सावित्री बाई फुले, भारत की प्रथम महिला शिक्षिका: जीवनी और शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में योगदान

सावित्री बाई फुले, भारत की प्रथम महिला शिक्षिका: जीवनी और शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में योगदान

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भारत की प्रथम महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले का आज जन्म दिवस है। यह इस देश की जातीय घृणा का परिचायक है कि इस महान आत्मा को सिर्फ एक वर्ग विशेष से जोड़कर उनकी उपलब्धियों और शिक्षा में उनके योगदान को महत्व नहीं दिया जाता। मुझे नहीं पता शिक्षक दिवस जिस व्यक्ति के नाम पर मनाया जाता है उनका शिक्षा के क्षेत्र में कोई व्यक्तिगत योगदान है ! लेकिन जब भारत में शिक्षा के विकास में महिलाओं के योदगान की बात होगी तो एकमात्र सबसे सम्मानित नाम सावित्री बाई फुले का ही ही सामने आएगा।  आइये जानते हैं इस महान शिक्षिका के विषय में। 

सावित्री बाई फुले, भारत की प्रथम महिला शिक्षिका: जीवनी और शिक्षा और महिला सशक्तिकरण में योगदान
फोटो स्रोत -wallpapercave.com

 

सावित्री बाई फुले का जीवन परिचय 

सावित्री बाई फुले भारत की प्रथम महिला शिक्षिका थीं उनका जन्म 03 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नयगांव हुआ था। उनके माता-पिता का नाम लक्ष्मी और खन्दोजी नैवेसे था।  मात्र 9 वर्ष की आयु में ( 1840 )  ज्योतिबा फुले ( 13 वर्ष ) के साथ हुआ था। शादी  के समय सावित्री बाई बिलकुल अनपढ़ थीं और ज्योतिबा कक्षा तीन में पढ़ते थे।सावित्री बाई ने उस समय पढ़ने का सपना देखा जब इस देश में दलितों के साथ भयंकर भेदभाव और अत्याचार होता था। उन्होंने भारत में प्रथम बालिका स्कूल के साथ प्रथम किसान स्कूल की भी स्थापना की। 

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 जब पिता ने फेंकी सावित्री बाई के हाथ से किताब 

यह उस समय की बात है जब एक दिन एक अंग्रेजी की पुस्तक सावित्री बाई ने हाथ में ली हुयी थी। पिता ने ये देखा तो उनके हाथ से पुस्तक लेकर फेंक दी और कहा इस देश में शिक्षा प्राप्त करना सिर्फ उच्च जाति के लोगों का अधिकार है, दलितों और महिलाओं के लिए यह पाप है। इस घटना ने सावित्री बाई को अंदर तक झकझोर दिया उन्होंने प्रण किया कि वे अब शिक्षा जरूर हासिल करेंगी और किताब को बापस लेकर आयीं। 

प्रथम बालिका विद्यालय की स्थापना 

सावित्री बाई फुले ने भारत में प्रथम बालिका ( गर्ल्स ) स्कूल की स्थापना की और उस स्कूल की पहली प्रधानाचार्या बनी। वे भारत में प्रथम किसान विद्यालय की भी संस्थापक थीं। सावित्री बाई फुले को पढ़ाने का श्रेय उनके समाज सुधारक पति ज्योतिबा राव फुले को है। ज्योतिबा फुले जिन्हें बाद में महात्मा ज्योतिबा फुले ले नाम से जाना गया ने महिलाओं और दलितों को शिक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

सावित्री बाई फुले का जीवन समाज को समर्पित था। उन्होंने अपने जीवन को एक मिशन की तरह समर्पित किया।  उन्होंने विधवा विवाह, छुआछूत उन्मूलन, नारीमुक्ति और दलित महिलाओं के शिक्षित करना अपने जीवन का उद्देश्य बनाया था। जिसमें वे बहुत हद तक सफल भी रहीं। वे एक कवियत्री के रूप में भी प्रसिद्ध हैं  और उन्हें मराठी की आदिकवियत्री के रूप में भी जाना जाता है। 

जब लोगों ने फेंका सावित्री के ऊपर कूड़ा 

सावित्री बाई फुले का पढ़ना और पढ़ना समाज के उच्च जातीय लोगों को रास नहीं आया।  जब सावित्री पाने स्कूल जाती थीं तब ये उच्च जातीय लोग उन पर पत्थर फेंकते थे।  उनके ऊपर गंदगी और कूड़ा फेंकते थे। जिस समय सावित्री बाई ने बालिकाओं के लिए स्कूल खोला तब ये उन उच्च जातीय लोगों के लिए खुली चनौती थी साथ ही रूढ़िवादियों के लिए भी एक चुनौती थी जो समझते थे कि महिलाओं के लिए शिक्षा प्राप्त करना एक पाप है। 

सावित्री बाई फुले ने किसी एक जाति अथवा धर्म के लिए काम नहीं किया।  वे सम्पूर्ण भारत की महानायिका हैं। जब सावित्री बाई लड़कियों को पढ़ाने स्कूल जाती थीं तो लोग उनके ऊपर कींचड़, गोबर, मल, गंदगी आदि फेकते थी। लोगों के इस व्यवहार को देखकर सावित्री बाई ने अपने थैले में में हमेशा एक अतिरिक्त साड़ी रखी।  स्कूल पहुंचकर वे गंदी साड़ी को निकाल कर साफ साड़ी पहन लेती थीं लेकिन उन्होंने लोगों के भय से अपना काम नहीं छोड़ा। 

सावित्री बाई फुले ने नौ छात्रों के साथ किया था विद्यालय शुरू 

अपने पति महात्मा ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर सावित्री बाई फुले ने 3 जनवरी 1848 ईस्वी को पुणे में विभिन्न जातियों की मात्र नौ छात्राओं को लेकर स्त्रियों के लिए विद्यालय की स्थापना की। यही नहीं अगले एक वर्ष में फुले दम्पति ने पांच और विद्यालयों की स्थापना की। उनके इस कार्य से प्रसन्न होकर उस समय की सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था। 

हम और आप सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं कि उस समय सावित्री बाई फुले को कितने कष्ट और जुल्म सहने पड़े होंगें जब 1848 में एक महिला प्रिंसिपल ( सावित्री बाई फुले ) ने लड़कियों का विद्यालय संचालित किया होगा। लड़कियों के लिए उस समय भारतीय समाज में शिक्षा लेना नामुमकिन था लेकिन सावित्री बाई ने इसे मुमकिन करके दिखाया। ऐसी महान आत्मा को ह्रदय से नमन। 

सावित्री बाई फुले का निधन 1897 ईस्वी में महाराष्ट्र में एक खतरनाक महामारी ( प्लेग ) फैली थी जिसमें हज़ारों लोगों की जान चली गयी थी। प्लेग की चपेट में आये लोगों की सेवा करने में जुटी सावित्री बाई फुले भी संक्रमित हो गयी जिसके कारण 10 मार्च 1897 को सावित्री बाई फुले का निधन हो गया। 

जब एक ब्रह्मण लड़की की जान बचाई सावित्री बाई फुले ने 

ब्राह्मणों ने सावित्री बाई फुले का हमेशा विरोध किया था। उसी ब्रह्मण समाज की एक लड़की की उन्होंने जान बचाई थी। एक विधवा ब्राह्मण महिला कशीबाई आत्महत्या करने के लिए जा रही थी। काशीबाई विधवा स्त्री थी लेकिन वह गर्भवती हो गई तो लोकलाज के भय से अपनी जान देना चाहती थी। लेकिन सावित्री बाई फुले ने उसके आत्महत्या करने से रोका और अपने घर में आश्रय दिया। उसके बच्चे को अपने घर में जन्म दिया। उसके बच्चे का नाम यशवंत रखा गया और उसे अपना दत्तक पुत्र बना लिया ( क्योंकि उनकी अपनी कोई संतान नहीं थी )। यही यशवंत आगे पढ़ लिखकर एक डॉक्टर बना।  तो ऐसी थीं सावित्री बाई फुले जिन्होंने सभी वर्गों और लोगों के लिए काम किया।

सावित्री बाई फुले का योगदान

सावित्रीबाई फुले भारत की एक प्रमुख समाज सुधारक, शिक्षाविद् और कवियित्री थीं, जिन्होंने 19वीं शताब्दी के दौरान शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समानता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके योगदान में शामिल हैं:

अग्रणी महिला शिक्षा: सावित्रीबाई फुले भारत की पहली महिला शिक्षकों में से एक थीं और उन्हें अक्सर “भारतीय नारीवाद की माँ” कहा जाता है। उन्होंने अपने पति, ज्योतिराव फुले के साथ, 1848 में पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल स्थापित किया, जब भारत के कई हिस्सों में महिलाओं के लिए शिक्षा वर्जित मानी जाती थी। उन्होंने लगातार लैंगिक भेदभाव के खिलाफ लड़ाई लड़ी और महिलाओं के शिक्षा के अधिकार की वकालत की, जो उनके समय में एक क्रांतिकारी अवधारणा थी।

महिला सशक्तिकरण: सावित्रीबाई फुले ने अपना जीवन महिलाओं को सशक्त बनाने और उनकी सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने बाल विवाह, जातिगत भेदभाव और सती (विधवा बलिदान की प्रथा) जैसी सामाजिक बुराइयों के खिलाफ सक्रिय रूप से अभियान चलाया और महिलाओं के उत्थान की दिशा में काम किया। उन्होंने गर्भवती बलात्कार पीड़ितों के लिए देखभाल केंद्र भी स्थापित किए और प्रचलित सामाजिक मानदंडों और कलंक को चुनौती देते हुए उन्हें सहायता और देखभाल प्रदान की।

लेखन और वकालत: सावित्रीबाई फुले एक विपुल लेखिका थीं और उन्होंने अपनी कलम को सामाजिक परिवर्तन के एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। उन्होंने महिलाओं, उत्पीड़ित जातियों और समाज के हाशिए के वर्गों के सामने आने वाले मुद्दों को उजागर करने के लिए शक्तिशाली कविताएँ और लेख लिखे। उनका लेखन लैंगिक भेदभाव, जाति उत्पीड़न और शिक्षा के महत्व जैसे विषयों पर केंद्रित था, और उन्होंने सामाजिक समानता और न्याय की वकालत करने के लिए उनका इस्तेमाल किया।

सामाजिक सुधार: सावित्रीबाई फुले सामाजिक सुधारों की कट्टर समर्थक थीं और उन्होंने जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों को खत्म करने की दिशा में काम किया। उन्होंने सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया और सार्वजनिक बैठकों, रैलियों और जागरूकता अभियानों का आयोजन करके सामाजिक सुधारों की शुरुआत की। उन्होंने दमनकारी जाति व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई लड़ी और एक अधिक समावेशी और समतावादी समाज बनाने की दिशा में काम किया।

महिला अधिकार आंदोलन के लिए प्रेरणा: महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समानता में सावित्रीबाई फुले के योगदान का स्थायी प्रभाव पड़ा है और यह भारत और उसके बाहर की महिलाओं की पीढ़ियों को प्रेरित करती है। उन्होंने भारत में महिला अधिकार आंदोलन की नींव रखी और उन्हें लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय और शिक्षा की लड़ाई में एक अग्रणी व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है।

शिक्षा, महिला सशक्तीकरण और सामाजिक सुधारों के क्षेत्र में सावित्रीबाई फुले के अग्रणी प्रयासों ने भारतीय समाज पर एक अमिट छाप छोड़ी है। उनकी विरासत लोगों को अधिक समावेशी, समतावादी और न्यायपूर्ण समाज की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित और प्रेरित करती रही है।


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