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ईश्वर चंद्र विद्यासागर, स्त्री शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने वाले समाजसुधारक

      बंगाल में लड़कियों को स्कूल ले जाने वाली गाड़ियों, पालकियों तथा शिक्षण संस्थाओं की दीवारों पर मनुस्मृति का एक श्लोक लिखा रहता था। जिसका अर्थ था –  ‘बालिकाओं को भी बालकों के समान शिक्षा पाने का पूरा अधिकार है।’

ईश्वर चंद्र विद्यासागर का जन्म कहाँ हुआ था

    ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जन्म वीर सिंह नामक गाँव में हुआ था। इनकी माता बहुत अच्छे विचारों की थीं। सभी का सम्मान करना और अपना काम स्वयं करना, यह शिक्षा उन्हें अपनी माता से मिली थी।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर की शिक्षा

        ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही विद्यालय में हुई थी। उच्च शिक्षा के लिए वे कलकत्ता(अब कोलकाता) के संस्कृत विद्यालय में गये। संस्कृत की शिक्षा के साथ – साथ वे अंग्रेजी की शिक्षा भी प्राप्त करते रहे। सन 1839 ईसवी में लॉ कमेटी की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर उन्हें विद्यासागर की उपाधि मिली।

       इसके अलावा न्यायदर्शन की परीक्षा उत्तीर्ण करने पर 100 रुपये तथा संस्कृत काव्य रचना पर 100 रुपये का नकद पुरस्कार दिया गया। ईश्वर चंद्र विद्यासागर का हस्त लेख बहुत सुंदर था, इसलिए उन्हें मासिक छात्रवृत्ति भी मिलती थी गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर ने ईश्वर चंद्र विद्यासागर को आधुनिक बंगाल काव्य का जनक माना है।

बंगाल में शिक्षा के लिए कार्य

     ईश्वर चंद्र विद्यासागर स्कूलों के सहायक निरीक्षक के पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने शिक्षा की बहुत सी कमियों में सुधार किया । उन्होंने बंगाल के सभी जिलों में पूरी तरह स्वदेशी भारतीय शिक्षा देने वाले बीस विद्यालय भी खोले, जिन्हें आदर्श विद्यालय कहा जाता था।

     उन दिनों संस्कृत कालेज में केवल उच्च जाति के लोगों को ही प्रवेश दिया जाता था। ईश्वरचंद विद्यासागर ने इसका कड़ा विरोध किया उनका कहना था कि हर जाति के हर व्यक्ति को हर प्रकार की शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है। बंगाल में बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहन देने का महत्व कार्य ईश्वरचंद विद्यासागर ने किया ।उन्होंने अपने समय में अनेक क्षेत्रों में सुधार किए शैक्षिक सुधार सामाजिक सुधार और महिलाओं की स्थिति में सुधार।

      ईश्वर चंद्र विद्यासागर जानते थे कि बालिकाओं की शिक्षा से ही समाज में फैली हुई रूढ़िवादिता, अंधविश्वास और कुरीतियों दूर की जा सकती है।

बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन

देश को समृद्ध एवं योग्य नागरिक प्रदान करने के लिए बालिकाओं की शिक्षा जरूरी है । उन्होंने बंगाल में ऐसे 35 स्कूल खोले जिनमें बालिकाओं की शिक्षा का प्रबंध था । वे बालिका शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए मेहनती और मेधावी छात्रों को पुरस्कार भी दिया करते थे उन्होंने कोलकाता अब कोलकाता से सबसे पहले एम.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाली चंद्रमुखी बोस को पुरस्कार दिया।

विधवा विवाह और विधवाओं की दशा सुधारने के प्रयास

ईश्वर चंद्र विद्यासागर ब्रह्म समाज नामक संस्था के सदस्य थे स्त्री शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने विधवा विवाह और विधवाओं की दशा सुधारने का भी काम किया इसके लिए ईश्वर चंद्र विद्यासागर को बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।

अंत में विधवा विवाह को कानूनी मान्यता प्राप्त हो गई सुधारवादी विचारधाराओं का जनता के बीच प्रचार करने के लिए ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने अंग्रेजी तथा बंगला में पत्र निकाले।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर का कहना था कि कोई भी व्यक्ति अच्छे कपड़े पहनने, अच्छे मकान में रहने तथा अच्छा खाना खाने से बड़ा नहीं होता बल्कि अच्छे काम करने से बड़ा होता है ।

ईश्वर विद्याचन्द्र सागर एक अनजान नौजवान के लिए बन गए कुली

एक बार ईश्वर चंद्र विद्यासागर रेलगाड़ी में कलकत्ता (कोलकाता ) से बर्दवान आ रहे थे । उसी गाड़ी में एक नवयुवक बहुत अच्छे कपड़े पहने बैठा था । उसे भी बर्दवान आना था । स्टेशन पर गाड़ी पहुंचे नवयुवक ने अपना सामान ले चलने के लिए कुली को पुकारा । स्टेशन पर उस समय कोई कुली नहीं था। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने उससे कहा कि यहां कोई खुली नहीं है, आप परेशान ना हो आपका सामान मैं लिए चलता हूं । नवयुवक खुश हो गए उसने कहा कि मैं आपको पूरी मजदूरी दूंगा । घर पहुंचकर वह नवयुवक ईश्वर चंद्र विद्यासागर को पैसे देने लगा तो उन्होंने पैसे नहीं लिए।

अगले दिन बर्धमान में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के स्वागत के लिए बहुत से लोग एकत्रित हुए । वह नवयुवक भी वहां आया उसने देखा कि यह तो वही व्यक्ति है जो कल मेरा सामान लेकर आया था ।। नवयुवक को बड़ा आश्चर्य हुआ वह लज्जित भी हुआ । जब सभा समाप्त हुई तब वह ईश्वर चंद्र विद्यासागर के घर गया और पैरों पर गिरकर क्षमा मांगी। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने समझाए अपना काम स्वयं करना चाहिए ।

ईश्वर चंद्र विद्यासागर 19वीं शताब्दी के महान विभूति थे। उन्होंने अपने समय में फैली अशिक्षा और रूढ़िवादिता को दूर करने का संकल्प लिया । अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी उनके द्वारा किये गए सामाजिक और शैक्षिक कार्यों ने उन्हें भारत में एक अलग पहचान दिलाई। जिस प्रकार उन्होंने महिलाओं के उत्थान के लिए कार्य हिंदुस्तान हमेशा उनका ऋणी रहेगा और उन्हें याद करेगा।

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