जाना जाता है। इस सभ्यता से प्राप्त अवशेषों के आधार के आधार पर हड्डपा सभ्यता का सामाजिक और आर्थिक जीवन के विषय में इस लेख में चर्चा की जाएगी। लेख को अंत तक तक अवश्य पढ़ें।
हड़प्पा सभ्यता: सामाजिक और आर्थिक जीवन, महत्वपूर्ण स्थल और पतन के कारण

हड़प्पा सभ्यता: सामाजिक जीवन

हड़प्पा सभ्यता में परिवार सामाजिक जीवन का मुख्य आधार था। परिवार में सब लोग प्रेमपूर्वक रहते थे। परिवार का मुखिया माता को माना जाता था यानि हड़प्पा सभ्यता में समाज मातृसत्तात्मक था।मोहनजोदड़ो की खुदाई से सामजिक विभाजन के संकेत प्राप्त होते हैं।सम्भवतः समाज चार वर्णों में विभाजित था- विद्वान-वर्ग, योद्धा, व्यापारी तथा शिल्पकार और श्रमिक। 

  • विद्वान वर्ग के अंतर्गत  सम्भवतः  पुजारी, वैद्य, ज्योतिषी तथा जादूगर सम्मिलित थे। 
  • समाज में पुरोहितों का सम्मानित स्थान था। 
  • हड़प्पा सभ्यता में मिले मकानों की विभिन्नता के आधार पर कुछ विद्वानों ने समाज जाति प्रथा के प्रचलित  अनुमार लगाया है। 
  • खुदाई में प्राप्त तलवार, पहरेदारों भवन तथा प्राचीरों अवशेष मिलने से वहां क्षत्रिय जैसे किसी योद्धा वर्ग के  अनुमान लगाया जाता है। 
  • तीसरे वर्ग में व्यापारियों तथा शिल्पियों जैसे पत्थर काटने वाले, खुदाई करने वाले, जुलाहे, स्वर्णकार, आदि को शामिल किया  है। 
  • अंतिम वर्ग में विभिन्न अन्य व्यवसायों से जुड़े लोग जैसे- श्रमिक, कृषक, चर्मकार, मछुआरे, आदि। 
  •  कुछ विद्वान हड़प्पा सभ्यता में दास प्रथा के प्राचलन का भी अनुमान लगते हैं। 
  • परन्तु एस. आर. राव ने दास प्रथा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं किया है। 

हड़प्पा सभ्यता में नारी का स्थान

 हड़प्पा सभ्यता में नारी का बहुत ऊँचा स्थान था।वह सभी सामाजिक  धार्मिक कार्यों तथा उत्सवों में पुरुषों  समान ही भाग थी।अधिकांश महिलाऐं घरेलु कार्यों से जुडी थीं। पर्दा प्रथा का प्रचलन नहीं था।

सिंधु सभ्यता के लोगों का भोजन

  • सिंधु सभ्यता  शाकाहारी तथा माँसाहारी दोनों प्रकार का भोजन ग्रहण करते थे। 
  • गेहूँ, जौ, चावल, तिल, दाल आदि प्रमुख खाद्यान्न थे। 
  • शाक-सब्जियां, दूध तथा विभिन्न प्रकार फलों खरबूजा, तरबूज, नीबू, अनार, नारियल आदि का सेवन करते थे। 
  • मांसाहारी भोजन में सूअर, भेड़-बकरी, बत्तख, मुर्गी, मछलियां, घड़ियाल आदि खाया जाता था। 

सिन्धुवासियों के वस्त्र

  • सिन्धुवासी सूती तथा ऊनी दोनों प्रकार के वस्त्रों का प्रयोग करते थे। 
  • स्त्रियां जूड़ा बांधती थीं तथा पुरुष लम्बे-लम्बे बाल तथा दाढ़ी-मुँछ रखते थे। 

 हड़प्पा सभ्यता  आभूषण

  • महिलाऐं तथा पुरुष दोनों ही आभूषणों का इस्तेमाल करते थे जैसे- अंगूठी, कर्णफूल, कंठहार आदि। 
  • हड़प्पा से सोने के मनकों वाला छः लड़ियों का एक सुन्दर हार मिला है। 
  • छोटे-छोटे सोने तथा सेलखड़ी  निर्मित मनकों वाले हार बड़ी संख्या में मिले। हैं 
  • मोहनजोदड़ो से मार्शल ने एक बड़े आकर का हार प्राप्त किया है जिसके बीच  गोमेद के मनके हैं। 
  • कांचली मिटटी, शंख तथा सेलखड़ी की बानी चूड़ियां मिली हैं। 
  • सोने, चांदी, तथा कांसे की चूड़ियां, मिटटी और तांबे की अंगूठियां भी मिली हैं। 
  • मोहनजोदड़ो की स्त्रियां काजल, पाउडर, तथा श्रृंगार प्रसाधन का प्रयोग  थीं। 
  • चन्हूदड़ो से लिपस्टिक  साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। 
  • शीशे, कंघी, का भी प्रयोग  था। 
  • तांबे  दर्पण, छूरे, कंघें, अंजन लगाने की शलाइयाँ, श्रृंगादान आदि  हैं। 
  • आभूषण बहुमूल्य पत्थरों, हाथी-दांत, हड्डी और शंख के बनते थे। 
  • खुदाई में घड़े, थालियां, कटोरे, तश्तरियां, गिलास, चम्मच आदि बर्तन  हैं  आलावा चारपाई, स्टूल, चटाई  प्रयोग  था। 
  •  ऋग्वेदिककालीन भाषा और काव्य 

सिन्धुवासियों के मनोरंजन के साधन

  • पासा इस सभ्यता के लोगों का प्रमुख खेल था। 
  • हड़प्पा से मिटटी, पत्थर तथा  मिटटी के बने सात पासे मिले हैं। 
  • सतरंज जैसे कुछ गोटियां भी मिली हैं जो मिटटी, शंख, संगमरमर, स्लेट, सेलखड़ी आदि से बनीं हैं। 
  • नृत्य भी प्रिय साधन था जैसा कि मोहनजोदड़ो से कांस्य निर्मित नृत्य मुद्रा में मिली मूर्ति  प्रतीत होता है। 
  • जंगली जानवरों  शिकार भी मनोरंजन  साधन था
  • मछली फंसना तथा चिड़ियों  शिकार करना नियमित व्यवसाय था। 
  • मिटटी की बानी खिलौना गाड़ियां मिली हैं जिनसे खेलते होंगे। 

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उत्तराखण्ड में औपनिवेशिक प्रशासन: वन प्रबन्ध सम्बन्धी नीतियां

वर्तमान राज्य उत्तराखण्ड जिस भौगोलिक क्षेत्र पर विस्तृत है उस इलाके में ब्रिटिश शासन का इतिहास उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक से लेकर भारत की आजादी तक का है। ज्ञात है कि उत्तराखण्ड में ईस्ट इण्डिया कम्पनी का आगमन 1815 में हुआ। इससे पूर्व यहाँ नेपाली गोरखों का शासन था। यह भी माना जाता है कि गोरखा शासकों द्वारा इस इलाके के लोगों पर किये गये अत्याचारों को देखकर ही अंग्रेजों का ध्यान इस ओर गया। यद्यपि अंग्रेजों और नेपाली गोरखाओं के बीच लड़े गये गोरखायुद्ध के अन्य कारण भी थे।

उत्तराखण्ड में औपनिवेशिक प्रशासन 

सगौली की सन्धि 4 अप्रैल 1816

अल्मोड़ा में 27 अप्रैल, 1815 को गोरखा प्रतिनिधि बमशाह और लेफ्टिनेंट कर्नल गार्डनर के बीच हुई एक सन्धि के बाद नेपाली शासक ने इस क्षेत्र से हट जाने को स्वीकारा और इस क्षेत्र क्षेत्र पर ईस्ट इण्डिया कम्पनी का अधिकार हो गया। अंग्रेजों का इस क्षेत्र  पर पूर्ण अधिकार 04 अप्रैल, 1816 को सुगौली की सन्धि के बाद इस पूरे क्षेत्र पर हो गया और नेपाल की सीमा काली नदी घोषित हुई।

अंग्रेजों ने पूरे इलाके को अपने शासन में न रख अप्रैल 1815 में ही गढ़वाल के पूर्वी हिस्से कुमायूं के क्षेत्र पर अपना अधिकार रखा और पश्चिमी हिस्सा सुदर्शन शाह जो गोरखों के शासन से पहले गढ़वाल के राजा थे को सौंप दिया जो अलकनन्दा और मंदाकिनी नदियों के पश्चिम में पड़ता था।

इस प्रकार गढ़वाल दो हिस्सों में बंट गया, पूर्वी हिस्सा जो कुमायूं के साथ ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया ‘‘ब्रिटिश गढ़वाल’’ कहलाया और पश्चिमी हिस्सा राजा सुदर्शनशाह के शासन में इसकी राजधानी टिहरी के नाम पर टिहरी गढ़वाल कहलाने लगा। टिहरी को राजा सुदर्शन द्वारा नयी राजधानी बनाया गया था क्योंकि पुरानी राजधानी श्री नगर अब ब्रिटिश गढ़वाल में आती थी।

ब्रिटिश गढ़वाल को बाद में 1840 में यहाँ पौड़ी में असिस्टेंट कमिश्नर की नियुक्ति के बाद इस क्षेत्र को पौढ़ी गढ़वाल भी कहा जाने लगा, जबकि इससे पहलेयह नैनीताल स्थित कुमायूं कमिशनरी के अन्तर्गत आता था।

दूसरी ओर कुमायूं क्षेत्र के पुराने शासक चंद राजा को यह अधिकार नहीं मिला और यह ब्रिटिश भारत का हिस्सा बन गया और ब्रिटिश चीफ कमीशनशिप के अन्तर्गत शासित लगा। जिसकी राजधानी (कमिश्नरी) नैनीताल में स्थित थी। भारत की आजादी तक टिहरी रजवाड़ा और ब्रिटिश शासन के अधीन रहा यह क्षेत्र आजादी के बाद उत्तर प्रदेश राज्य में मिला दिया गया।

उत्तराखंड में दो प्रकार की शासन व्यवस्था 

इस प्रकार अंग्रेजी शासन की स्थापना के बाद सन् 1815 से 1949 तक उत्तराखण्ड दो भिन्न प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाओं, टिहरी रियासत की राजशाही व शेष उत्तराखण्ड की ब्रिटिश शासन व्यवस्था के अधीन संचालित होने लगा। परन्तु मूल रूप से सम्पूर्ण उत्तराखण्ड सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं पर्यावरण की दृष्टि से एक समान था। स्पष्ट था कि अंग्रेजों के आगमन के पश्चात प्रथम बार दो भिन्न-भिन्न प्रकार की शासन पद्धतियों के अन्तर्गत उत्तराखण्ड का जनमानस शासित होने लगा।

इस प्रकार टिहरी रियासत और कुमायूं डिवीजन में विशेष रूप से प्रशासन के तौर-तरीकों में मूलभूत परिवर्तन आ गया था। कुमायूं कमिश्नरी की ब्रिटिश सरकार और जनता, जातीयता और भाषायी दृष्टिकोण से एक दूसरे से पूर्णतया भिन्न थे। उत्तराखण्ड में एक ओर टिहरी रियासत में शताब्दियों पूर्व से चली आ रही परम्परागत राजशाही थी तो दूसरी ओर अंग्रेजो की औपनिवेशिक सरकार का अधिकारों से परिपूर्ण अधिकारी तंत्र था। 

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ब्रिटिश उपनिवेशवाद: उत्तराखण्ड में पर्यावरण पर प्रभाव

ब्रिटिश उपनिवेशवाद या ब्रिटिश साम्राज्यवाद, ब्रिटिश इम्पीर के रूप में भी जाना जाता है, एक ऐसी राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवस्था है जो ब्रिटिश साम्राज्य के स्थापित होने के बाद 18वीं सदी से लेकर 20वीं सदी के अंत तक स्थापित रही। इस व्यवस्था में ब्रिटिश सरकार ने अन्य देशों को अपने अधीन करने के लिए सत्ता, संसाधन और संस्कृति का उपयोग किया।

ब्रिटिश उपनिवेशवाद: उत्तराखण्ड में पर्यावरण पर प्रभाव

ब्रिटिश उपनिवेशवाद

ब्रिटिश उपनिवेशवाद के अंतर्गत ब्रिटिश सरकार ने अपने साम्राज्य के विभिन्न भागों में राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थाओं को स्थापित किया और इसका उपयोग अपने लाभ के लिए किया। उदाहरण के लिए, वे अधिकांश उपनिवेशों में अपनी वस्तुओं को बेचने वाले व्यापारिक नीतियों को लागू करते रहे। वे भी अपने साम्राज्य के लोगों को विभिन्न स्तरों पर बंटाकर संभालते रहे।

ब्रिटिश उपनिवेशवाद का स्वरूप 

उपनिवेशवाद का मूल तत्व आर्थिक शोषण में निहित है। परन्तु इसका अभिप्रायः यह बिल्कुल नहीं है कि एक उपनिवेश पर राजनीतिक कब्जा बनाए रखना महत्वपूर्ण नहीं है। उपनिवेशवाद की प्रकृति मुख्यतः इसके आर्थिक शोषण के विभिन्न तरीकों से जानी जाती है। आर्थिक शोषण कुछ खास तरीकों से सम्पन्न हो सकता है। इसका अर्थ यह है कि उपनिवेश राष्ट्रीय उत्पादन की एक विशेष मात्रा का उत्पादन करता है जिसका एक भाग उस उपनिवेश के रख-रखाव और निर्वाह के लिए आवश्यक होता है। इसके अलावा जो बचता है वह उस उपनिवेश का आर्थिक अधिशेष होता है।

ऐतिहासिक दृष्टिकोण से उपनिवेशवाद एक ऐसी प्रक्रिया थी जो यूरोप के उप महानगरों द्वारा आरम्भ की गई जहाँ व्यापारिक या औद्योगिक क्रांति पहले हुई। अंग्रेज पहले विजेता थे जिनकी सभ्यता श्रेष्ठतर थी और इसलिए हिन्दुस्तानी सभ्यता उन्हें अपने अन्दर न समेट सकी। उन्होंने स्थानीय समुदायों को तोड़कर भारतीय सभ्यता को नष्ट कर दिया, स्थानीय उद्योग को जड़ से उखाड़ फेंका तथा स्थानीय समाज में जो कुछ उन्नत और श्रेष्ठ था उसे मटियामेट कर दिया। भारत में ब्रिटिश शासन के ऐतिहासिक पृष्ठ विनाश की कहानी के सिवाय और कुछ नहीं कहते।

भारत में ब्रिटिश उपनिवेशवाद लगभग दो सौ वर्षों तक रहा। औपनिवेशिक हितों तथा विदेशी पूँजीवाद के प्रकार के लिए यह आवश्यक हो गया था कि भारत प्रशासनिक तथा आर्थिक दृष्टि से एक ही इकाई हो ताकि अधिक से अधिक शोषण किया जा सके। अपने इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए ईस्ट इण्डिया कम्पनी ने अपने भारतीय साम्राज्य के विस्तार के क्रम में 1815 में गोरखाओं के साथ सिगौली की सन्धि के उपरान्त उत्तराखण्ड में औपनिवेशिक शासन व्यवस्था की नींव डाली गई। और यह भारत की स्वाधीनता तक अनवरत चलती रही। औपनिवेशिक प्रशासकों ने गढ़वाल का आधा हिस्सा टिहरी रियासत के नाम से पंवार राजवंश को सौंपा। किन्तु परदे के पीछे शासन ब्रिटिश क्राउन का ही था।

साम्राज्यवाद और उसके सिद्धांत-Part 1

 उत्तराखंड में ब्रिटिश उपनिवेशवाद का प्रवेश

उत्तराखण्ड हिमालय में ब्रिटिश साम्राज्यवादी नई व्यवस्था के प्रणयन के उपरान्त इस क्षेत्र के निवासियों की जीवन पद्धति और परम्परागत आर्थिक व्यवस्था व संसाधनों के शोषण के स्वरूप में ऐतिहासिक परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई। प्रायः यह कहा जाता है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद ने भारतीय सामाजिक जीवन को सबसे कम प्रभावित किया।

ब्रिटिश प्रशासकों द्वारा आर्थिक, व्यावसायिक और औ़द्योगिक आवश्यकताओं की पूर्ति तथा साम्राज्यवादी हितों के संरक्षण के लिए औपनिवेशिक चिन्तन पर आधारित नीतियां बनाई गई। इस क्षेत्र में उपलब्ध प्राकृतिक सम्पदा का अधिकाधिक दोहन किया जाने लगा और ग्रामीण जनता के प्राकृतिक अधिकारों को प्रतिबंधित किया जाने लगा।

परिणामस्वरूप औपनिवेशिक शासन तथा ग्रामीणों के प्राकृतिक परम्परागत अधिकारों को लेकर तत्कालीन समय में विस्तृत बहस छिड़ गयी थी परन्तु विजेता होने के कारण औपनिवेशिक हितों की ही विजय हुई। अब ग्रामीण औपनिवेशिक शासकों की कृपा कर आश्रित हो गये। बदलाव व हस्तक्षेप की इस प्रक्रिया ने उत्तराखण्ड के ग्रामीण कृषकों और वनों में निवास करने वाली आदिवासी जनजातियांे की जीवन-पद्धति व उत्पादन से जुड़े प्रत्येक कारक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।

इसी काल में तराई-भाबर में थी थारू, बुक्सा जनजातियों की परम्परागत बस्तियां, समाप्त होने लगी। पश्चिमी हिमालय में वनो के दोहन से बढ़ते दबावों के कारण तराई क्षेत्रों की ओर गुज्जर जनजातियों का आव्रजन बड़ी संख्या में तेजी से होना प्रारम्भ हुआ समय पर उत्तराखण्ड के किसानों ने अपने परम्परागत वन्य अधिकारों की प्राप्ति के लिए असन्तोष और सामूहिक प्रतिक्रिया विरोध के रूप में व्यक्त की। ग्रामीणों का असन्तोष मूलतः भू-प्रबन्ध, वन प्रबन्ध और औपनिवेशिक नीतियों का परिणाम था।

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सल्तनत कालीन प्रशासन | Saltanat Kalin Prashasan

भारत पर मुस्लिम साम्राज्य स्थापित होने के पश्चात् एक नए प्रकार की शासन व्यवस्था ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया।  भारतीय राजा जहां उदारवादी दृश्टिकोण रखते थे वहीँ ये अरब और अफगानिस्तान से सम्बंधित कट्टर इस्लाम को मानने वाले सुल्तान कहीं ज्यादा कट्टर और दैवीय अधिकारों में विश्वाश करते थे। इस्लाम वास्तव में  कबिलाई संस्कृति … Read more

उत्तराखंड में पर्यावरण के संरक्षण के सन्दर्भ में ग्रामीण, जनजातियों एवं महिलाओं की भूमिका

  उत्तराखंड में पर्यावरण के संरक्षण के सन्दर्भ में ग्रामीण, जनजातियों एवं महिलाओं की भूमिका           उत्तराखण्ड का इतिहास संघर्षों का इतिहास रहा है। यहाँ का ग्रामीण एवं जनजातीय समाज अपने हितों की रक्षा के लिए हमेशा तत्पर रहा है। उसके अपने प्राकृतिक एवं सामाजिक अधिकारों के लिए अनादिकाल से संघर्ष … Read more

हड़प्पा सभ्यता से संबंधित प्रमुख पुरातत्ववेत्ता | Major archaeologist related to Harappan civilization

हड़प्पा सभ्यता को दुनियां के नक्से पर लाने वाले पुरातत्ववेत्ता जिनके नाम ही हम सुनते हैं, जैसे जॉन मार्शल, दयाराम साहनी, राखालदास बनर्जी, मार्टिन व्हीलर, अमलानंद घोष, अर्नेस्ट मैके, अरेल स्टीन, जे. पी. जोशी आदि।  इस लेख के द्वारा हम तीन  प्रमुख पुरातत्ववेत्ताओं सर जॉन मार्शल, दयाराम साहनी और राखालदास बनर्जी के विषय में विस्तार … Read more

सिन्धु घाटी सभ्यता की नगर व्यवस्था | Sindhu Ghaati Sabhyta Ki Nagar Vyavastha

संपूर्ण विश्व में सिंधु सभ्यता जैसी नगर योजना अन्य किसी समकालीन सभ्यता में नहीं पाई गई है। सिंधु सभ्यता के नगर पूर्व नियोजित योजना से बसाये गए थे। सिंधु सभ्यता की  नगर  योजना को देखकर विद्वानों को भी आश्चर्य होता है कि आज भी हम उस सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन करें तो हम अपने आपको आज भी पिछड़ा हुआ ही पाते हैं।

सिन्धु घाटी सभ्यता की नगर व्यवस्था | Sindhu Ghaati Sabhyta Ki Nagar Vyavastha
सिन्धु घाटी सभ्यता की नगर व्यवस्था

नगरीय सभ्यता के जो प्रतीक होते हैं, और नगर की विशेषताएं होती हैं जैसे– आबादी का घनत्व, आर्थिक एवं सामाजिक प्रक्रियाओं में घनिष्ठ समन्वय, तकनीकी-आर्थिक विकास, व्यापार और वाणिज्य के विस्तार एवं प्रोन्नति के लिए सुनियोजित योजनाएँ तथा दस्तकारों और शिल्पकारों के लिए काम के समुचित अवसर प्रदान करना आदि।

हड़प्पा कालीन नगर योजना को इस प्रकार से विकसित किया गया था कि वह अपने नागरिकों के इन व्यवसायिक, सामाजिक एवं आर्थिक आवश्यकताओं को पूरा करने में सक्षम थी। हड़प्पा सभ्यता का नगरीकरण इसकी विकसित अवस्था से जुड़ा है अनेक विद्वानों ने हड़प्पा कालीन नगरीकरण को ‘नगरीय क्रांति’ की संज्ञा दी है, जिसका किसी शक्तिशाली केंद्रीय सत्ता, विशिष्ट आर्थिक संगठन एवं सामाजिक-सांस्कृतिक एकता के बिना विकास नहीं हो सकता था।

हम वर्तमान नगरीकरण के संदर्भ में सिंधु सभ्यता की नगरीय विशेषताओं का तुलनात्मक अध्ययन करके वर्तमान के लिए विकास का मार्ग तैयार कर सकते हैं। जब हम देखते हैं कि आज भी भारत के बड़े-बड़े नगरों में बरसात के दिनों में जलभराव के कारण संकट उत्पन्न हो जाता है तब हमें धौलावीरा जैसे हड़प्पायी नगरों की याद आती है जहां वर्षा के पानी को एकत्र करने के विशिष्ट इंतजाम किए गए थे और हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो जैसे नगरों में जल को शहर से बाहर निकालने के लिए सुनियोजित नालों को तैयार किया गया था। आइए देखते हैं उस समय की नगरीय व्यवस्था किस प्रकार की थी–

सिंधु सभ्यता की नगरीय व्यवस्था

सिंधु सभ्यता के बड़े नगरों एवं कस्बों की आधारभूत संरचना एक व्यवस्थित नगर योजना को दर्शाती है। सड़कें और गलियां एक योजना के तहत निर्मित की गई थीं। मुख्य मार्ग उत्तर से दक्षिण की ओर जाते हैं तथा उनको समकोण पर काटती सड़कें और गलियां मुख्य मार्ग को विभाजित करती हैं

 सिंधु सभ्यता के नगर सुविचार इत एवं पूर्व नियोजित योजना से तैयार किए गए थे। गलियों में दिशा सूचक यंत्र भी लगे हुए थे जो मुख्य मार्गो तथा मुख्य मार्ग  से जाने वाली छोटी गलियों को दिशा सूचित करते थे।

 सड़कें और गलियां  9 से लेकर  34 फुट चौड़ी थीं और कहीं-कहीं पर आधे मील तक सीधी चली जाती थी। ये मार्ग समकोण पर एक-दूसरे को काटते थे जिससे नगर वर्गाकार या आयताकार खंडों में विभाजित हो जाते थे। इन वर्गाकार या आयताकार खंडों का भीतरी भाग मकानों से भरी गलियों से विभाजित था।

 मोहनजोदड़ो की हर गली में सार्वजनिक कुआं होता था और अधिकांश मकानों में निजी कुऍं और स्नानघर होते थे। सुमेर की भांति सिंधु सभ्यता के नगरों में भी भवन कहीं भी सार्वजनिक मार्गों का अतिक्रमण करते दिखाई नहीं पड़ते।

 मोहनजोदड़ो, हड़प्पा, कालीबंगा, सुरकोटड़ा जैसे कुछ महत्वपूर्ण नगर दो भागों में विभाजित थे—-

1- ऊंचे टीले पर स्थित प्राचीन युक्त बस्ती जिसे नगर-दुर्ग कहा जाता है। तथा

2- इसके पश्चिम की ओर के आवासीय क्षेत्र को निचला नगर कहा जाता है। 

   हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, कालीबंगा और सुरकोटड़ा में नगर-दुर्ग का क्षेत्रफल निचले नगर से कम था और वह हमेशा इसके पश्चिम में स्थित होता है।

मोहनजोदड़ो के नगर-दुर्ग में पाए गई भव्य इमारतें जैसे– विशाल स्नानागार, प्रार्थना-भवन, अन्नागार एवं सभा-भवन पकाई गई ईंटों से बनाए गए थे।

हड़प्पा को सिंधु सभ्यता की दूसरी राजधानी माना जाता है। यहां के नगर-दुर्ग के उत्तर में कामगारों (दस्तकारों) के आवास, उनके कार्यस्थल (चबूतरे) और एक अन्नागार था। यह पूरा परिसर यह दिखाता है कि यहां के कामगार बड़े अनुशासित थे।

राजस्थान में विलुप्त सरस्वती (घग्गर) नदी के बाएं तट पर स्थित कालीबंगा की नगर योजना वैसी ही थी जैसी कि मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की थी अर्थात पश्चिम दिशा में नगर-दुर्ग एवं पूर्व दिशा में निचला नगर। अर्थात नगर-दुर्ग के दो समान एवं सुनिर्धारित भाग थे—

 प्रथम भाग- दक्षिणी भाग में कच्ची ईंटों के बने विशाल मंच या चबूतरे थे जिन्हें विशेष अवसरों के लिए बनाया गया था।

द्वितीय भाग- उत्तरी भाग में आवासीय मकान थे।

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प्राचीन भारतीय इतिहास के 300 अति महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी

प्राचीन भारतीय इतिहास के 300 अति महत्वपूर्ण सामान्य ज्ञान  प्रश्नोत्तरी

प्राचीन भारतीय इतिहास

1- हड़प्पा की खोज किसने की 

उत्तर- दयाराम साहनी ने 

2- मोहनजोदड़ो को खोज किसने की 

उत्तर- राखालदास बनर्जी 

3-सिंधु सभ्यता किस प्रकार की सभ्यता थी 

उत्तर- नगरीय सभ्यता ( शहरी )

4-सिंधु घाटी सभ्यता का वह कौनसा स्थल है जहाँ से ईंटों से निर्मित कृत्रिम गोदी ( डॉकयार्ड )  मिला है 

उत्तर- लोथल 

5-हड़प्पा का बिना दुर्गवाला एकमात्र नगर 

उत्तर- चन्हूदड़ो 

6-मातृदेवी की पूजा किस सभ्यता से सम्बंधित है 

उत्तर- सिंधु सभ्यता से 

7-मिथिला राज्य से संबंधित तीन प्राचीन ऋषि 

उत्तर- कपिल मुनि , गार्गी और मैत्रेय 

8-वैदिक काल में लोहे का प्रयोग किस समय हुआ 

उत्तर- 1000 ईसा पूर्व के आसपास 

9- श्रमण कौन थे 

उत्तर- वैदिक काल के वे अध्यापक जो वेद और ब्राह्मण विरोधी शिक्षा देते थे वह ‘श्रमण’ कलाते थे 

10-हिन्दू धर्म के चार आश्रम कौन से हैं 

उत्तर- ब्रह्मचर्य – गृहस्थ – वानप्रस्थ – सन्यास 

11- सबसे प्राचीन वेद कौनसा है 

उत्तर- ऋग्वेद 

12- उपनिषद का क्या अर्थ है 

उत्तर- पास बैठना 

13- महाभारत का प्रथम नाम 

उत्तर- जय सहिंता 

14- पशुपति शिव की प्राचीनतम उपास्थि 

उत्तर- सिंधु सभ्यता में 

15- किस प्रकार के वर्तन ( मृदभांड) भारत में द्वित्य नगरीकरण के प्रारम्भ का प्रतीक है 

उत्तर- उत्तरी काले पॉलिश युक्त बर्तन

16-  दिलवाड़ा ( माउन्ट आबू राजस्थान ) के मंदिर किस धर्म से सम्बंधित हैं

उत्तर- जैन धर्म

17- सत्यमेव जयते किस ग्रन्थ से है लिया गया है 

उत्तर- मुंडकोपनिषद 

18- हड़प्पा के लोगो की सामाजिक व्यवस्था कैसी थी 

उत्तर- उचित समतावादी 

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सिन्धु घाटी सभ्यता-sindhu ghati sabhyata

 सिन्धु घाटी सभ्यता-sindhu ghati sabhyata      सिंधु घाटी सभ्यता ( Indus Valley Civilization ) – बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ तक अधिकांश विद्वान यही मानते थे कि वैदिक सभ्यता भारत की सर्वप्राचीन सभ्यता है और भारत का इतिहास वैदिक काल से ही प्रारंभ माना जाता था। परंतु बीसवीं शताब्दी के तृतीय दशक में इस भ्रामक धारणा … Read more

मौलिक अधिकार हिंदी में | Fundamental Rights In Hindi

Fundamental Rights -मौलिक अधिकार बुनियादी मानवाधिकारों के एक समूह को संदर्भित करते हैं जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए उनकी जाति, लिंग, धर्म, राष्ट्रीयता या किसी अन्य विशेषता की परवाह किए बिना निहित हैं। ये अधिकार किसी व्यक्ति के विकास और भलाई के लिए आवश्यक माने जाते हैं और कानून द्वारा संरक्षित हैं।

Fundamental Rights-मौलिक अधिकार हिंदी में

मौलिक अधिकार अक्सर किसी देश के संविधान में निहित होते हैं, और उनमें आम तौर पर जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता और व्यक्ति की सुरक्षा, भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, काम करने का अधिकार और शिक्षा का अधिकार, वोट देने का अधिकार और सरकार में भाग लेने का अधिकार शामिल होता है। कानून के तहत समान सुरक्षा का अधिकार।

मौलिक अधिकारों की अवधारणा समय के साथ विकसित हुई है, और अब इसे व्यापक रूप से लोकतांत्रिक समाजों की आधारशिला के रूप में मान्यता प्राप्त है। न्यायसंगत और समतामूलक समाज सुनिश्चित करने के लिए मौलिक अधिकारों का संरक्षण और संवर्धन आवश्यक है जहां सभी को गरिमा और सम्मान के साथ जीने का अवसर मिले।

भारत जैसे विशाल एवं विविधतापूर्ण देश में जहाँ सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक रूप से नागरिकों में पर्याप्त विभेद हैं, उस देश में मूल अधिकारों का महत्व और भी ज्यादा बढ़ जाता है। भारत में नागरिक अधिकारों का प्रारम्भ ब्रिटिशकालीन भारत में ही प्रारम्भ हुआ। भारत की आज़ादी के बाद भारत के संविधान में नागरिकों के सर्वांगीण विकास के लिए मूल अधिकारों की व्यवस्था की गयी।

मूल अधिकार वह अधिकार होते हैं जो संविधान अपने नागरिकों को प्रदान करता है, उन्हें प्रायः प्राकृतिक अधिकार अथवा मूल अधिकार की संज्ञा दी जाती है। मूल अधिकारों का उद्देश्य सरकार अथवा राज्यों को मनमानी करने से रोकना है और नागरिकों को सर्वांगीण विकास के अवसर प्रदान करना है। ये अधिकार न्यायलय द्वारा बाध्य किये जा सकते हैं और कोई भी नागरिक सर्वोच्च न्यायालय में ऐसा करने के लिए जा सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय उन सभी कानूनों को जो इन अधिकारों का उल्लंघन करते हैं अथवा अपमानित करते हैं उन्हें अवैध घोषित कर सकता है। परन्तु मूल अधिकार पूर्णतया असीमित (Absolute) नहीं हैं। सरकार आवश्यकता पड़ने पर उन्हें सीमित कर सकती है। संविधान के 42वें संसोधन विधेयक ने संसद द्वारा इन मूल  को सीमित करने का अधिकार स्वीकार कर लिया गया।

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