भारत में संवैधानिक विकास का प्रारम्भ-रेग्युलेटिंग एक्ट 1773, उद्देश्य, गुण और दोष, Regulating Act 1773

भारत में संवैधानिक विकास का प्रारम्भ-रेग्युलेटिंग एक्ट 1773, उद्देश्य, गुण और दोष, Regulating Act 1773 

         12 अगस्त 1765 को क्लाइव ने निर्वल मुग़ल सम्राट शाह आलम द्वितीय से एक फरमान प्राप्त किया। इस फरमान के अनुसार कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हो गयी और उसके बदले कम्पनी को 26 लाख रुपया वार्षिक मुग़ल सम्राट को देना था। इसी प्रकार बंगाल का नवाब अब कंपनी का पेंशनर मात्र रह गया था और कंपनी उसे 53 लाख रुपया वार्षिक देती थी जो बाद में घटाकर 32 लाख कर दिया गया। क्लाइव ने दीवानी का कार्य अपने हाथ में लेकर निजामत का कार्य नवाब के कंधे पर दाल दिया। इस प्रकार क्लाइव ने बंगाल में दोहरी शासन व्यवस्था लागू कर दी जिसने बंगाल को बर्बाद कर दिया। क्लाइव ने बंगाल के लिए उप-दिवान  के रूप मुहम्मद रजा खां और बिहार के लिए राजा शिताब राय को दीवानी कार्यों के लिए नियुक्त कर दिया। क्लाइव को उम्मीद थी की उसकी इस व्यवस्था से कंपनी को लाभ होगा लेकिन कुछ ही दिन में कम्पनी घाटे में जाने लगी। इस प्रकार कम्पनी पर कर्ज का भार बढ़ गया।  इस सबसे उबरने के लिए रेगुलेटिंग एक्ट 1773 लाया गया। 

पढ़िए-उत्तरवर्ती मुग़ल सम्राट

 


 

 रेग्युलेटिंग एक्ट पारित होने के लिए उत्तरदायी कारण 

रेग्युलेटिंग एक्ट 1773 के लागू होने के लिए निम्नलिखित कारण उत्तरदायी थे —

  • बंगाल की दोहरी शासन प्रणाली से उत्पन्न अव्यवस्था। 
  • ईस्ट इंडिया कम्पनी के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा निजी व्यापार से लाभ कमाना 
  • कम्पनी ने अपनी बिगड़ती वित्तीय स्थिति से उबरने के लिए £4,00,000 वार्षिक जो उन्हें अंग्रेजी सरकार को देना होता था से छूट मांगी। इससे कम्पनी की वित्तीय स्थिति की पोल खुल गयी। 
  • कम्पनी ने अपनी वित्तीय स्थिति की वास्तविक स्थिति को छुपाते हुए 1772 में 12.5 प्रतिशत का लाभांश दिखाया जबकि उस पर 60 लाख पौण्ड का ऋण था। 
  • कम्पनी की वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए कम्पनी के निर्देशकों ने ‘बैंक ऑफ़ इंग्लैंड’ से दस लाख पौण्ड का ऋण माँगा। 
  • इंग्लैंड के प्रधानमंत्री लार्ड नार्थ ने ऋण के इस प्रार्थना पत्र को संसद की अनुमति के लिए भेज दिया। 
  • संसद ने इसकी जाँच के लिए एक प्रवर समिति ( select committee ) नियुक्त कर दी। 
  • प्रवर समिति का अध्यक्ष जनरल बरगायन था, उसने इस विवाद पर बोलते हुआ कहा —-

   महान अत्याचार और क्रूरता जो किसी असैनिक सरकार के नाम को धब्बा लगा सकती है, उसे सुधारने की आवश्यकता है…….और यदि किसी कारण प्रभुसत्ता और व्यापार को अलग नहीं किया गया तो भारत और इंग्लैंड दोनों ही इतने नीचे गिर जायेंगे और डूब जायेंगे कि उनका पुनरुत्थान नहीं हो सकेगा। 

पढ़िए – बंगाल का प्रथम गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्ज 

       कम्पनी के डायरेक्टर जिनके आचरण पर गृह  सरकार और इंग्लैंड की जनता को पहले ही संदेह था और यह संदेह तब और मजबूत हो गया जब 1772 में कम्पनी के डायरेक्टरों ने 12.5 प्रतिशत का लाभ दिखाया और उसी वर्ष कम्पनी ने दस लाख पौण्ड का ऋण मांग लिया। यह विसंगति इतनी पुख्ता थी कि हाउस ऑफ़ कॉमन्स की एक दूसरी ‘गुप्त समिति’ नियुक्त करनी पड़ी ताकि सच्चाई का पता लगाया जा सके। एक कम्पनी जिसके अधिकारी इंग्लैंड मालामाल होकर लौटते हों और वह कम्पनी दिवालिया हो जाये। 

    अगले वर्ष समिति ने अपनी जाँच रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें कम्पनी में अनेक दोष पाए गए। कम्पनी को 14 लाख पौंड का ऋण 4 प्रतिशत की ब्याज दर से कुछ शर्तों के साथ देने की सिफारिस की। दूसरे अधिनियम द्वारा रेग्युलेटिंग एक्ट पारित किया गया। इस विधेयक का कम्पनी और उसके व्यापारिक मित्रों ने भारी विरोध किया। 

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के प्रावधान ( Provisons of the Regulating Act 1773 )

 अधिनियम द्वारा कम्पनी के संविधान में भारत तथा इंग्लैंड दोनों में ही परिवर्तन लाये गए जो इस प्रकार थे —-

1- इंग्लैंड में कम्पनी के स्वामियों के अधिकरण ( Court of Proprietors ) में वोट देने का अधिकार केवल उन लोगों को दिया गया जो चुनाव से पूर्व कम से कम एक वर्ष पहले कम्पनी में एक हज़ार पौंड के शेयर के स्वामी हों। 

2- कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स का चुनाव चार वर्ष के लिए किया जायेगा और डायरेक्टरों की संख्या 24 तय की गयी जिसमें से 25 प्रतिशत प्रतिवर्ष अवकाश लेंगें। 

3- डाइरेक्टरों को यह आदेश हुआ की वे ‘वित्त विभाग  भारत प्रशासन तथा राजस्व संबंधी ( सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट ) के समक्ष सैनिक और असैनिक प्रशासन संबंधी सभी पत्र-व्यवहार प्रस्तुत करेंगे। इस प्रकार पथम बार ब्रिटिश संसद को भारतीय मामलों का नियंत्रण करने का अधिकार दिया यद्यपि यह अधिकार सिमित था। 

4- बंगाल में एक प्रशासन मंडल ( परिषद् ) बनाया गया जिसमें गवर्नर-जनरल ( अध्यक्ष ) तथा चार सदस्य ( पार्षद ) नियुक्त किये गए। इस मंडल में निर्णय बहुमत से होते थे और अध्यक्ष का मत, बराबर मत होने की स्थिति में ही निर्णायक होगा। कोरम अथवा गणपूर्ति तीन का था।

5- इस मंडल में प्रथम गवर्नर-जनरल ( वॉरेन हेस्टिंग्ज ) तथा पार्षद ( फिलिप फ्रांसिस, क्लेवरिंग, मॉनसन तथा बरवैल ) थे। 

 पढ़िए – 1857 की क्रांति

6- पार्षदों की नियुक्ति 5 वर्ष के लिए की गयी और केवल कोर्ट ऑफ़ डाइरेक्टर्स की सिफारिश पर ब्रिटिश संसद द्वारा ही हटाए जा सकते थे। 

7- सपरिषद गवर्नर जनरल को बंगाल में फोर्ट विलियम की प्रेजिडेंसी के सैनिक तथा असैनिक शासन का अधिकार दिया गया तथा उसे “कुछ विशेष मामलों में मद्रास तथा बम्बई की प्रेजिडेंसीयों का अधीक्षण भी करना था।”

8- सम्राट की आज्ञा से एक सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गयी इस न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश तथा तीन अन्य छोटे जज नियुक्त किये गए। 

9- इस न्यायालय के अंतर्गत कम्पनी के समस्त कार्यकर्ता, तथा बंगाल की समस्त जनता को अपील का अधिकार था। सभी मुकदमों का निर्णय इंग्लैंड में प्रचलित न्यायिक विधियों द्वारा किया जाता था। यद्यपि इस विषय में कोई स्पष्ट विधान नहीं किया गया था।

10- सर्वोच्च न्यायलय का गठन 1774 में कलकत्ता में किया गया और ‘सर एलिजाह इम्पे’ को मुख्य नयायाधीश बनाया गया, चेमबर्ज, लिमैस्टर और हाइड छोटे जज के रूप में नियुक्त हुए। 

11- कम्पनी से संबंधित सभी सैनिक अथवा असैनिक पदाधिकारी किसी भी रूप में उपहार, दान, पारितोषिक इत्यादि लेने पर रोक लगा दी गयी। 

12- कम्पनी के कार्यकर्ताओं के वेतन बढ़ा दिए गए। गवर्नर-जनरल को £25,000, पार्षदों को £10,000 तथा मुख्य न्यायाधीश को £8,000 तथा छोटे न्यायाधीशों को £6,000 वार्षिक दिए गए जो सम्भवतः उस समय पूरी दुनियां में सबसे अधिक वेतन था। 

13- बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बना दिया गया।  इस प्रकार वॉरेन हेस्टिंग्ज बंगाल का अंतिम गवर्नर था और प्रथम गवर्नर जनरल था। 

 पढ़िए -भारत शासन अधिनियम 1858 

1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के दोष 

  • गवर्नर जनरल को स्वयं निर्णय लेने की बजाय पार्षदों की समिति के ऊपर निर्भर कर दिया जो हमेशा उसके विरुद्ध ही रही। 
  • सर्वोच्च न्यायालय के नियम आधे-अधूरे बनाये गए न्याय ब्रिटिश कानून से होना था या भारतीय इसका स्पष्ट उल्लेख नहीं था। 
  • कलकत्ता परिषद् और न्यायालय का अधिकार क्षेत्र निश्चित नहीं था। 
  • अधिनियम में ब्रिटिश क्राउन की प्रभुसत्ता को दृढ़तापूर्वक स्थापित करने का प्रयत्न नहीं किया गया। 
  • बंगाल को सीधे नियंत्रण में नहीं लिया गया। 
  • इस अधिनियम ने सरकार को कम्पनी पर, डाइरेक्टरों को अपने सेवकों पर, गवर्नर-जनरल को अपनी परिषद् पर अथवा कलकत्ता प्रेजिडेंसी को मद्रास अथवा बम्बई पर पूर्ण तथा स्पष्ट रूप से नियंत्रण नहीं दिया। 
  • यह अधिनियम चेक्स एंड बैलेंस ( अवरोध तथा संतुलन ) की निति पर आधारित था। 
  • इस अधिनियम के दोषों के कारण गोवर्ण-जनरल और उसकी परिषद् में झगड़े शुरू हो गए। उच्चतम न्यायालय और बंगाल के अन्य न्यायलयों में अनियमितता थी। गवर्नर-जनरल और उसकी परिषद् द्वारा बनाये कानून न्यायालय में लागू करना न्यायालय की अपनी इच्छा पर निर्भर था।गवर्नर-जनरल को अन्य प्रेज़िडेंसियों पर पूर्णरूपेण अधिकार नहीं दिया गया।अतः यह व्यवस्था शीघ्र छिन्न-भिन्न हो गयी। 
  • यह भी पढ़िए – बंगाल में ब्रिटिश सत्ता की स्थापना 

 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट के गुण 

  • इस एक्ट द्वारा संविधान सम्मत  प्रशासन करने का प्रथम प्रयास हुआ जो किसी भी यूरोपीय देश का सुदूर-सभ्य लोगों के देश में प्रशासन करने का प्रथम प्रयत्न था। 
  • इस एक्ट द्वारा बंगाल, मद्रास और बम्बई में एक ईमानदार तथा कुशल प्रभुसत्ता स्थापित करने का प्रयास किया गया। 
  • कम्पनी के अधिकारीयों की स्वेक्षाचरिता  पर रोक लगाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गयी। 

    इस प्रकार कहा जा सकता है कि यह अधिनियम अधिक अच्छा प्रशासन स्थापित करने का एक प्रयत्न था परन्तु समस्याओं के अपूर्ण ज्ञान के कारण यह अधिनियम असफल हो गया और इसने वारेन हेस्टिंग्ज की परेशानियों को आसान करने की बजाय बढ़ा दिया। 

      रेग्युलेटिंग एक्ट 11 वर्ष चला और उसकी कमियों को दूर करने के लिए 1784 में पिट्स इंडिया एक्ट पारित किया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत सिर्फ वॉरेन हेस्टिंग्ज ने ही कार्य किया। 

पढ़िए  भारत छोड़ो आंदोलन 

 

         


Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.