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President of India, Appointment, Qualifications, Salary and Powers | भारत के राष्ट्रपति, नियुक्ति, योग्यताएं,वेतन और शक्तियां

     भारतीय संविधान में भारत की संघीय कार्यपालिका का मुखिया राष्ट्रपति है। इस प्रकार संघ की सभी शक्तियां राष्ट्रपति में निहित हैं, संविधान के अनुसार वह अपनी शक्तियों का प्रयोग स्वयं या अधीनस्थ पदाधिकारियों के माध्यम से करता है – अनुच्छेद -53(1).

President of India, Appointment, Qualifications, Salary and Powers | भारत के राष्ट्रपति, नियुक्ति, योग्यताएं,वेतन और शक्तियां

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President of India, Appointment, Qualifications, Salary and Powers | भारत के राष्ट्रपति, नियुक्ति, योग्यताएं,वेतन और शक्तियां

भारत के राष्ट्रपति पद के लिए योग्यताएं | Qualification of the President

भारत के राष्ट्रपति पद के लिए निम्नलिखित योग्यताएं निर्धारित हैं-
1-वह भारत का नागरिक हो, सबसे पहली शर्त है।
2- वह 35 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुका हो तथा
3- लोकसभा का सदस्य निर्वाचित होने की योग्यता रखता हो।

नोट-ऐसा कोई भी व्यक्ति राष्ट्रपति पद के लिए योग्य नहीं होगा जो किसी स्थानीय प्राधिकरण, राज्य अथवा केंद्र में किसी लाभ के पद पर न हो। स्पष्ट है कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यों के राहीपाल और संघ अथवा राज्यों के मंत्रियों के पदों को लाभ का पद नहीं माना जाता।

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राष्ट्रपति की चयन प्रक्रिया

राष्ट्रपति पद के लिए काम से काम 50% मतदाताओं द्वारा अनुमोदित होना चाहिए। *1998 से पूर्व यह संख्या 10-10 थी।

राष्ट्रपति के पद के लिए जमानत राशि 15000 रूपये है। किसी उम्मीदवार द्वारा कुल वैध मतों का 1/6 भाग मत न प्राप्त करने पर उसकी जमानत राशि जब्त हो जाती है।

राष्ट्रपति संसद अथवा राज्य विधानमंडल के किसी भी सदन का सदस्य नहीं होगा। यदि निर्वाचन की तिथि के पूर्व वह इनका सदस्य है तो निर्वाचन की तिथि से उसका स्थान उस सदन से रिक्त समझा जायेगा।

अनुच्छेद 59 के अनुसार राष्ट्रपति अपने कार्यकाल में किसी अन्य पद को धारण नहीं कर सकता।

अनुच्छेद 57 के अनुसार कोई भी वयक्ति राष्ट्रपति पद पर एक बार से ज्यादा निर्वाचित हो सकता है। लेकिन संविधान में इस बात पर संसय है कि कितनी बार चुना जा सकता है।

*दो बार राष्ट्रपति सिर्फ अब तक डॉ राजेंद्र प्रसाद ही चुने गए हैं। ( 1952 तथा 1957)-अमेरिकी संविधान में एक व्यक्ति सिर्फ 2 बार राष्ट्रपति चुना जा सकता है।

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राष्ट्रपति का निर्वाचक मंडल – Electoral College of of the President

संविधान के अनुच्छेद 54 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन ऐसे ‘निर्वाचक मंडल’ द्वारा किया जायेगा जिसमें —
1- संसद के दोनों सदनों ( लोकसभा – राज्यसभा) के सभी निर्वाचित सदस्य तथा
2-तथा राज्यों की विधान सभाओं के सदस्य

*जिन राज्यों में विधान परिषद है उनके सदस्य इसमें भाग नहीं लेते।

*ध्यान दें कि 70 वे संविधान संसोधन 1992 द्वारा राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और पुडुचेरी संघ शासित राज्य के निर्वाचित सदस्य भी राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में शामिल कर लिया गया है।

* उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति के निर्वाचक मंडल में संसद तथा राज्यों की विधान सभाओं के मनोनीत सदस्य और राज्य विधान परिषद् के सदस्यों को शामिल नहीं किया गया है।

राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीती | Manner of Election OF The President

  • राष्ट्र्पति का चुनाव ‘अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली’ द्वारा होता है।
  • अन्नुछेद -55 में राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीती दी गई है।
  • अनुच्छेद 55 के अनुसार राष्ट्रपति का निर्वाचन “आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति ( Proportional Repersentation System) के अनुसार ‘संक्रमणीय मत प्रणाली ( single transferable system) द्वारा होगा और ऐसे निर्वाचन में मतदान गुप्त होगा।

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राष्ट्रपति के निर्वाचन में निम्न दो सिद्धांतों को अपनाया जाता है —

1- समरूपता एवं समतुल्यता का सिद्धांत – इस सिद्धांत के अनुसार विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों के समतुल्य के मापन में एकरूपता तथा विभिन्न राज्यों और संघ के प्रतिनिधित्व में समतुल्यता रखी जाएगी। दूसरे शब्दों में इसे ऐसे समझ सकते हैं सभी राज्यों के निर्वाचित विधान सभा सदस्यों के मतमूल्य के निर्धारण के लिए एक ही प्रक्रिया अपनायी जाएगी तथा राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मतमूल्य का योग, संसद के दोनों सदनों के सभी निर्वाचित सदस्यों के मतमूल्य के योग के समतुल्य अर्थात समान होगा।

    इसे आनुपातिक प्रतिनिधित्व का सिद्धांत भी कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार विधानसभा सदस्यों तथा संसद सदस्यों के मतमूल्य की ( ऐसे मत की जिसे वह राष्ट्रपति निर्वाचन में देने का हक़दार होता है) की गणना अधोलिखित प्रक्रिया के अनुसार की जाती है —

विधान सभा के सदस्यों के मत का मूल्य –

      किसी विधान सभा के किसी सदस्य के मत का मूल्य जानने के लिए -उस राज्य की कुल जनसँख्या में, उस राज्य की विधान सभा के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाता है। तथा प्राप्त भागफल को पुनः एक हज़ार से विभाजित किया जाता है। इस प्रकार प्राप्त भागफल उस राज्य विशेष के किसी एक निर्वाचित सदस्य का मतमूल्य होता है। किन्तु यदि विभाजन के पश्चात् शेषफल 500 या उससे अधिक आता है तब उक्त भागफल में एक जोड़ दिया जाता है। इसी अधोलिखित सूत्र द्वारा दर्शित किया जा सकता है —

किसी राज्य की विधान सभा के एक सदस्य के मत का मूल्य

               राज्य की कुल जनसख्या

=   ————————————————–

         निम्न सदन के कुल निर्वाचित सदस्यों की संख्या x 1000

         उस राज्य के सभी निर्वाचित सदस्यों का मतमूल्य जानने के लिए सभी निर्वाचित सदस्यों की संख्या से, उस राज्य के एक निर्वाचित सदस्य के मतमूल्य में गुणा किया जाता है *जनसख्या से तात्पर्य 1971 की निर्धारित जनसँख्या है।

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संसद के सदस्यों के मत मूल्य निर्धारण की गणना

     संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों में से किसी एक सदस्य के मत का मूल्य जानने के लिए, सभी राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों के मत का मूल्य जोड़कर उसमें संसद के सभी निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग दिया जाता है —-

                 संसद के एक सदस्य का मतमूल्य

            सभी राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित मतमूल्य का योग

=   ————————————————–

            संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की संख्या

एकल संक्रमणीय मत प्रणाली सिद्धांत

      इस सिद्धांत के अनुसार यदि प्रत्याशियों की संख्या एक से अधिक है तो प्रत्येक मतदाता उतने मत वरीयता क्रम से देगा जितने प्रत्याशी हैं। अर्थात प्रत्येक मतदाता, प्रत्येक प्रत्याशी को अपना मत वरीयता क्रम के अनुसार देता है। यथा -यदि कुल तीन प्रत्याशी राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ रहे हैं तो मतदाता तीनों प्रत्याशियों को प्रथम, द्वितीय और तृतीय वरीयता क्रम के अनुसार अपना मत देगा।

मतगणना

    राष्ट्रपति पद के चुनाव में मतगणना के लिए एक विशेष प्रावधान किया गया है। राष्ट्रपति पद के लिए उसे ही सफल घोषित किया जाता है जो कुल वैध मतों का एक मत से अधिक 50% से अधिक प्राप्त करता है। इसे न्यूनतम कोटा कहा जाता है।

कुल पड़े वैध मत

न्यूनतम कोटा =——————————– + 1
2

     मतगणना के समय सबसे पहले प्रथम वरीयता के मतों की गणना की जाती है। यदि कोई प्रत्याशी न्यूनतम कोटा प्राप्त कर लेता है तो उसे सफल घोषित कर दिया जाता है। यदि कोई भी उम्मीदवार न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं करता है तो द्वितीय चक्र की गणना प्रारम्भ की जाती है। इसमें सबसे कम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी को स्पर्धा से बाहर कर दिया जाता है, उसके मतपत्रों के द्वितीय वरीयता के मतों की गणना की जाती है तथा उसे अन्य उम्मीदवार द्वारा प्राप्त प्रथम वरीयता के मतों में जोड़ दिया जाता है।

   यदि द्वितीय चक्र की गणना के बाद भी कोई उम्मीदवार न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं कर पाता तो उक्त प्रक्रिया पुनः दुहराई जाती है और वह तब तक चलती है जब तक किसी उम्मीदवार को न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं हो जाता।

उदाहरण – माना कि राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव में कुल चार उम्मीदवार है -A, B, C, तथा D कुल प्राप्त वैध मत 2500 हैं अतः न्यूनतम कोटा 1251 हुआ। माना कि प्रथम वरीयता में -A, B, C, तथा D को क्रमशः 950, 700, 500 तथा 350 मत प्राप्त हुए।

     स्पष्ट है किसी भी उम्मीदवार को न्यूनतम कोटा 1251 प्राप्त नहीं हुआ। अतः सबसे काम मत प्राप्त करने वाले प्रत्याशी D को स्पर्धा से बाहर कर उसके द्वारा प्राप्त 350 मतपत्रों में द्वितीय वरीयता के मतों की गणना की जाएगी।

     माना कि 350 मतपत्रों में द्वितीय वरीयता पर A को 50, B को 100 तथा C को 200 मत प्राप्त हुए। इसे प्रथम वरीयता के मतों में जोड़ने पर A, B तथा C के कुल मत क्रमशः 1000, 800 तथा 700 हुए, अतः अब भी किसी को न्यूनतम कोटा प्राप्त नहीं हुआ। अतः अब तृतीय चक्र की गणना की जाएगी, जिसमें सबसे कम मत प्राप्त करने वाले उम्मीदवार C को स्पर्धा से बाहर जायेगा और उसे प्राप्त 700 मतों को तृतीय वरीयता के मतों में जोड़ दिया जायेगा।

       अब तृतीय वरीयता की गणना में माना A को 200 तथा B को 500 मत प्राप्त हुए अतः तृतीय चक्र की गणना के बाद A के 1200 तथा B के 1300 मत हो गए। इस प्रकार B को न्यूनतम कोटा 1251 से अधिक मत प्राप्त हुए और वह सफल हुआ। यद्यपि उसने प्रथम चक्र एवं द्वितीय चक्र की गणना में A से कम मत प्राप्त किये थे।

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राष्ट्रपति कार्कयकाल

   अनुच्छेद 56 के अनुसार राष्ट्रपति का कर्यकाल 5 वर्ष होगा। किन्तु वह 5 वर्ष से पूर्व भी अपना इस्तीफा उपराष्ट्रपति को सौंप सकता है। उपराष्ट्रपति तत्काल इसकी सूचना लोकसभा अध्यक्ष को देता है।

राष्ट्रपति द्वारा शपथ

अनुच्छेद 60 के अनुसार राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय के मुख्य नयायधीश अथवा उनकी अनुपस्थिति में उच्चतम के ज्येष्ठतम न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है।

राष्ट्रपति और वेतन, भत्ते

अनुच्छेद 59 (3) के अनुसार राष्ट्रपति को निशुल्क आवास, के साथ वेतन, भत्ते एवं पेंशन मिलती है। 11 सितंबर 2008 को, भारत सरकार ने राष्ट्रपति के वेतन को बढ़ाकर ₹1.5 लाख (2020 में ₹3.6 लाख या US$4,700 के बराबर) कर दिया। भारत के 2018 के केंद्रीय बजट में इस राशि को और बढ़ाकर ₹5 लाख (2020 में ₹5.7 लाख या US$7,500 के बराबर) कर दिया गया। इसके अतिरिक्त आजीवन मुफ्त सुविधाएं मिलती हैं।

राष्ट्रपति पर महाभियोग

अनुच्छेद 61 में राष्ट्रपति पर महाभियोग की प्रक्रिया है। राष्ट्रपति द्वारा संविधान अतिक्रमण करने पर उसके विरुद्ध संसद के किसी भी सदन में महाभियोग प्रस्ताव लाया जा सकता है। इस प्रस्ताव की सूचना राष्ट्रपति को 14 दिन पहले देनी होगी। सदन के कम से कम एक चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर प्रस्ताव पर होने चाहिए। दो तिहाई सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित हो जाता है और आगे की जाँच के लिए दूसरे सदन में चला चला जाता है। अगर दूसरे सदन में भी प्रस्ताव पारित हो जाये तो राष्ट्रपति को उसके पद से हटना होगा। भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ है।

राष्ट्रपति के चुनाव संबंधी विवाद

अनुच्छेद 71 के अनुसार राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव संबंधी विवादों का निपटारा उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जायेगा तथा उसका निर्णय अंतिम होगा। यदि न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप निर्वाचन अवैध घोषित किया जाता है तो ऐसे व्यक्ति द्वारा राष्ट्रपति अथवा उपराष्ट्रपति के रूप में लिए गए निर्णय अवैध नहीं होंगे।

राष्ट्रपति की शक्तियां

संविधान में भारत के राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियां प्रदान की गई हैं।राष्ट्रपति की इन शक्तियों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है —
A – शांतिकालीन शक्तियां तथा
B – आपातकालीन शक्तियां

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1-कार्यपालिका शक्तियां

अनुच्छेद 53 के अनुसार संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होगी और इसका प्रयोग वह संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारीयों के माध्यम से करेगा। अधीनस्थ अधिकारीयों मतलब केंद्रीय मंत्रिमंडल से है। सरकार के सभी निर्णय अथवा कार्य राष्ट्रपति के नाम से किये जाते हैं।

अनुच्छेद 78 के अनुसार राष्ट्रपति को संघ के मामलों मे सूचना प्राप्त करने का अधिकार है।

राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किये जाने वाले अधिकारी

     अनुच्छेद 74 के अनुसार राष्ट्रपति अपनी कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का गठन कर सकता है जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है। अतः वह भारत के प्रधानमंत्री सहित संघ के अन्य प्रमुख अधिकारीयों की नियुक्ति करता है —

  • संघ के मंत्री
  • राज्यों के राज्यपाल
  • उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश
  • भारत के महान्यायवादी
  • भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक
  • संघ लोकसेवा अध्यक्ष एवं सदस्य
  • मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्त
  • राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य
  • राष्ट्रीय महिला आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्य
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति तथा जनजाति आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य
  • पिछड़ा वर्ग आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य
  • संघ राज्य क्षेत्रों के राज्यपाल या प्रशासक तथा मुख्यमंत्री ( दिल्ली व पुडुचेरी
  • वित्त आयोग तथा
  • राजभाषा आयोग

    राष्ट्रपति को संघ के कुछ प्रमुख अधिकारीयों को पदच्युत करने का भी अधिकार है -संघ के मंत्री, राज्यों के राज्यपाल भारत के महान्यायवादी आदि।

2- राष्ट्रपति की विधायी शक्तियां

     चूँकि संसद का गठन राष्ट्रपति, लोकसभा तथा राज्यसभा तीनों से मिलकर होता है ( अनुच्छेद-79 ) अतः राष्ट्रपति संघीय कार्यपालिका अभिन्न अंग है। अतः राष्ट्रपति को व्यापक शक्तियां प्राप्त हैं —
संसद का अधिवेशन बुलाने और समाप्ति की घोषणा। संसद के एक सत्र की अंतिम और आगामी सत्र की बैठक के मध्य 6 माह से अधिक का अंतराल नहीं होगा।

अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति समय पूर्व लोकसभा सत्र भंग अथवा लोकसभा विघटन कर सकता है।

राष्ट्रपति संसद के प्रत्येक प्रथम सत्र (प्रतिवर्ष) संसद के संयुक्त सत्र को सम्बोधित करता है। (अनुच्छेद 87)

किसी विधेयक के विवादित होने की दशा में राष्ट्रपति संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है। (अनुच्छेद 108 )

अनुच्छेद 331 के अनुसार राष्ट्रपति लोकसभा में 2 आंग्ल-भारतीय समुदाय के सदस्यों की नियुक्ति कर सकता है।

अनुच्छेद 80 द्वारा राष्ट्रपति राज्यसभा में 12 सदस्य मनोनित करता है।

अनुच्छेद 111 अनुसार राष्ट्रपति धन विधेयक तथा संविधान संसोधन को छोड़कर किसी भी विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है।
कुछ विधेयक राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना संसद में पेश नहीं किये जा सकते —

  • धन विधेयक अनुच्छेद- 110
  • किसी नए राज्य का निर्माण अथवा राज्य की सीमा या नाम में परिवर्तन अनुच्छेद- 3
  • भारत की संचित निधि से व्यय से संबंधित विधेयक अनुच्छेद -117
  • भूमि अधिग्रहण संबंधित विधेयक।
  • व्यपार की स्वतंत्रता को सिमित करने वाला राज्य का कोई विधेयक -अनुच्छेद -304
  • कराधान से संबंधित ऐसा विधेयक जो राज्य का हित प्रभावित विधेयक- अनुच्छेद 274
अध्यादेश जारी करने की शक्ति

    अनुच्छेद 123 के अनुसार राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने का अधिकार है। यह तब किया जाता है जब संसद का सत्र न चल रहा हो और किसी विधेयक की अबिलम्ब आवश्यकता हो। ऐसा अध्यादेश संसद के पुनः आहूत होने पर 6 सप्ताह में स्वयं समाप्त हो जाता है यदि संसद उसे पारित नहीं करती है।

3- राष्ट्रपति की न्यायिक शक्तियां

अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को क्षमादान की शक्ति प्राप्त है। यानि वह मृत्युदंड की सजा को बदल सकता है अथवा सजा कम कर सकता है या पूर्णतया मुक्त कर सकता है।

अनुच्छेद 143 के अनुसार राष्ट्रपति किसी विधि के मसले पर उच्चतम न्यायालय से परामर्श ले सकता है।

राष्ट्रपति अनुच्छेद 124 के तहत उच्चतम न्यायालय तथा अनुच्छेद 217 के तहत उच्च न्यायलय के न्यायधीशों की नियुक्ति करता है।

4-राष्ट्रपति की वित्तीय शक्तियां –

राष्ट्रपति प्रत्येक वर्ष संसद के सम्मुख आय-व्यय का विवरण ( बजट ) रखता है। अनुच्छेद 112 . राष्ट्रपति की बिना अनुमति के धन विधेयक, वित्त विधेयक और अनुदान मांगे लोकसभा में प्रस्तावित नहीं की जा सकती।

भारत की संचित निधि पर राष्ट्रपति का अधिकार होता है।
अनुच्छेद 280 के तहत राष्ट्रपति वित्त आयोग का गठन करता है।

5-राष्ट्रपति की सैन्य शक्तियां

भारत का राष्ट्र्पति तीनों सेनाओं ( थल, वायु तथा नौसेना ) का प्रधान सेनापति होता है। अनुच्छेद 53 (2) .

6- राष्ट्रपति की राजनयिक शक्तियां

संघीय कार्यपालिका का प्रमुख होने के नाते राष्ट्रपति वैदेशिक क्षेत्र में भारत का प्रतिनिधित्व करता है। वह वदेश में स्थित दूतावासों के लिए राजदूतों व कूटनीतिज्ञों की न्युक्ति करता है। विदेशों से संधियां और समझौते भी राष्ट्रपति के नाम से होते हैं।

7- राष्ट्रपति की अन्य शक्तियां

मंत्रियों का बँटबारा
विभिन्न आयोगों अध्यक्ष सदस्यों की न्युक्ति
किसी संसद सदस्य की अहर्ता के संबंध में विवाद के स्थिति में निर्वाचन आयोग से राय लेता है। अनुच्छेद 103

B – राष्ट्रपति की आपातकालीन शक्तियां

1-राष्ट्रीय आपात – अनुच्छेद 352- के तहत युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण उत्पन्न संकट की स्थिति में राष्ट्रीय आपात की घोषणा की जाती है। आपात काल की घोषणा संसद की अनुमति से 6 माह के लिए होती है। इसके पुनः अथवा समय बढ़ाने के लिए पुनः अनुमति लेनी होगी। अब तक तीन बार राष्ट्रीय आपात की घोषणा हुई है -1962- भारत-चीन युद्ध, 1971 -भारत-पाकिस्तान युद्ध और 1975 में आंतरिक अशांति के कारण ( इंद्रा गाँधी द्वारा ).

2-राज्यों में राष्ट्रपति शासन – अनुच्छेद 356
किसी राज्य में कानून व्यवस्था की खराब स्थिति के कारण संसद की अनुमति से राष्ट्रपति राज्य पाल की सलाह पर राज्य में सरकार को बर्खास्त करके राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा सकता है।

3- राष्ट्रपति की वित्तीय आपात की शक्तियां

अनुच्छेद 360 के अनुसार देश में वित्तीय संकट की स्थिति में वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकता है।

    इस प्रकार भारत का राष्ट्रपति बेहद महत्वपूर्ण होता है। उसके पास ढेर सारी शक्तियां हैं तथा वह इनका प्रयोग मंत्रिमंडल की सहायता से करता है।

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